प्रद्युम्न कुमार त्रिपाठी- कविता संकलन विविधा- साहित्यिक पत्रिका असुविधा का अड़तीसवाँ अंक २०१८

कुदरतीबोधों से उपजी प्रदुम्न कुमार त्रिपाठी की कविताओं का संकलन विविधा
कवि श्री प्रद्युम्न कुमार त्रिपाठी जी का पहला कविता संकलन है । संकलन की सारी रचनाएं बिना किसी कृत्रिमता तथा कलात्मकता के स्वरूप का बोध कराती है। स्वस्फूर्तता का प्रभाव बोध संकलन को विशिष्ट बनाता है जो कविता के कुदरती बोधों को क्षतिग्रस्त नहीं होने देता। दर्शन काव्य सृजन में कलात्मकता जरूरी होती है तो अभिव्यक्ती की कुदरती सरलता ,तरलता भी जरूरी है। संकलन की कविताओं से लोक चित्त तथा चेतना का कहीं भी छरण नहीं हुआ है ,काव्य संवाद तथा काव्य भाषा में कहीं भी बनावट तथा गैर जरूरी सजावट नहीं है। बल्कि काव्य वस्तु को बहुत ही सहजता तथा सरलता से अभिव्यक्त करने के प्रयास ही सर्वत्र दीखते हैं। काव्य वस्तु, काव्य भाषा एवं अभिव्यक्ति कवि को ईमानदार बनाती है तथा समाज के प्रति जागरूक भी।
देखें एक सामान्य सी कविता......
दया करना दाता अघी पातकी हूं माया के हाथों गिरफ्तार में हूं।
यहजो कवी का कन्फेशन है वह अगर पूरी मानव सभ्यता का कन्फेशन बन जाए फिर तो क्या कहने पर ऐसा होने वाला नहीं है । हम अपनी गलतियों को तार्किकता से छिपाने की कोशिशों में पड़े हुए हैं हम अपनी गलती स्वीकारते कहां है ? कवी गिरते हुए मानवीय मूल्यों के प्रति काफी चिंतित और परेशान है......
मर गई संवेदना तो क्या बचाअवशेष, संस्कृत रो रही इतिहास रो रहा।
मशीनी युग में हम स्वयं मशीन हो गए अब अविश्वास हुआ हावी विश्वास को रहा।
सच है कि संवेदना मर गई तो फिर क्या बचा संवेदना ही तो जीवन जीने का रास्ता सिखाती है ।अपने जीवन इतिहास को भूल कर मशीन में तब्दील हो जाना तथा उस तब्दीली के लिए सामाजिक इतिहास के साथ खिलवाड़ करना कथित बौद्धिकों का शगल हो सकता कल पर उनका नहीं जो जीवन जीते हैं दूसरों के लिए समाज के लिए।
इंसान वही जिए जिए इंसान के लिए यह एक काव्य पंक्ति है इसी संकलन से जो जाने कितने लोगों द्वारा कही जाती रही है सुनी जाती रही है पर व्यवहार में इस काव्य पंक्ति का जितना अपमान किया गया है और किया जा रहा है शायद उतना किसी भी पंक्ति का नहीं किया गया होगा।
हमारा समय तो ----- असतो मा सद्गमय के लिए प्रस्तावित था पर समय जहां था वहीं खड़ा रह गया है। और हमारी चेतना मशीनें कृत होकर इंसान को पहचानने से ही इनकार करने लगी है तो यह है हमारी सभ्यता का कड़वा सच लगातार वस्तु तथा उपभोक्ता बनते जाने का सच।
कवि प्रदुमन चिंतित है ......
संघर्षों से कौन बचा है चलते रहना गाते गीत
संघर्ष तो करने ही पड़ेंगे संघर्ष से बचे रहने की चाहना ही खुद को धोखा देना है आज के बाजारों तथा उपभोक्तावादी समय का शिकार होकर सुविधाबादी बन जाने से अच्छा है गीत गाते हुए समय के साथ टकराने का प्रयास किया जाए। गीत गाते रहोगे तो चेतना झंकृत होगी फिर तो मनोरम ही मनोरम होगा । कवी विप्रद्युम्न कवि है इनके कविताओं में शहीदों के प्रति कोमल निश्चल समर्पण है जिसकी सरलता गहरे तक प्रभावित करती है।
झांसी वाली रानी बनकर वीर सुभाष हमीद भगत
जन जन का अभिमान तिरंगा इस पर मिट जाएंगे।
वैसे भी कवि प्रदुमन दोहरी जिंदगी नहीं जीते ।
शहीदों के प्रति उनका समर्पण उनके द्वारा विकसित किए किए जा रहे हैं शहीद उद्यान स्थल की यात्रा करने के बाद स्वत: समझ में आ जाता है । वह स्थान एकला प्रयास का प्रतिफल है तथा उन लोगों के लिए चुनौती भी जो शहीदों के प्रति समर्पण का प्रदर्शन करते हैं । यह है अकेले आदमी का इमानदार समर्पण शहीदों के प्रति तो समाज के प्रति भी । प्रद्युम्न की कविताएं यकीन दिलाती हैं कि अनुभूतियां बचाई जा सकती है । कविताओं की सरलता तथा तरलता भी बचाईं जा सकती है ।आशा है प्रस्तुत काव्य संकलन जन कविताओं के प्रेमियों को निराश नहीं करेगा ।उम्मीद बनती है के नए तेवर और मुहावरों के साथ कभी प्रदुमन का दूसरा संकलन भी प्रकाश में आएगा धन्यवाद ।
रामनाथ शिवेंद्

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