Posts

Showing posts from October, 2020

प्रद्युम्न कुमार त्रिपाठी- कविता संकलन विविधा- साहित्यिक पत्रिका असुविधा का अड़तीसवाँ अंक २०१८

Image
कुदरतीबोधों से उपजी प्रदुम्न कुमार त्रिपाठी की कविताओं का संकलन विविधा  कवि श्री प्रद्युम्न कुमार त्रिपाठी जी का पहला कविता संकलन है । संकलन की सारी रचनाएं बिना किसी कृत्रिमता तथा कलात्मकता के स्वरूप का बोध कराती है। स्वस्फूर्तता का प्रभाव बोध संकलन को विशिष्ट बनाता है जो कविता के कुदरती बोधों  को क्षतिग्रस्त नहीं होने देता। दर्शन काव्य  सृजन में कलात्मकता जरूरी होती है तो अभिव्यक्ती की कुदरती सरलता ,तरलता भी जरूरी है। संकलन की कविताओं से लोक चित्त तथा चेतना का कहीं भी छरण नहीं हुआ है ,काव्य संवाद तथा काव्य भाषा में कहीं भी बनावट तथा गैर जरूरी सजावट नहीं है।  बल्कि काव्य वस्तु को बहुत ही सहजता तथा सरलता से अभिव्यक्त करने के प्रयास ही सर्वत्र दीखते हैं। काव्य वस्तु, काव्य भाषा एवं अभिव्यक्ति कवि को ईमानदार बनाती है तथा समाज के प्रति जागरूक भी।  देखें एक सामान्य सी कविता......   दया करना दाता अघी पातकी हूं माया के हाथों गिरफ्तार में हूं। यहजो कवी का कन्फेशन है वह अगर पूरी मानव सभ्यता का कन्फेशन बन जाए फिर तो क्या कहने पर ऐसा होने वाला नहीं है । हम अपनी गलतियो...

मुनीर बख्श आलम पर केन्द्रित असुविधा अंक २०११

Image
   मुनीर बख्श आलम पर केन्द्रित असुविधा अंक  २०११ श्री आलम साहब के ग़ज़ल संग्रह को  प्रकाशित करने का मुझे अवसर मिला मेरे लिए बहुत ही शुभ है , शुभ इसलिए कि यह मेरे  लिए बहुत बड़े भार  से मुक्त होने का अवसर भी है ।  मैं महसूस कर रहा हूं कि मैं काफी हल्का हो चुका हूं पहले काफी दबा हुआ महसूस करता था। लगातार सोचता था काश! मै आलम साहेब के किसी किताब का प्रकाशक का हो पता ,अचानक यह अवसर मिल ही गया। सोनभद्र के बाहर के लोगों को नहीं मालूम कि आलम साहब का सहयोग नहीं मिला होता तो शायद मेरा पहला उपन्यास सहपुरवा प्रकाशित नहीं हो पाता संयोग तो यह भी था कि मैं अक्षर बटोर भी ना बन पाता है और कचहरी में जाकर मुकदमों की बदरंग दुनिया में कहीं खो जाता जहां मुझे अपने व्यक्ति गत संप्रभुता को भी किसी अदालत में अगली सुनवाई हेतु गिरवी रख देना पड़ता। लोग तो मुझसे मिलना चाहते पर उस कचहरी की  दुनिया में शायद मुझे तलाश नहीं पाते क्योंकि वहां जाकर हर कोई खुद खो जाता है और किसी खोई हुई फाइल माफिक हो जाता है। मैं यह नहीं कहता कि कचहरी की दुनिया से नफरत करने की जरूरत है ऐ...

नजर मुहम्मद नजर पर केन्द्रित असुविधा का गजल अंक

Image
                       नजर मुहम्मद नजर पर केन्द्रित असुविधा का गजल अंक 2010 जून 2010 में प्रकाशित नजर मोहम्मद नजर पर केंद्रित असुविधा के अंक के बारे में,  मैं यहां उस अंक के संपादकीय की चर्चा करना चाह रहा हूं । देखें उस समय किस तरीके से नजर साहब पर असुविधा का अंक प्रकाशित करने के लिए फैसला लिया गया था,  प्रकाशन का वह दौर नामवर रचनाकारों के प्रकाशन का दौर था स्थानीय रचनाकारों पर कोई ध्यान ही नहीं देता था। पत्रिकाओं की बात छोड़ें कबिसम्मेलनो में भी स्थानीय रचनाकारों को प्रतिभाग नहीं करने दिया जाता था। इसी लिए असुविधा परिवार ने निश्चित  किया की अब असुविधा के अंक स्थानीय रचनाकारों पर ही केंद्रित किए जाने चाहिए  किसी जन अभियान की तरह, उसी निर्णय के तहत नजर साहब पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया गया, देखें उस अंक की संपादकीय...... कुछ थोड़े से आत्ममुग्ध लोगो की हस्तियां जब सारे समाज का प्रतिनिधित्व करने लगती हैं फिर तो यह आशा करना ही बेकार हो जाता है की हर किसी को बराबरी के स्तर पर माना व जाना जाएगा चाहे व...