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Showing posts from November, 2015

दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश

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दूसरी आजादी (रामनाथ शिवेन्द्र) उपन्यास का अंश      कुछ अपनी बातें...  दूसरी  आजादी् का कथानक उन हसीन सपनों से उपजा है, जो सन् १८५७ से लेकर १९४७ ई० तक लगातार अंखुआते रहे हैं। आजादी मिलते ही हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, सभी को रोटी और मकान मिल जाएगा, पर सपना तो सपना वह भला कैसे जमीन पर उतरे। आजादी के समय और काफी बाद तक सोनभद्र श्मीरजापुर् जनपद का एक भूभाग रहा है, जिसे कैमूर का दक्षिणांचल कहा जाता रहा है। अंग्रेजों के समय यह हिस्सा अनुसूचित हिस्सा था, जहां केवल फौजदारी के कानून लागू थे तथा राजस्व और दीवानी के कानून यहां की परम्पराओं पर आधारित थे। आजादी मिलते ही यहां के पारम्परिक कानूनों को समाप्त कर दिया गया। अब तो श्सोनभद्र् एक अलग जनपद है, जहां सारे कायदे कानून लागू है। तमाम औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, ऊंची-ऊंची चिमनियां हैं तो लाखों की संख्या में विस्थापित भी है। इनके अलावा कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं तथा बाकियों के परिजन भी हैं। उनसे मिल कर आजादी की जो तस्वीर उभरती है तथा दूसरी आजादी तक का चित्र प्रस्तुत करती है वही दूसरी आजादी उपन्य...

तीसरा रास्ता एन जी ओ पर केंद्रित उपन्यास के दो अंश

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तीसरा रास्ता एन जी ओ  पर केंद्रित उपन्यास के दो अंश  राजनीतिक व सामाजिक रूप से तीसरा रास्ता क्या हो, कैसा हो? एन.जी.ओ. संस्कृति ने क्या सामाजिक बदलावों के लिए ईमानदारी से प्रयास किया? एन.जी.ओ. की गतिविधियों का यथार्थ लेखा जोखा प्रस्तुत करता उपन्यास है तीसरा रास्ता... तीसरा रास्ता फन्ड राजनीति के घालमेल पर से भी पर्दा उठाने का एक प्रयास है. देखें.....                                                   गोत्र ठीक एक साल पहले सुधा मानवाधिकार जन समिति में एक्टिविस्ट की तरह भर्ती हुई थी और अमरेश सुधा से साल भर बाद सहायक एकाउन्टेन्ट के पद पर। उस समय निखिल दा वहां एकाउन्टेन्ट विभाग के सर्वे-सर्वा थे। संस्था के मंत्री जी भी उन्हें सलाम बजाते। उन दोनों के रिश्ते में ऐसा क्या कुछ था कि दफ्तर की सामान्य परम्परा भी उनमें न दिखती, किसी को कुछ नहीं मालूम। मालूम तो सुधा के बारे में भी किसी को कुछ नहीं था सिवाय इसके कि वह नशीली हवा की तरह है, तीस साल के...

ढूह वाली लछमिनिया(रामनाथ शिवेन्द्र)उपन्यास के दो अंश

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                                                                    contact....7376900866 ढूह वाली लछमिनिया (रामनाथ शिवेन्द्र)उपन्यास के दो अंश                                             सलीमा    सूरज से उजाला लगातार दूर होता जा रहा था और वह पश्चिम की ओर थका थका सा उतर रहा था मानो ऊॅची सीढ़ी से उतर रहा हो, एक ऐसी सीढ़ी जो आसमान को धरती से जोड़ती हो. वैसे भी कुछ खास जगहें ऐसी होती हैं, जहां सूरज का उजाला अपना रोब-दाब गांठ नहीं पाता. मिट्टी के ऊॅचे ऊॅचे ढूहों, बड़े बड़े छतनार पेड़ों, घाटियों की अमापित गहराइयों में किसी निरीह बेवश प्राणी की तरह अपने नैसर्गिक प्राधिकार उजाला की भीख मांगता हुआ कभी भी सूरज को डूब कर छटपटाता देखा जा सकता है. पर उजाला तो दूर छिटका पड़ा था जिससे परेशान थी लछमिनिया. आखिर कब तक प...