नजर मुहम्मद नजर पर केन्द्रित असुविधा का गजल अंक



                       नजर मुहम्मद नजर पर केन्द्रित असुविधा का गजल अंक 2010

जून 2010 में प्रकाशित नजर मोहम्मद नजर पर केंद्रित असुविधा के अंक के बारे में,  मैं यहां उस अंक के संपादकीय की चर्चा करना चाह रहा हूं ।
देखें उस समय किस तरीके से नजर साहब पर असुविधा का अंक प्रकाशित करने के लिए फैसला लिया गया था,  प्रकाशन का वह दौर नामवर रचनाकारों के प्रकाशन का दौर था स्थानीय रचनाकारों पर कोई ध्यान ही नहीं देता था। पत्रिकाओं की बात छोड़ें कबिसम्मेलनो में भी स्थानीय रचनाकारों को प्रतिभाग नहीं करने दिया जाता था। इसी लिए असुविधा परिवार ने निश्चित  किया की अब असुविधा के अंक स्थानीय रचनाकारों पर ही केंद्रित किए जाने चाहिए  किसी जन अभियान की तरह, उसी निर्णय के तहत नजर साहब पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया गया, देखें उस अंक की संपादकीय......
कुछ थोड़े से आत्ममुग्ध लोगो की हस्तियां जब सारे समाज का प्रतिनिधित्व करने लगती हैं फिर तो यह आशा करना ही बेकार हो जाता है की हर किसी को बराबरी के स्तर पर माना व जाना जाएगा चाहे वह रचनाकार ही क्यों न हो। लगता है रचना धार्मिक में भी बराबरी का मामला हमारे समाज व सभ्यता के लिए किसी बज बजाती नाली की तरह है जिसे साफ करने के लिए सभ्यता को उत्तरदाई बनाने की परंपरा हमारे समाज में नहीं है। वैयक्तिकता को इतना महिमामंडित कर दिया जाता है कि क्या कहने ! जिसको तरक्की करना होता है वह कर ही लेता है, बहुत से उदाहरण हमारे कानों में पहले से ही घोले जा चुके हैं ऐसी स्थिति में नजर भाई को कौन पूछे?
ऐसे में जहां हम हैं वहां क्या हो रहा है तथा क्या हो चुका है इसको नकारना गलत ही नहीं अनैतिक भी है इस पर चिंतित होने की आवश्यकता है असुविधा की कोशिश है सभ्यता को कलंकित करने वाली बज बजाती  नालियों को लगातार साफ करते रहो ।
अपने भीतर डूब जाना ठीक नहीं, वैसे असुविधा की सीमा है , असुविधा बहुत दूर तक नहीं दौड़ सकती न हीं पूजी के  कौशलों की तरह छलांग कर वैश्विक हो सकती है फिर भी......
 असुविधा ने अपने सीमित साधनों के तहत यह फैसला लिया है कि यहां के स्थाई रचनाकारों जिन्हें उनके भाग्य पर छोड़ दिया गया है की रचनाओं पर केंद्रीत अंक प्रकाशित किए जाएं तथा पूरी पत्रिका में एक ही रचनाकार की वही रचनाएं हो जिन्हें वह बेहतर मानता हो, हर तरफ देखा जा रहा है कि समाज के लिए अनिवार्य रचनाएं एवं रचनाकार दोनों जमीन में दफन कर दिए जा रहे हैं ,हमें विश्वनाथ प्रसाद खादिम को नहीं भूलना चाहिए कि उनकी रचनाओं को आज तक प्रकाशित नहीं किया जा सका खबर है कि कि डॉक्टर अर्जुन दास केसरी जीने लंबे अंतराल के बाद  उन्हें प्रकाशित किया है यह खुशी की बात है इस गरिमा पूर्ण कार्य के लिए वे बधाई के पात्र हैं फिर भी मजा लेने वाले मजा ले कर चिल्ला रहे हैं कि अपनी तबाही के लिए रचनाकार खुद ही दोषी हैं, समाज किसी को डुबोता नहीं लोग अपने से डूबते हैं।
असुविधा के प्रकाशन का या  30 वां वर्ष है, इस बार नजर मोहब्बत नजर की गजल ऊपर असुविधा को केंद्रित किया गया है।
नजर साहब की रचना धर्मिता पर मुझे कुछ भी नहीं कहना मेरा मानना है कि उनकी रचनाएं खुद बोलेगी अपने बारे में भी तथा दूसरों के बारे में भी, खुद अपना परिचय देंगी वैसे भी यह कम नहीं की फुटपाथ पर छोटी सी दुकान, कुछ सैकड़ा की दुकान लगाए नजर भाई लगातार गजलें कह रहे हैं। ऐसे ग़ज़ल कार के बारे में साफ साफ कह सकता हूं कि रचना धर्मिता के समर्पण के सवाल पर पर इससे कोई बड़ी बात हो ही नहीं सकती।  ज्ञात उदाहरणों में नजर भाई की जोड़ का का क्या थोड़ा  सिकुड़ा हुआ अभी मुझे दूर-दूर तक कोई नहीं दिख रहा।
और तो और साहित्य प्रेमियों की मोहब्बत से भी वंचित रहने वाले नगर भाई ने कभी किसी से कोई शिकायत नहीं किया स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में वे प्रकाशित नहीं हो रहे उन्हें कोई नहीं सम्मानित कर रहा तो नहीं कर रहा यह सब महज खेल है और खेल खेलना सभी को नहीं आता ऐसा मानने वाले नजर भाई को किसी से कोई गिला शिकायत नहीं। खुद अपने से भी नहीं, घुटन, संत्रास वे जानते ही नहीं यकीनन ऐसे लक्षण तो जरूरी शायर के ही होते हैं जो समय के लिए और साहित्य के लिए निहायत अनिवार्य होते हैं हालांकि उनके लिए जरूरी और गैरजरूरी बड़ा,छोटा, मान,अपमान जैसे शब्द और उनकी कुटिल अनुभूतियां प्रभावहीन है तभी तो वे कहते हैं........
तनहा खड़ा है आज जो  सूखे दरख़्त सा 
वह खुद था साएदार अभी कल की बात है
यह अलग बात है कि नजर भाई सामान्य आदमी की तरह निराशा से बाहर नहीं है फिर भी टूटते नहीं है डटे हुए हैं रचना धर्मिता के साथ।
अब किसे अपना रहनुमा समझे
 सभी के हाथ में खंजर दिखाई देता है 
नजर यहां से चलो कहीं दूर चलें
 अब तो जीना यहां दूभर दिखाई देता है।
वैसे इस बयान को थके व  हारे आदमी का बयान भी माना जा सकता है पर कहीं ना कहीं हिजरत भी तो है।
असुविधा के चर्चित विशेषांक मनमोहन ठाकुर, विष्णु चंद शर्मा,सोनभद्र के इतिहास आधुनिक था प्राचीन पर केंद्रित विशेषांक को जिस प्रकार से हर वर्ग तथा हर क्षेत्र से सराहना वह मोहब्बत मिली है हम आशा करते हैं कि प्रस्तुत अंक पर भी असुविधा को पहले की तरह ही मोहब्बत मिलेगी पाठकों की, अपनी सार्थक प्रतिक्रिया से अवगत कराने की अवश्य कृपा करें।
नजर भाई पर केंद्रित विशेषांक निकालने के लिए मैं असुविधा परिवार के प्रति आभार व्यक्त करता हूं।
रामनाथ शिवेंद
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