‘कनफेशन’ अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास

 



अनसुलझे सवालों की पड़ताल करता 

रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास
 ‘कनफेशन’ 
 अमरनाथ ‘अजेय’ 
संबंधों के बीच न जाने कितने सवाल हैं, जो अब तक सुलझाए नहीं जा सके हैं, जिनसे टकराते हुए व्यक्ति की आत्मा चटक-चटक कर विदीर्ण हो रही है जिसके लिए कोई मरहम कारगर नहीं दीखता। संबंध चटकने की टकराहटें इतनी तेज होती हैं कि उसकी आवाजें संवेदनशील साहित्यकार के लिए सर्जना का विषय-वस्तु बन जाती हैं। कविता, कहानी, लेख, संस्मरण और उपन्यास की शक्ल मंे ढलकर देश, काल व समाज के लिए अमूल्य कृति बन जाती हैं। सामाजिक संरचना में भूमि, संपत्ति तथा नारी अस्मिता के सवाल प्रमुख रूप से मानवीय संबधों को चालित करतेे हैं। यह सच है कि नर, नारी के संबंधों की सुकुमार प्रवृत्ति यॉ ही मानव सभ्यता को गतिशील करते हुए ऊॅचाई तक ले जाती हैं। चर्चित लेखक रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ नर, नारी के मानवीय संबंधों की विसंगतियों के धरातल पर बुना गया उनका नया उपन्यास है। नारी को उपभोग की वस्तु मान कर उसके साथ बनाए जाने वाले संबंधों की परिणति ‘एड्स’ जैसे रोग तक जा पहुॅचती है। यह कितना भयानक होता है इसका अनुमान किसे नहीं। आखिर देह व्यापार का मामला आज केी विकसित दुनिया क्यों नहीं खतम कर पा रही है अचरज होता है। देह को भी व्यापार की वस्तु बना दिया गया है। मन, तथा वुद्धि के बेचे जाने का तो बाजार ह हीै, दोनों बेचे जा रहे है बाजार में, दोनों के कानूनी तथा गैर कानूनी बाजार हैं। बिक दोनों रहे है तन भी मन भी। देश के पूर्वोत्तर र मंे स्थित उ0प्र0 का सोनभद्र जिला पहाड़ी और आदिवासी बाहुल्य है। इन आदिवासियों के सुख-चैन मे सेंध लगाते हुए कल-कारखानंे इन्हें किसी लायक नहीं छोड़ रहे हैं। इनकी पुस्तैनी जल, जंगल और जमीन पर से इनके विस्थापन का दंश इनके अस्तित्व को समाप्त करता जा रहा है क्योंकि, इन्हें इनसे मिलता है, चिमनियों का काला धुआं, कारखानों से निकलता विषाक्त जल जिससे वे असमय ही मृत्यु के मुह मंे समा जा रहे हैं। प्रदूषण की मार सहते हुए ये आदिवासी आर्थिक तंगी का भी सामना कर रहे हैं। भुखमरी की समस्या के समाधान के लिए परदे के अन्दर-अन्दर इनकी बहन-बेटियां देह बेचकर अपने परिवार की भुखमरी की समस्या का समाधान कर रही हैं, जिसकी जानकारी प्रकाश मे आ रही है। शिवेन्द्र का उपन्यास ‘‘कनफेशन’’ देह-व्यापार और उससे उपजी विसंगतियों का विस्तृत पड़ताल करता हैं, जो कथानक व शिल्प के स्तर पर अपनी तरह का नया है। देह-व्यापार के दलदल में फंसे एड्स रोगियों की समस्या व उसके समाधान के लिए एक संस्था के माध्यम से एक युवती के सर्वेक्षण की रिपोर्ट अत्यंत रोचक व चौकाने वाली है। एक एन.ज.ी.ओ. से जुड़ी शशि जिसकी उपन्यास में प्रमुख भूमिका है उसका पति खुद भी देह-कौतुक में फंसकर एड्स का मरीज हो गया है। वह अपनी पत्नी पर देह के विविध खेलों का प्रतिभागी होने के लिए घृणित दबाब डालता है जिसे वह निर्ममतापूर्वक ठुकरा देती है। और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए एक संस्था में कार्य करने लगती है। शशि के अलावा उपन्यास में कई महिला पात्र हैं, जो अपने अस्तित्व के लिए जद्दोजहद करती हुई औपन्यासिक कृति ‘कन्फेशन’ की औपन्यासिक कथा की ताकत बनती हैं। आज जहां, सामाजिक समानता के लिए राजनीतिक क्षेत्र मंे स्त्री सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया जा रहा है, वहीं साहित्य के क्षेत्र मंे भी स्त्री-विमर्श के नाम पर स्त्री पात्रों को कहानियों व उपन्यासों में भी इन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए दिखाया जा रहा है। समीक्ष्य उपन्यास में पुरूष पात्रों की संख्या नगण्य है पहला पुरुष पात्र तो उपन्यासकार खुद है और दूसरा एक वी.डी.ओ. है कुछ जो दूसरे पुरुष पात्र हैं वे तो केवल पूरक हैं फिर भी उपन्यास नारी विषयक उपन्यासों से अलग है कथ्य, तथ्य तथा भाषा के स्तर पर। रामनाथ ‘शिवेन्द’्र के उपन्यास ‘कनफेशन’ की स्त्री पात्र घर से बाहर निकलकर विभिन्न स्तर पर संघर्ष कर रहीं हैं। शशि के अतिरिक्त एक और पात्र है लाैंगी, जो घर के खाना- खर्चे का भार स्वयं अपने सिर पर उठाती है। उसका पिता बीमार हैं घर में कमाने वाला कोई नहीं है। पेट खर्ची के लिए उसकी अइया (मॉ) उसे देह व्यापार में झोंक देती हैं। एक दिन वह प्रधान से पैसे लेकर उसे उसके यहां भेजती हैं, जहां प्रधान उसकी देह नोचता खसोटता है। वह अपनी अइया से इसकी शिकायत करती है परन्तु अइया नहीं सुनती, उसे ही भला बुरा कहती है। वह थाने भी जाती है पर थाना उसे ही रपट बना देता है। लौंगी प्रधान से प्रतिशोध लेने के लिए उसे, और फिर उसके बेटे को अपना एड्स रोग बांटने की कोशिश करती है। क्योंकि उसे एड्स है वह जानती है कि एड्स देह धरे का रोग है, देह संबंध से ही फैलता है। वह परधान को एड्स में फसा देती है। एक दिन परधान मर जाता है। ऐसा भी नहीं कि वह यह धंधा करते हुए विल्कुल ही संवेदनशून्य हो गई हो। स्त्री की स्वाभाविक संवेदना उसके भी अन्दर है। साथ ही शारीरिक करतब भी। तभीं तो बी. डी. ओ. जिसकी पत्नी मर चुकी है, उसके शारीरिक व संवेदनात्मक कौतुक पर वह आकर्षित है। यहां तक कि उसे एड्स है, यह जानकर भी। इसीलिए लाैंगी भी बी.डी.ओ. से सहवास के वक्त कंडोम लगवाना नहीं भूलती। वह तो कभी की उससे शादी कर चुकी होती, परन्तु लौंगी को अपनी जिम्मेवारियां अच्छी तरह याद हैं। घर की परवरिश उसे ही करनी है! साथ ही बी. डी. ओ. का भी ख्याल रखना है कि उसे एड्स न हो जाय। उस आदिवासी बाला से बी.डी.ओ. का भी प्रेम खूब कुलांचे भर रहा है। यहां तक कि लौंगी के बीमार हो जाने पर उसे अस्पताल मे भरती करवाना व उसकी रात-दिन तिमारदारी करना साथ ही दवा-दारू में पैसे की कमी न होने देने तक बी. डी.ओ. उसका ख्याल रखाता है। उपन्यास में एक और औरत है, थाने वाली महिला के नाम से, वह थाने पर अपने पति को छुड़वाने के लिए जाती है तो, थानेदार उसे ही अपने हबस का शिकार बना लेता है फिर तो थाने वाली महिला आग बन जाती है मानो जला देगी थाना। वह थाने पर ही हंगामा कर बैठती है। वह थानेदार के निलंबन तक संघर्ष करती है। थाने वाली महिला तो उपन्यासकार को भी नहीं छोड़ती फटकारती है, अपनी मौलिक शैली में.... ‘‘तूं का लिखेगा मेरे बारे में? तूं भी तो मरद जाति का है, थूथुन वाला, कहते हैं, नाक न हो तो मैला खाने वाला, तूं का जानेगा मेहरारू के बारे में कि मेहरारू का होती हैं। मेहरारू को तूं जब जैसा चाहता है वैसा गढ़ देता है कभी देवी बनाता है तो जरूरत के हिसाब से रण्डी बना देता है। देवी बना कर माला फूल चढ़ता है, तो रण्डी बना कर जोंक की तरह चूसता है, देह को बिछौना बना देता है, खुश, हुआ तो खेत बना कर जोतने कोड़ने लगता है, बेंगा डाल देता है, खेत में जब बेंगा पड़ जाता है तो कुछ न कुछ जामेगा ही। जाम जाने के बाद दूसरा बेंगा डालने के लिए उसे फिर जोत भी देता है। देखना है तो दारोगा को देख कि वह का कर रहा? फिर दारोगा को भी तूं काहे देखेगा, खुद अपने को देख ले, तोहरे मुहें में मेहरारून के बारे में विषैला लार है कि जलता हुआ लोर है। पर तोहरे पास लोर कहां से होगा? लोर तो मेहरारून के पास होता है, जो उनके दिलों को लगातार हिलोरता रहता है।’ पृ..73 इन महिलाओं के अतिरिक्त एक अन्य महिला पात्र लाजवंती भी है, जो देह की सीढी से चढकर नौकरी तक की उंचाई प्राप्त कर लेती है और अपने पिता पर चढे कर्ज को उतार देती है। देह के धंधे सड़क के किनारे होटलों व ढाबों में निरन्तर हो रहे हैं, जिसकी जानकारी एक सामाजिक कार्यकर्ता शशि को एड्स के रोगियों से मिलने के दौरान होती है। इस उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार ने कुछ अपनी धारणाओं व प्रस्थापनाओं को भी उकेरा हैे। क्या पत्नी का अधिकार अपने शरीर पर भी नहीं है? वर्ण, जाति व गोत्र की तरह स्त्री स्वातंत्र्य का भी सवाल अनुत्तरित है। उच्च पदाधिकारी जनता का व्यक्ति नहीं होता, वह जनता से एक निश्चित दूरी बना कर रहता है।’ सोनभद्र में पचासों चेकडैमों के नाम पर करोड़ों रुपयों का गमन किया गया, जो जांच के दौरान उजागर हुआ था, उपन्यासकार ने इसे उपन्यास में वर्णित कर उपन्यास का वजन बढाया है। उपन्यासकार ने एक उपन्यासकार के अस्तित्व-बोध पर भी सवाल खड़ा किया है कि वह अनुत्पादक कार्यों मे अपना जीवन खपा देता है। उसे हासिल कुछ भी नहीं होता। प्रकाशक तक उसकी उपेक्षा करते हैं पाठकों की तो बात ही अलग है। सेक्स जोन के गांवों मंे जिस परिवार में देह व्यापार से जितना अधिक धन-संग्रह होता है, उस परिवार की इज्जत गांव मंे उतनी ही बढ जाती है। देहव्यापार को मर्यादा से जोड़ना आखिर कैसा सन्देश देता है? सवाल है? प्राकृतिक आपदा के चलते जब कोई किसान खेत का मालगुजारी या पनिकर नहीं दे पाता, तो उस किसान को चौदह दिनों तक तहसील की हवालात मंे किस बात की सजा काटनी होती हैं? यह सवाल उभरा है लाजवंती के बहाने। लाजवंती अमीन की डर से तहसीलदार के पास जाती है फरियाद करने के लिए कि उसके बाप को गिरफ्तार न किया जाये। उसकी फरियाद सुन व गुन लेता है तहसीलदार। उसके बाप को तहसील की हवालात में नहीं जाना पड़ता। फरियाद सुनने के एवज में तहसीलदार लाजवंती की देह से खेलता है, यह बात और है कि उसे तहसील में नौकरी भी दिलवा देता है। पर ऐसा सभी के साथ तो होता नहीं वह तो महज संयोग का खेल था कि लाजवंती को नौकरी मिल गई नही ंतो कुछ नहीं मिलता सिवाय अपमान के। ज्ञातव्य है कि सोनभद्र के गरीब, किसान कर्ज वसूली के संकट से लगातार गुजरते रहे हैं। उपन्यास की भाषा भी खूब खूब है... देखें.... ‘नेह अगर है तो, देह नहीं झूलती। मर्द के पास लार व स्त्री के पास लोर ही तो होता है। मर्द जब चाहे तब जिस पर चाहे लार टपका दे, और औरत दुखों मे सिर्फ आंसू ही बहाती रहे।’ ‘मर्द और बर्द पर जवानी का जुआ रख दीजिए और जहां चाहे तहां ले चलिये।’ ‘अनब्याही बाला को यदि बच्चा पैदा हो जाता है, और जिसकी करनी से बच्चा पैदा हुआ हो, वह व्यक्ति बच्चा लेने से या उस औरत से शादी करने से इंकार करता हो तो मां को चाहिये कि,उस बच्चे को निःसंकोच पालपोष कर बड़ा करे और बाप से बदला लेने के लिए उसे तैयार करे। गर्भ में या पैदा होने पर बच्चे की हत्या न करे।’ उपन्यास में एक नारी पात्र है लौंगी जो सेकेन्ड सेक्स की ‘फुकुयामा’ की अवधारणा से अधिक स्वतंत्र व संघर्षशील है। पीत पत्रकारिता को भी लेखक ने एक पात्र के माध्यम से आड़े हाथों लिया है, जो पठनीय बन पड़ा है। प्रकाशकों द्वारा लेखकों को प्रताड़ित करने की बातें भी उपन्यास के माध्यम से कही गई है। लेखक स्वयं को भी नही छोड़ता है। वह कहता है कि, ‘जैसे थानेदार महिला से बलात्कार करता है ठीक उसी तरह से एक लेखक भी महिला को जहां चाहे तहां पटक देता है उपन्यास में। लेखक भी महिला को लेकर कम दोशी नहीं।’ उपन्यासकार का मानना है कि, जाति व योनि के दोनों कटघरे पूंजीमूल्यबोध का ही प्रचार करते हैं। स्त्री-स्वातंत्र्य के प्रसंग में लेखक ने स्वीकार किया है कि, काश! स्त्री और पुरुष के रिश्ते नदी और कहू (अर्जुन का पेड़) की तरह होते। नदी न तो पेड़ का गिराती है और न ही पेड़ नदी को क्षतिग्रस्त करता है, दोनों अर्न्तलयित होते हैं एक दूसरे में । एक मिथक का भी प्रयोग उपन्यासकार ने बखूबी से किया है। ‘‘हां, वहीं त्रिशंकु जिसे स्वर्ग के रक्षा-कर्मियों ने स्वर्ग में घुसने नही दिया। किसी तरह वह नर्क से बाहर निकला, फिर लटक गया, स्वर्ग ओर नर्क के बीच जिसके आंसुओं, खखारों और लारों से धरती पर कर्मनाशा नदी बह निकली, किसी शोक कविता की तरह।’’ प्रभावकारी भाषा, तथा कलात्मक शिल्प के द्वारा उपन्यासकार ज्वलंत सवालों पर अपनी राय देने में पीछे मुड़कर नहीं देखता। सोनभद्र में एक ओर भूख से कराहते व बिलबिलाते लोग हैं तो दूसरी ओर तिजोरियों से खेलते लोग। नोटों के बिस्तरेां पर धनी होने के धार्मिक अनुष्ठान करते हुए।’’ घृणित दर्जे की यह आर्थिक असमानता सोनभद्र में वाम उग्रवाद के फैलाव के कारणों में से है। शशि के पति की आत्महत्या वाली घटना पर एक आदिवासी बाला की स्वाभाविक साफ बयानी यहां देखने योग्य है..... ‘‘एड्स हो गया था तो क्या हो गया। यह तो पहले गुनना चाहिये था न ! फेर आत्महत्या से रोग खतम होगा का ?लौंगी को भी तो एड्स हुआ हैे। वह तो आत्महत्या नहीं कर रही। लड़ रही है समय से....शशि के पति को भी लड़ना चाहिये था रोग से...।’’ आदिवासियों की जमीनें जहां से वे विस्थापित कर दिये गये, वहां बड़े-बड़े कल-कारखानें बना दिये गये हैं। उन कल-कारखानों में भी इन आदिवासियों को रोजगार नहीं मुहैया कराया गया, जो बड़ी त्रासदी है। लेखक ने कारखानों की चमक -दमक की दुनियां की आड़ मंे फैल रहे देह-व्यापार के इस विष-बेल को, जो बड़े फलक वर व्याप्त है, को एक छोटे से उपन्यास में करीने से कहने का करिश्माई कार्य किया है। उपन्यास के सभी चरित्र जीवन के खुरदरे रपटों को सही- सही कनफेश करने मे कहीं से कोताही नहीं करते। किसी न किसी बहाने सभी पात्र कन्फेश करते हैं चाहे लौंगी हो, लाजवंती हो, या शशि का पति हो। उपन्यासकार भी कन्फेश करता है वह अंश यहां प्रस्तुत करना आवश्यक जान पड़ता है.... देखें उक्त अंश... ‘साला उपन्यासकार बनता है। एक दारू चुआने वाली आदिवासी महिला को पकड़ लिया उपन्यास में और उसे कप्तान तक पहुंचा दिया। अक्षरों की गाड़ी पर बिठा कर, दौड़ाने लगा किसी रेसर की तरह। इतना तेज किस्मत के भरोसे वाले किसी पात्र को दौड़ाया जा सकता है भला! वह भी उपन्यास में, फिल्म की बात दूसरी है, पात्रों को चाहे जितना दौड़ा दो, एक अदना सा हीरो आठ दस आदमियों को मार गिराता है। ऐसा तो केवल फिल्म में ही चलता है पर उपन्यास में... फिल्म की रील की तरह पन्नों को फड़फड़ना ठीक नहीं, संभल कर चलना होता है। उपन्यास में तो एक कदम भी गलत उठा तो शीलभंग होना निश्चित है। किसी लड़की का शीलभंग होने तथा उपन्यास के शीलभंग होने में धागे भर का भी अंतर नहीं.. लेखन की शुचिता भी तो कोई चीज होती है नऽ।’ पृ...63 शशि का पति जो, देह के कौतुकों में फंसकर अपना जीवन वरबाद कर चुका था, और जिसे वह त्याग ही चुकी थी, वह भी अन्त में मरने से पहले एक चिट्ठी छोड़ जाता है, जिसपर शशि कहती है कि.... ‘‘वे दस दिन अस्पताल में पड़े रहे, ऐसा नहीं था कि, मैं उनकी सेवा न करती,... एक चिट्ठी छोड़ गये हैं हमारे नाम, चिट्ठी क्या है, मृत्यु-शैय्या पर पड़े आदमी का कनफेशन है। एक तरह से वह चिट्ठी मृत्यु का दस्तावेज है।’’ उपन्यास में पाठकीय आकर्षण है। अस्तु यह ‘कनफेशन’ उपन्यास अत्यंत पठनीय है। समीक्ष्य उपन्यास उपन्यास- कनफेशन लेखक-रामनाथ ‘शिवेन्द्र प्रकाशक-मनीष पब्लिकेशन,दिल्ली 441/1 मूूल्य-600/ -7-
मनीष पब्लिकेशन 
४७१/१०,एब्लाक, पार्ट २
सोनिया बिहार, दिल्ली,
दिल्ली
shivendra

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