यादों में एम.ए. खान

 



असुविधा  का अंक  जुलाई-दिसंबर २०१३  ऍम.ए. ख़ान  पर केंद्रित     
               

                                        यादों में एम.ए. खान

 एम0 ए0 खान सोनभद्र के बारे में क्या सोचते थे, यहां के दलितों पीडि़तों के लिए क्या करना चाहते थे यह बात तो उनके साथ ही समाप्त हो गई पर उनकी सोच या विश्लेषण जो कई रिपोर्टों की शक्ल में आज भी उपलब्ध हैं, उनसे साफ पता चलता है कि सोनभद्र अभी भी डरावने अन्धेरे में भटका हुआ है, वे इसी अंधरे को हटना चाहते थे.
सोनभद्र के निवासी, पुराने कामरेड, अच्छी देह-भुजा वाले थे, एम.ए. खान साहब. जिनकी शिक्षा-दीक्षा उर्दू तालीम में हुई थी पर वे अंग्रेजी व हिन्दी भी जानते थे, उनका दखल कविता व कहानी में भी था, वे एक्टिविस्ट होने के साथ साथ साहित्यिक भी थे. उनकी जुबान पर मीर, गालिब हमेशा थिरकते रहते थे. उनका जीवन जो कभी उनका था उस दौर में वे कामरेड थे, सी.पी.आई. वाले यानि जवानी के दिनों में. उनका कामरेड होना उनकी अपनी प्रति-क्रिया थी, एक ऐसा विरोध था जो उनका अपने और अपनांे से था क्योंकि वे उच्च मध्यवर्गीय सरंचना वाले परिवार के थे. वह उन्हें कुबूल न था, वे सामान्य थे और अपनी सामान्यता खोना भी नहीं चाहते थे. 
उनके दादा-परदादा जौनपुर से सोनभद्र इसलिए लाये गये थे क्योंकि वे लोग अंग्रेजों के काफी नजदीक थे तथा बड़ी-बड़ी ठेकेदारियां किया करते थे. सोनभद्र में तब धंधरौल बांध का निर्माण कराया जाना अंग्रेजों ने सुनिश्चित कर लिया था....वे लोग उसके ठेकेदार हो गये, फिर यहीं बस भी गये, सैकड़ों साल का फासला एम.ए.खान के लिए एक लम्बा फासला था. एम.ए.खान तहजीबी एवं घरेलू शिक्षा दीक्षा से अलग होकर एक ऐसे समाज का हिस्सा बनना चाहते थे जिस पर मजहबों, पाखंडों व अन्ध-विश्वासों का दखल न हो. वही हुआ वे कामरेड बन गये. एम.ए.खान साहब शायद जीवन की आखिरी सांस तक कामरेड ही बने रहते पर 1975 के आपातकाल ने उनसे उनकी कामरेडियत छीन ली, कामरेडों द्वारा आपातकाल का समर्थन किया जाना, श्रीमती इन्दिरा गांधी की तानाशाही स्वीकारना जाहिर है किसी तानाशाह की पालकी ढोना एम.ए.खान को कुबूल न था सो उन्होंने कम्युनिस्टि पारटी छोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से ‘जनसेवा केन्द्र’ नामक संस्था चलाने लगे. 2004-2005 में एम.ए.खान को किसी तरह एक्शन एड नामक धनदाता संस्था से धन आवंटित हुआ.......1973 से लेकर 2004 तक के एम.ए.खान व 2004-2005 तक के एम.ए.खान में आये फर्क को भली भांति समझा जा सकता था. वह फर्क आर्थिक कार्यव्यवहार के फलस्वरूप आया था, एक ऐसा फर्क जो आदमी को मशीन में बदल दे, एम.ए.खान के स्वभाव में नहीं कि वे अपना व्यक्तित्व पूरी तरह यांत्रिक बना देते तथा उतना ही सोचते, वैसा ही सोचते जैसा कि फण्डर सोचता है, क्योंकि एम.ए.खान जिस दृष्टि से सोनभद्र को देखते आ रहे थे वह दृष्टि थी सामाजिक बदलाव की, आर्थिक व सामाजिक बराबरी की, अपने अधिकारों की लड़ाई की, जैसा कि एम.ए.खान ने 2004 के पूर्व  सोनभद्र के बारे में विचारा था.......

अपने विचारों को पुष्ट करने के लिए एम.ए.खान ने सोनभद्र में सरकार द्वारा चलाई जा रही लोक कल्याणकारी योजनाओं के प्रमुख कार्यक्रमों....जैसे बैंक ऋण, पट्टा आवंटन, खाद्यान्न वितरण (सरकारी सस्ते गल्ले की दूकानों), समाज कल्याण के कुछ कार्यक्रमों का सर्वेक्षण किया और पाया कि सरकार के सारे कार्यक्रम या तो शिथिल हैं या हैं भी तो दलाली के कारण प्रभाव हीन हैं, उनमें वह गतिशीलता नहीं जो समाज के कष्टकर सांचे में अंश-मात्र भी बदलाव ला सके. सामाजिक व कानूनी जागरूकता के सन्दर्भ में भी एम.ए.खान ने सामाजिक अध्ययन किया तो पाया कि मानवाधिकार जैसा अधिकार तो किसी स्वप्न-लोक की प्रक्रिया है..... लोग बाग नही जानते कि, अधिकार क्या होते हैं फिर वे क्या जानेंगे कि मानवाधिकार क्या हैं. जो उन्हें सरकार द्वारा कथित रूप से सहज ही उपलब्ध हैं? फिर तो एम.ए.खान ने कानूनी जागरूकता कार्यक्रम के तहत कई ऐसे कार्यक्रम चलाये जो समाज को कानूनी साक्षरता के लिए प्रेरित करने वाले थे. वे आजीवन आशान्वित थे कि विपरीत परिस्थितियों में भी सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम संचालित किए जा सकते हैं. फलस्वरूप वे ‘चैपाल’ जन संगठन के जरिए सक्रिय हो गये थे और जीवन के अन्त तक उसी को सफल बनाने में लगे रहे.
एम.ए.खान कुछ अलग किस्म के पेचीदा व्यक्तित्व वाले थे सो वे सरकार के उन कार्यक्रमों को अनावश्यक मानते थे जो दान, प्रतिदान की आर्थिक गतिविधियों द्वारा चालित होते हैं, उनका मानना था कि आर्थिक सहायता, समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या का प्रांरभ है. ऐसी स्थिति में उत्पादन व कमाई के साधनों में ‘समान अवसर’ प्रदान करने की रणनीति ही कारगर हो सकती हैं. क्योंकि गरीबी का समाधान आसान नहीं, काफी पेचीदा है. गरीबी का कारण है असंतुलित रूप से उत्पदन संबधों की बहाली और उसकी कानूनी मान्यता. एम.ए.खान द्वारा सोनभद्र के बारे में जुटाई गई सारी सामग्री हालांकि विशेष अध्ययन की माॅग करती है फिर भी इतना साफ है कि एम.ए.खान ने सोनभद्र को काफी नजदीक से देखने, जांचने का काम किया था, तथा पाया था कि यहां कम से कम आदिवासी क्षेत्रों में सघन अन्धेरा है, यहां इतिहास मर चुका है तथा विकास पूरी तरह घायल व चोटिल है.कभी डा0 राममनोहर लोहिया ने कहा था ‘गरीबोें में गरीबी की भूख तथा अमीरों मंे अमीरी की संतुष्टि पैदा हो जाये तो समाज का नक्शा ही बदल जाये.’ सोनभद्र को समझने के लिए एम.ए.खान ने सामाजिक व आर्थिक रूप से संपन्न सामाजिक ताकतों की क्रूर निष्ठुरताओं को भी समझा था तथा यहां के कारखाना वालों को भी जो सी.एस.आर. तक का सारा रुपया डकार जाते हैं., उनका मानना था कि यहां का समाज इतना अतीत जीवी है कि वर्तमान के जीवित बोध व जीवन जीने के लिए वांक्षित हस्तक्षेपों तक को जानता ही नहीं, एक तरह से आत्मजीविता का परम.
बतौर एन.जी.ओ. संचालक एम.ए.खान काफी हताश व निराश थे तथा फण्डरों की अन्र्तनिहित संस्कृति से काफी परेशान भी. उन्हें नहीं लगता था कि एन.जी.ओ की गतिविधियां कभी ऐसी हो सकती हैं जो सरकारी गतिविधियों से अपने स्वरूप, प्रभाव, विस्तार, क्रिया-कलाप आदि में भिन्न होंगी. एन.जी.ओ. की कुल सीमा सरकार व सरकारी आशयों को सुनिश्चित रखने व किसी सार्थक बदलाव की प्रतिक्रियाओं को रोकने तक की है.’

उपरोक्त अंश मेरी पुस्तक समय समाज और हस्तक्षेप से लिया गया है जिसे उनके जीवन काल में ही लिखा गया था. मुझे क्या पता था कि पांच छह साल बाद ही मुझे इस अंश को पुनः प्रकाशित करना पड़ेगा. वे अचानक हमलोगों को छोड़ कर चले जाएंगे और भूत बन जाएंगे. एक अभूतपूर्व आदमी का भूत बनना काफी अखरता है.
असुविधा अपने सीमित साधन के अन्दर मरहूम एम. ए. खान के लिए जो कर सकती है कर रही है. इससे अधिक इसकी क्षमता नहीं. उन्हें याद रखने के लिए उनकी कहानियों पर असुविधा का यह अंक एक छोटा सा प्रयास भर है वैसे तो उनकी कविताओं का संग्रह भी तैयार है जिसे एक पुस्तक की शक्ल दी जा सकती है. पर अपनी आर्थिक अक्षमता के कारण हम इस अंक में केवल कुछ कहानियां व कवितायें ही दे पा रहे हंै जबकि उनकी संख्या बहुत अधिक हैं. सामाजिक सर्वेक्षणों तथा रिपोर्टों की तादात तो अनगिनत हैं पर उन्हें छापने वाला कोई नहीं. जब खान साहब जीवित थे तब तो बहुत सारे लोग थे जो उनसे कहा करते थे यह करूंगा, वह करूंगा. समय गुजरता गया कोई सामने नहीं आया उनके खास मित्रों ने भी उनसे कन्नी काट लिया. खैर ऐसा ही होता है.
एम.ए. खान की यादों में मैं अगर गोते लगाने लगूं तो पूरी उमर खतम हो जाएगी फिर भी काम पूरा नहीं होगा. सो उसमें इस समय जाना मुनासिब नहीं. उनके छोटे भाई महमूद खान आज मेरे साथ हैं, शाम को प्रतिदिन हमलोग एक साथ बाजार में निकलते हंै और दुनिया की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा परिचर्चा करते हुए, कम से कम दो घंटे तो हमलोग एक साथ गुजार ही देते हैं. ऐसा पहले एम.ए. खान के साथ होता था. बाजार में जब भी हमलोग निकलते एक साथ ही हालांकि हमलोग बातचीत में दो घ्रुवों की तरह होते, साथ में अशोक तिवारी वकील भी होते, हमलोगों की हां मं हां करने के लिए. 
कानूनी जागरूकता वाले कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से वह मुझे ले जाता था, साथ में जे.पी. के सलाहकार रहे प्रोफेसर बी.एन. ज्वाल होते तो कभी मीरजापुर के शमशाद भाई. गरीबों के बीच जाना उनसे बातें करना हम सभी को प्रभावित करता था. वे हमारे लिए खाना बनाते खिलाते और हसते हुए बिदा करते. मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि सोनभद्र के गरीबों, दलितों, शोषितों, उपेक्षितों के बीच जाने का मौका मुझे एम.ए.खान के साथ के कारण ही हासिल हुआ करता था. उन्हीं अनुभवों को मैंने अपने उपन्यासों में संग्रहित किया भी. वहां मुझे ऐसे ऐसे जीवित पात्र मिले जो वास्तव में कहानियों व उपन्यासों के लिए भी जीवित थे. प्रत्यक्षरूप से उनकी ऊर्जा का साक्षात्कार मेरे लिए अचरज भरा था. उनके जीवन जीने का उत्साह तथा विषम परिस्थितियों से टकराने की क्षमता मुझसे बरबस ही सलाम करवा लेती थी. मैं तो उनके सामने नतमस्तमक हो जाया करता था. 
इस अंक में दी जाने वाली सारी कहानियां एम.ए. खान के टाइप शुदा कहानी संग्रह की पाण्डुलिपि से ली गई हैं. यह प्रति मुझे उनके पुत्र द्वारा उपलब्ध कराई गई है. खान साहब ने कहानी की भूमिका के बारे में जो लिखा है उसे ज्यों का त्यों देना गलत नहीं होगा...
‘मैं कोई साहित्यकार या लेखक नहीं हूं, लेकिन आस पास के माहौल से मुतअसिसर होना आदमी की फितरत में है, मैं भी आदमी हूं, क्या करता, जिन्दगी 

के लम्बे सफर के दौरान कभी दिल ने रोया, कभी आंखें नम हुईं, जब कुछ न बन पड़ा तब कागज और कलम का सहारा ले कर मैंने अपने आप को समझाने की कोशिश की है. लिखना मेरा पेशा नहीं, शौक है. लिखा ढेर सारा लिखा, मगर बदकिस्मती यह कि कुछ बच्चों के हाथ लग गया और कुछ पुलिस उठा ले गई. दोनों का हस्र बराबर रहा. बचा खुचा ‘आह और वाह’ की शक्ल में समेटने की कोशिश किया है. मैं अच्छी तरह जानता हूं कि जो कुछ मैंने लिखा है, एक ंकंजूस के माल की तरह सिर्फ मुझे ही सकून दे सकता है, उसे छापने वाला कभी कोई नहीं मिलेगा, मगर सनक तो सनक है.’
यह भूमिका खान साहब ने 18 अगस्त 1997 को लिखा था. प्रस्तुत कहानियां भी उसी समय की हैं जो आज भी ताजा और जरूरी लगती हंै. यह बात अलग है कि इन कहानियों में कई तरह की शिल्पगत कमियों को गिनाया जा सकता है पर कहानियां जो कहना चाहती हैं उसका लक्ष्य साफ है. उसमें कलात्मक छलावा नहीं है और नहीं भाषा का जादुई कारोबार.
एम.ए. खान साहब के बारे में बातें करते हुए मुझे आवश्यक लगता है कि उनके उस ब्यक्तित्व की भी चर्चा की जाये जो थाने से शुरू होती है. थाना यानि डर और भय पैदा करने वाला संस्थान.. पर खान साहब के लिए थाना घर जैसा था, दो तीन माह भी नहीं गुजरता था कि अभिनव किस्म के जनान्दोलन के कारण वे थाने के हवालात में होते थे. उस समय उनकी मुस्कराहट देखने लायक होती थी. एक बार का किस्सा बताना गलत नहीं होगा... खान साहब को स्थानीय थानेदार ने कई अपराधिक दफाओं में गिरफ्तार कर लिया... खबर पूरे रावटर््सगंज में पसर गई, मुझे भी मालूम हुआ मैं कुछ साथियों के साथ थाने जा पहुंचा.. पर वहां तो खान साहब को गिरफ्तार कर लेने का गरूर नाच रहा था. कुछ ही देर में थानेदार ने खान साहब को मजिस्टेªट के सामने पेश करने का प्लान बनाया थाने पर भीड़ जमा करने से कोई लाभ नहीं. उन्हें मजिस्टेªट के सामने पेश किया जाना था तब तक मैंने शहर के कई नामी फौजदारी वकीलों को बुला लिया था. मैं तब वकालत में एकदम नया था. हमलोगों के सीनियर और काबिल वकील महेन्द्र सिंह भाई भी हमलोगों के साथ थे. करीब एक घंटे बाद खान साहब को मजिस्टेªट के सामने पेश किया गया. मैंने वकालत नामा पर महेन्द्र्र सिंह भाई साहब का नाम लिख दिया था. मजिस्टेªट ने उनका नाम देखा... भाई साहब तो मजिसटेªट के सामने थे ही. मजिस्टेªेट ने भाई साहब को बैठने के लिए कहा और
‘इस केस में आप भी है क्या भाई साहब?’ मजिस्टेªट ने भाई साहब से पूछा...
‘हां साहब!’ 
‘इस केस के बारे में क्या कहना है आपको,?’ 
‘कुछ नहीं साहब केवल इतना ही कहना है कि आपके बंगले के सामने नगर के प्रतिष्ठित और सम्मानित करीब तीन सौ लोग खड़े हैं और प्रार्थना कर रहे हैं कि खान साहब की जमानत हो जाय, पुलिस ने उन्हें जान बूझ कर हवालात में ड़ाल दिया है और फर्जी मुकदमे में फसा दिया है. सभी लोगों को आपसे उम्मीद है कि खान साहब के साथ अन्याय नहीं होगा...’
जमानत हासिल करने के लिए महेन्द्र सिंह भाई साहब की बहस पूरी तरह मानवीयता से भरपूर प्रार्थना थी. जिससे कानून का कुछ लेना देना नहीं था. 
//5//
मजिस्टेªट भी एकदम से अलग मिजाज के थे. उन्हें भाई साहब की बहस में  कानून से अलग मानवीय आद्रता महसूस हुई और उन्होंने जमानत मंजूर कर लिया. उनके साथ बैठे हुए ही भाई साहब ने भीड़ की तरफ इशारा किया. फिर क्या था...
‘इन्कलाब जिन्दा बाद’ का नारा गूंज उठा.
तो इस तरह खान साहब आजाद हुए. एक ऐसा आदमी जो बार बार गिरफ्तार हो कर अपनी आजादी गंवाना ही सामाजिक जागरूकता का माध्यम मानता रहा हो वह आदमी हमारे शहर के लिए अज़नबियत का शिकार भी रहा, एक तरह से उपेक्षित. उसके जीवन काल में उसे कभी गंभीर नहीं माना गया कुछ खास लोगों को छोेड़कर. जीवित लोगों में अजय शेखर, अर्जुनदास केसरी, मनोहर खाम्बे, श्यामनारायण लाल एडवोकेट, मुनीर बख़्श आलम तथा मैं खुद गिने चुने ऐसे लोग थे जो एम.ए. खान में अपनापन देखा करते थे. वे थे भी अपनों का अपना पर समय ने उनका कभी साथ नहीं दिया. उनके बारे में एक और बात साफ है अगर वे सामाजिक एक्टिविस्ट की भूमिका में न होते तो अपने समय के नामी कहानीकार होते. तमाम अबोध लोगों की तरह वे भी समय को भजाने के कलाकार नहीं थे. इस मामले में वह सोनभद्र के आदिवासियों की तरह सरल और तरल थे. उनकी यही सरलता और तरलता उन्हें कभी थाने पर ले जाती थी तो कभी कलक्टरी का घेराव करने के लिए उत्पे्ररित करती थी.
उनके द्वारा आयोजित कराए गए जनप्रतिरोध के कार्यक्रमों के तमाम फोटो उसके एलबमों में संग्रहीत थे, उनके उनके एकमात्र पुत्र ने उनका क्या किया, नहीं मालूम. मैंने और उनके छोटे भाई महमूद ने प्रयास किया कि वे अलबम मिल जांए तो उन्हें इसी अंक में प्रकाशित करा दिया जाये पर वे अलबम नहीं मिल सके. होता भी ऐसा ही है, पूंजी की विरासत लेने वाले तो बहुत होते हैं पर प्रतिरोध की विरासत कोई नहीं लेता. बहर हाल मुझे दुख है कि इस अंक में मैं उन तस्बीरों को नहीं दे पा रहा हूं जो एम.ए. खान के सामाजिक प्रतिरोध व जागरूकता के प्रमाण की तरह थे.
अपनी मृत्यु के तीन महीने तक वह आदिवासियों के अधिकारों की जनतांत्रिक लड़ाई की अगुआई कर रहा था. उसने अपने कार्यों का अधार क्षेत्र नक्सली क्षेत्र नगवां को बनाया हुआ था. वह वहां जनचैपाल के द्वारा मनरेगा में काम तथा मजदूरी दिए जाने, भूमि आवंटन. सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से खाद्यान्न वितरण. सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सामाजिक सेवाओं के कार्यों की निगरानी करता और उसके लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रयास भी. नगवां के करीब. दस गांवों को उसने अपने गांव सरीखा बना लिया था उनके दुख सुख में हरदम शामिल रहा करता था.
आशान्वित हूं कि असुविधा के तमाम अंकों की तरह एम.ए. खान पर केन्द्रित इस अंक को भी आपका पाठकीय सहयोग मिलेगा तथा प्रतिक्रिया भी. धन्यवाद.

दिनांक.. 21 अक्टूबर, 2013

 
                        

                                    गिरमिटिया गुनीलाल


गांव में कतल क्या हुआ पूरा गांव छावनी में तब्दील हो गया. जिस तरफ देखिए पुलिस और पी.ए.सी के जवान रायफल ताने घूम रहे थे. उनकी निगाहें जिस तरफ उठीं, उसका कलेजा कांप उठा. कातिलों का कहीं पता नहीं था. गांव में पुलिस के आने पर गांव का हर कोई घबरा रहा था, कौन जाने किसको पकड़ कर पुलिस वाले जिन्दगी खराब कर दें. मकतूल के दरवाजे पर गांव वालों की भीड़ जमा थी. कोई अफसोस कर रहा था तो किसी की आंखें नम थीं. कोई मकतूल की बुराइयों को दरगुज़र करते हुए उसकी अच्छाइयों का गुणगान कर रहा था. इन्हीं लोगों के बीच गुनीलाल भी खड़ा था.
वैसे तो गुनीलाल दूसरे गांव का निवासी था लेकिन दो माह पूर्व बैंक से कर्जा लेकर उसने उसी गाव में परचून की दूकान खोल ली थी. जो उसके रोजी रोटी के लिए काफी थी. गुनीलाल भी इस हादसे पर तकलीफ जाहिर करने के लिए ही मकतूल के दरवाजे पर भीड़ में शामिल था. बीस बाइस साल का नौजवान, गोरा चिठ्ठा, गठा हुआ जिस्म, पूरी भीड़ में अलग दिखाई दे रहा था. अचानक थानेदार की नज़र गुनीलाल के शरीर पर पड़ी.तो उसकी आंखों में चमक सी आ गई.
पंचनामा तैयार करा लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. सारा काम निपटा कर जब थानेदार खाली हुआ तो उसने गुनीलाल को अपने पास बुलाया और उसका नाम पता पूछा. यह जानने के बाद कि उसका बाप बगल के थाने का चैकीदार है, हमदर्दी जाहिर करते हुए बोला.‘तुम तो अपने विभाग के आदमी हो, जरा थाने तक चलो, तुम से थोड़ा काम है.’
गुनीलाल सहर्ष थानेदार की जीप में बैठ गया. थाने में उसे एक पेड़ के नीचे बैठा दिया गया. रात भर किसी ने वहां उससे नहीं पूछा कि तुम कौन हो और यहां क्यों बैठे हो. गुनीलाल मन ही मन सोच रहा था आखिर मामला क्या है? उसे क्यों बैठाया गया है? इतने में थानेदार ने उसे बुला कर पूछा..
‘देखो गुनीलाल साफ साफ बताओ कि तुमने कतल क्यों किया?’
थानेदार का सवाल सुनकर गुनीलाल के पैर के नीचे की जमीन ही खिसक गई. गुनीलाल किसी तरह बोला..
‘सरकार मैं एक गरीब आदमी हूं दुकान खोलकर बाल बच्चों की परवरिश कर रहा हूं, मैं कतल क्यों करूंगा?’
थानेदार ने गुनीलाल की सफाई की तरफ ध्यान नहीं दिया और बोला...
‘बोल बोल तुमने कतल क्यों किया अगर सीधे से नहीं बताओगे तो अंज़ाम बहुत बुरा होगा.’ 

गुनीलाल अपनी सफाई देने के लिए जुबान खोलने ही वाला था कि थानेदार ने एक सीधा झन्नाटेदार थप्पड़ उसके मुह पर मारा, उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया, उसकी समझ में नहीं आया कि मामला क्या है, उसके ऊपर कतल का इल्ज़ाम क्यों लगाया जा रहा.
‘बोल बोल तुमने कतल क्यों किया, जल्दी बता, अगर नहीं बताएगा तो जि़न्दा गाड़ दूंगा समझे,’ और इसी के साथ पूरी ताकत से थानेदार ने गुनीलाल की दाहिनी टांग पर जोरदार लाठी मारी, बेचारा आह करके रह गया, दूसरी लाठी पर उसने ज़मीन पकड़ लिया तीसरी और चैथी लाठी पर उसे चोट का एहसास हुआ फिर कितनी लाठियां पड़ीं इसकी कोई गिनती ही नहीं थी.
रात भर गुनीलाल कराहता रहा., तड़पता रहा, उसकी सुधबुध लेने वाला वहां कोई नहीं था. दिमाग पर जोर डालने के बाद भी उसकी समझ में नहीं आया आखिर इस दुर्गति का कारण क्या है?
सारा दिन बीत गया उसके मुंह में एक दाना भी नहीं गया. भूख के कारण उसका बुरा हाल था, ऊपर से चोट साल रही थी, जहां जहां थानेदार की लाठी पड़ी थी, रह रह कर वहां जलन हो रही थी आह भी नहीं निकल रही थी, कहीं दुबारा न पिटाई शुरू हो जाए. रात में उसे थोड़ी सी जुठी दाल और भात दिया गया, खाने की मात्रा इतनी कम थी कि उसकी भूख और भड़क उठी. मगर जितना कुछ मिला था उसी पर उसे सब्र करना था.
दूसरे दिन रात आठ बजे थानेदार के सामने उसकी दुबारा पेशी हुई, फिर वही सवाल दुहराया गया ‘बोल बोल तुमने कतल क्यों किया.’ गुनीलाल अपनी सफाई दे रहा था लेकिन थानेदार उसकी एक न सुन रहा था. केवल एक ही रट लगाए हुए था, ‘बोल बोल तुमने कतल क्यों किया’ थानेदार की बोल बोल तुमने कतल क्यों किया का उŸार नहीं मिला तो उसने दीवान से कहा..
‘मैं जरूरी काम से बाहर जा रहा हूं, मेरी वापसी तक इसकी जुबान खुल जानी चाहिए वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. समझे दीवान जी.’
दारोगा जी के जाते ही गुनीलाल के बदन पर धड़ाधड़ लाठियां बरसने लगीं. बेचारा पहले ही चोट खाए हुए था, बिलबिला उठा थोड़ी हिम्मत दिखाते हुए बोला.. ‘आप चाहें काट दें या जान से मार दें लेकिन मैंने कतल नहीं किया है. और नतो मैं उसके बारे में कुछ जानता हूं.’
लाल लाल आंखें निकाले हुए वहीं खड़ा एक सिपाही बोला...
‘सर ई तो हाई किरीमनल बुझाता है. इसका हाथ पैर तोड़ने के बाद ही कुछ पता चल सकता है. फिर क्या था. उसके पैर के पास एक ईंट रखी गई, उसी के पास दूसरी, उन दोनों ईंटों पर गुनीलाल के पांवों को इस तरह टिकाया गया कि वे जमीन से चार ईंच ऊपर रहें.. गुनीलाल हिलने डुलने न पाए इसलिए उसके ऊपर सिपाही उसकी कमर पकड़ कर बैठ 

गया. दूसरे सिपाही ने एक बड़ा सा पत्थर अपने शिर के ऊपर तक उठाया, बेचारा गुनीलाल अपने को इस हालत में पा कर कांप उठा.. बस दो से चार सेकेंड बाद वह अपाहिज हो जाएगा, उसके बाल बच्चों को कौन खिलाएगा, उसके बूढ़े मां बाप का क्या होगा? सोचने गुनने की उसकी ताकत पूरी तरह से समाप्त हो चुकी थी, अपनी जान की भीख मांगने की भी उसे होश नहीं थी. उसने अपने आप को मुकद्दर के हवाले करते हुए अपनी आंखें बन्द कर लिया इसी के साथ उसकी पीठ पर एक जोरदार ठोकर लगी. गाली बकता हुआ एक सिपाही चिल्लाया. गुनीलाल ने आंखें खोलीं तो फिर वही सवाल... ‘बोल बोल तुमने कतल क्यों किया. इस बार गुनीलाल चुप रहा उसने मान लिया कि उसे बरबाद होने से कोई रोक नहीं सकता.
सिपाही  गुनीलाल के पैरों पर पत्थर पटकने जा ही रहा था कि अचानक एक तीसरा सिपाही बीच में आ कर खड़ा हो गया. गुनीलाल के साथ अपनी हमदर्दी दिखाते हुए बोला..
‘आप लोग इसका पिन्ड छोड़ दें, बेचारा चैकीदार का लड़का है, मैं उसे जानता हूं, इसका बाप एक सीधा सादा आदमी है, यह लड़का आखिर कतल क्यों करेगा? हम मान भी लेते हैं कि इसी ने कतल किया है तो दारोगा जी जानें, हमलोग मार कुटाई करके अपने ऊपर पाप क्यों लें? चलो जी! चलो, मेस का बर्तन साफ करो, जो होगा देखा जाएगा,’ 
मगर उस सिपाही से वादा लिया गया कि अगर गुनीलाल भागा तो सारी जिम्मेवारी उसी की होगी.
दो दिन तक तो उसका बाप कल्लू अपने बेटे की वापसी का राह देखता रहा. उसके वापस न आने पर कल्लू तीसरे दिन थाने पर गया और अपने बेटे को घर ले जाने के लिए दारोगा से विनती करने लगा फिर क्या था.. दारोगा और सिपाही कल्लू पर चढ़ बैठे...
‘तुम एक खूनी को थाने से छोड़वाने आए हो, जानते नहीं कितना बड़ा जुरूम किया है, तुम चैकीदार हो इसी लिए तुम्हारे लड़के को बचाया जा रहा है, अगर इधर उधर करोगे तो जानते हो, केस लद जाएगा कतल का, फिर तो फासी ही होगी.
इकलौती औलाद के लिए फांसी का लफ्ज़ सुनकर गुनीलाल का बाप कल्लू कांप उठा. उसकी समझ में नहीं आया क्या करना चाहिए. जब उसके सामने कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया तो कल्लू घर वापस आ गया. लेकिन प्रतिदिन उसका नियम बन गया कि सुबह सुबह थाने पहुंच कर अपने बेटे का हाल अहवाल ले लिया करता था. दस दिन तक लगातार थाने का चक्कर लगाने के बाद भी गुनीलाल को थाने से नहीं छोड़ा गया तो कल्लू ने आगे बढ़ने की बात सोची, मगर हिम्मत जबाब दे गई. इन पुलिस वालों से बैर लेना आसान नहीं, आंख से आंसू निकल पड़े. 
थाने पर गुनीलाल को ठोंकपीट कर काम लायक बना लिया गया था अब 

उसकी मार कुटाई भी बन्द हो चुकी थी. मगर इसके बदले उसे सुबह चार बजे ही जागना पड़ता था. थाने की झाड़ू बहारू के बाद मेस का जूठा बर्तन साफ करना उसकी जिम्मेवारी में शामिल हो गया था. दस बजे सभी को खिला पिला कर उसे सभी का कपड़ा धोना पड़ता था. रात दस बजे के बाद दौरा करके लौटने वाले सिपाहियों की मालिस करके उनकी थकान मिटाता था. सारा काम निपटाने के बाद उसे दारोगा जी के कमरे की साफ सफाई तथा उनकी मालिस करनी पड़ती थी. यूं तो थाने वालों का ब्यवहार उसके प्रति नरम हो गया था फिर भी जब कभी थकान के कारण उससे हुकूम उदूली हो जाती थी तो दो चार लात भी खाना पड़ता था. गुनीलाल को लगता कि जेल जाने से यह सब तो बहुत ही अच्छा है.
जिस सिपाही ने गुनीलाल की तरफदारी की थी एक दिन कहने लगा...
‘भैया गंुनीलाल तुम बेकसूर हो, मैं जानता हूं मगर सारा गांव तुम्हारे खिलाफ गवाही दे रहा है कि तुमने ही कतल किया है, दारोगा जी भी तुमको जेल भेजने के लिए अड़े हुए हैं, मेरी अकल काम नहीं कर रही है, तुम ऐसा करो कि कल रात थाने से भाग निकलो, मैं तुम्हें पता बता देता हूं, तुम सीधे मेरे घर चले जाओ वहां आराम से रहना, जब मामला ठंड़ा हो जाएगा तब मैं तुम्हें खबर कर दूंगा फिर वापस चले आना.
गुनीलाल की नजरों में वह सिपाही किसी देवता की तरह दिखा, यह सिपाही उसकी कितनी फिकिर कर रहा है, वरना वक्त खराब आने पर अपना साया भी साथ छोड़ देता है. आज के जमाने में कोई किसी का नहीं होता. गुनीलाल ने सोचा छिपने के लिए सिपाही के घर से कोई अच्छी जगह नहीं हो सकती, कहीं और जाने पर पुलिस तलाश लेगी. सारा ऊंच नीच सोच व गुन कर गुनीलाल ने थाने से भागने के लिए सिपाही से हामी भर दी.
गुनीलाल खुश खुश था. आज वह थाने से भाग जाएगा. गुनीलाल ने थाने वालों के कपड़ों के साथ अपना कपड़ा भी साफ किया. एक सिपाही से सुई धागा मांग कर उसने अपने फटे कटे कपड़े की मरम्मत भी कर लिया. उसे आज जहन्नुम से आजादी मिलने वाली थी लेकिन शाम के चार बजे  थाने पर एक तमाशा खड़ा हो गया. गुनीलाल से हमदर्दी रखने वाले सिपाही के साथ एक दूसरे सिपाही का झगड़ा हो रहा था. दूसरे सिपाही का कहना था कि तुम एक आदमी को इसी तरह पहले भी अपने घर ले जा चुके हो, दो आदमी दीवान जी भी अपने घर ले जा चुके हैं. बरसात के मौसम में मुझे भी आदमी की जरूरत है, इस बार मैं मानने वाला नहीं हूं इस आदमी को मैं अपने घर भेजूंगा.’
गुनीलाल के कान में भनक पड़ी तो उसका माथा ठनका, आखिर आदमियों का बटवारा क्यों हो रहा है, उसे दाल में काला दिखा. सिपाहियों के झगड़े के कारण गुनीलाल के भागने का परोग्राम खटाई में पड़ गया. दूसरे दिन 

गुनीलाल ने अपने बाप को सारी दास्तान बताई तो कल्लू को फिकिर हुई, यह सारा काम फकत गुनीलाल से बंधुआ मजूरी कराने के लिए हो रहा था.. थाने से बाहर निकलते ही कल्लू, गुनीलाल की रिहाई के बारे में सोचने लगा, उसकी समझ में आया कि किसी नेता के बिना उसका काम नहीं हो सकता.
नेता की तलाश करते करते वह मेरे पास आया. थाने की पूरी कहानी सुनाने के बाद वह अपने बेटे की रिहाई के लिए गिड़गिड़ाने लगा. मैंने कल्लू के मामले को पारटी में उठाया. मेरी पारटी झन्डा डन्डा वाली थी, बात बात में पारटी मजूरों के हितों के लिए झन्डा डन्डा उठा लिया करती थी. मेरी पारटी वालों ने गुनीलाल के मामले को गंभीरता से लिया और मुझे निर्देशित किया के मैं उसका मामला देखूं.
कल्लू को ले कर मैं कप्तान साहब के पास पहुंचा, कप्तान साहब ने पूरी दरख्वास्त पढ़ने के बाद चश्मे के बाई फोकल ग्लास के ऊपर के आधे हिस्से से देखते हुए मेरे चेहरे पर नज़र गड़ाई और कहा..
‘नेता जी यह बीसवीं सदी है, आप अठारहवीं सदी की बातें कर रहे हैं जैसा आप कह रहे हैं, किसी को बंधुआ बनाना आज के जमाने में संभव नहीं, लेकिन आप बेफिक्र रहें मैं जांच करा लेता हूं. वैसे जहां तक मेरा ख्याल है आपकी दरख्वास्त में थोड़ी भी सचाई नहीं है.’
तीन दिन बाद कल्लू आया तो बताया कि अभी तक गुनीलाल थाने पर ही है और उससे ज़बरिया काम करवाया जा रहा है. मैंने तय किया कि यही बात कप्तान साहब को दुबारा बताना चाहिए. उन्होंने क्या जांच करवाया इसे भी मालूम करना है. मैं कल्लू के साथ दुबारा कप्तान साहब के दफ्तर पहुंचा कप्तान साहब ने जांच के बारे में बताया कि जांच करा ली गई है, गुनीलाल नाम का कोई आदमी थाने पर नहीं है. कप्तान साहब की बात सुनकर कल्लू का चेहरा सफेद पड़ गया और साथ ही साथ मेरी भी हवा गुम गई. कप्तान साहब ने अपनी जांच पर इतना भरोसा दिखाया कि कहने सुनने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था. चलने के लिए इज़ाज़त मांगी तो कप्तान साहब ने नाराज़गी दिखाते हुए कहा...‘नेता जी सोच समझ कर दरख्वास्त दिया कीजिए, इस तरह के झूठे इल्ज़ामात से पुलिस के दिल दिमाग पर अच्छा असर नहीं पड़ता.’
बंगले से बाहर आने पर मुझे कल्लू की बातों पर शुब्हा हुआ लेकिन कल्लू अपनी बात पर अड़ा रहा. उसने बताया कि आज ही सुबह उसने गुनीलाल को थाने पर देखा है. कप्तान साहब की जांच गलत है, झूठी है. मुझे कल्लू की बात सच्ची लगी, वैसे भी गरीब आदमी झूठ नहीं बोलता. सचाई जानने की मेरी इच्छा हुई, मैने कल्लू से कहा कि एकबार फिर जाकर गुनीलाल को थाने पर देखो, अगर वह वहां मौज़ूद है तो फौरन मुझे खबर करो.
मरता क्या न करता, कल्लू एक बार फिर थाने के लिए रवाना हो गया 

करीब दो घंटे बाद वापस आ कर बताया कि गुनीलाल अब भी थाने पर है और उसे कपड़ा धोते हुए उसने देखा है. गुनीलाल थाने पर ही है इस बात पर अब शक की कोई गुंज़ाइस नहीं थी. थोड़ा आगा पीछा सोचने के बाद मैं तिबारा कप्तान साहब के बंगले पर हाजिर था. मुझे देखते ही कप्तान साहब का पारा चढ़ गया कहने लगे, ‘आप बार बार परेशान क्यों कर रहे हैं? क्या आपको मेरी बात पर यकीन नहीं..’
पहले तो कप्तान साहब की झाड़ झड़प आराम के साथ सुनता रहा लेकिन आखिर में मैंने कहा.. ‘आपने थाने पर जा कर देखा है क्या कि गुनीलाल वहां नहीं है?’
‘क्या मतलब?’ कप्तान साहब ने इस बार फिर अपने बाई फोकल ग्लास से मेरी ओर देखा लेकिन मैंने उनको बोलने का मौका नहीं दिया. बात आगे बढ़ी.. आपने उस थाने से रिपोरट मांगी है जहां गुनीलाल बंधुआ मजूर बना कर रखा गया है. कोई भी पुलिस वाला इतना बेवकूफ नहीं कि अपनी गरदन में खुद फांसी का फन्दा डालने के लिए यह तस्लीम करे कि उसने ही गुनीलाल को थाने पर रोक कर रखा हुआ है.’
कप्तान साहब को मेरा जोर से बोलना अच्छा नहीं लगा. पूछा... ‘आपके पास क्या सबूत है कि गुनीलाल को थाने पर रोक कर रखा गया है.’ 
‘कप्तान साहब यह आदमी गुनीलाल का बाप है, इसने गुनीलाल को दो घंटे पहले ही थाने पर देखा है, इससे बड़ा सबूत मेरे पास नहीं है.’
कप्तान साहब ने आई बला टालने के लिए कहा..‘जांच करा कर देखते हैं,’ कप्तान साहब के इरादे को भांपते हुए मैंने कहा...कप्तान साहब बार बार जांच कराने से कोई फायदा नहीं होगा आप खुद जा कर जांच करें तो सचाई का पता चल जाएगा, नहीं तो मैं और मेरी पारटी डन्डा, झन्डा लेकर थाना घेरने जा रहे हैं. यकीनन वहां पर गुनीलाल मिलेगा इसके बाद जो भी नतीज़ा होगा उसकी सारी जिम्मेवारी आप की होगी.
झंन्डा डन्डा का नाम सुनते ही कप्तान साहब के चेहरे पर थोड़ी सी घबराहट हुई, उन्होंने कहा.. 
‘आप थोड़ी देर रूकें, मैं देखता हूं. कि आपका गुनीलाल कहां है?’ 
इसी के साथ कप्तान साहब ने थाने से राब्ता कायम करते हुए वायरलेस से पूछा तो एक मिनट में दस बार की दर से ‘यस सर’ कहते हुए थानेदार ने जबाब दिया कि गुनीलाल का कोई आदमी हमारे थाने पर नहीं है. कप्तान साहब ने अपने लहजे में थोड़ा सख्ती लाते हुए कहा कि गुनीलाल चाहे जहां भी हो तीन घंटे के भीतर उसे मेरे सामने पेश करो.
मैं कल्लू के साथ दफ्तर से बाहर आ गया. आगे क्या होगा इस बात की हलचल मेरे मन में मची हुई थी. दो घंटे भी नहीं बीता होगा कि कप्तान के बंगले के सामने एक जीप आ कर रूकी, जिसमें थानेदार के साथ गुनीलाल भी था. आपने बाप को सामने देखते ही गुनीलाल लिपट कर रोने लगा, 

दोनों की आंखों से गंगा जमुनी धारा बह निकली.
गुनीलाल को उसी वक्त कप्तान साहब के सामने पेश किया गया वे मुस्कराने लगे और उसी रौ में गुनीलाल से पूछा..
‘अरे भाई तुम कहां चले गये थे? तुम्हें खोजने में मेरे दारोगा को परेशान होना पड़ा, तुम भी तो परेशान थे कल्लू, अपने बेटे को घर ले जाओ’ इतना कह कर कप्तान साहब बंगले में चले गये.
मैंने गुनीलाल के बदन को देखा, उसके गोरे बदन पर डन्डों के काले निशान एक माह बाद भी उसके साथ किए गये जुल्मोसितम की दास्तान कह रहे थे. इस घटना के बाद मालूम हुआ कि तीन और आदमियों को जिन्हें थाने वालों ने बन्धक बनया हुआ था, उन्हें भी छोड़ दिया गया. थाने वाले उनसेे अपनी रोब की जाल में फसा कर जबरिया काम करा रहे थे. गिरमिटया बना गुनीलाल अब आजाद था. थाने से आजाद होते ही वह मुझसे लिपट कर रोने लगा. मेरे यहां चाय नाश्ता करने के बाद दोनों बाप बेटे अपने घर चले गये और मैं पुलिसिया आचार संहिता वाली किताब ले कर उन दोनों को घर जाता हुआ देखता रहा. उस किताब में उनके लिए कोई जगह नहीं थी.
                                                                           

                                             चुनाव


अंजुमन के चुनाव के मुतल्लिक जामा मस्जिद में नोटिस क्या टंगी कि चारो तरफ तहलका मच गया. कल्लू खलीफा को यकीन हो गया कि ऐसी अनहोनी भी हो सकती है. ख़लीफा ने जब यह ख़बर अपने दोस्त ज़्ाुम्मन उस्ताद को सुनाई तो उनका मुंह खुला के खुला रह गया. इस ख़बर की तस्दीक के लिए दोनों ही बनप्से नफीस जा पहुंचे, वहां पर सुबराती, बफाती, कल्लू ठेला, पुद्दन रेडियो आदि पहले से ही मौजूद थे. ख़लीफा और ज़्ाुम्मन उस्ताद को देख कर दोनों ही उनकी तरफ लपके, वे लोग भी नोटिस की तस्दीक के लिए यहां आये हुए थे. मगर दिक्कत यह थी कि इनमें कोई पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए वे नोटिस पढ़ नहीं पा रहे थे कि वह लटकाया हुआ कागज अंजुमन के चुनाव के मुतल्लिक इतिलानामा ही है या इस पर कुछ ओर तरह की ख़बर लिखी हुई है. पुद्दन रेडियो ने शुब्हा ज़ाहिर किया कि कल इमाम साहब बहाबियों के खिलाफ ऐलाने ज़ेहाद कर रहे हैं, इसी के मुतल्लिक कोई फतवा जारी किया गया होगा. अचानक कल्लू ठेला को याद आया कि उनका भान्जा पास ही में रहता है, वह कालेज में पढ़ रहा है, वह इस कागज को पढ़ सकता है. उन्होंने हाज़रीन को यह बात बताई तो सुबराती मियां लपक कर गये और छपक कर अपने भान्जे शरफू को साथ ले आये. उसने उनकी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए कहा कि ‘मुझे उर्दू नहीं आती.’
नोटिस बोर्ड के पास भीड़ देख कर कई बार इमाम साहब ताक झांक कर चुके थे मगर किसी ने भी उनको नाटिस पढ़ने के लिए नहीं कहा. इन लोगों को ख़तरा था कि नोटिस में लिखा हो कुछ और इमाम साहब पढ़ दें कुछ, तो सारा गुड़ गोबर हो जाएगा. इधर उधर उर्दू दां की तलाश की गई मगर कामयाबी नहीं मिली तो सारे लोग यह मानकर वापस चले गये कि जरूर यह नोटिस अंज़्ाुमन के चुनाव के मुतल्लिक है..
सदर अंजुमन के चुनाव से मुतल्लिक लोगों में इतनी दिलचस्पी बढ़ी हुई थी कि शाम होते होते तक यह ख़बर जंगल में आग की तरह पूरे शहर में फैल गई. फिर तो मुस्लिम मुहल्लों में वाका चाय की दुकानों पर चुनाव का तज़किरा पूरी जवानी पर आ गई. कुदरत नाई अपने हर ग्राहक को यह ख़बर चटखारे ले ले कर सुना रहे थे. जुबैद को तो जैसे हमवख़्ती काम ही मिल गया.
कल्लू ख़लीफा की बिरादरी अक्सरियत में थी, सो उनको पूरा यकीन था कि चुनाव मे उनकी जीत तय है. कोई माई का लाल उनको हरा नहीं सकता. इसके बाद भी उनको अपने मुख़ालिफ बरकत मियां से ख़तरा था कि उनके किसी न किसी दांव से वे चिŸा भी हो सकते है.
एक दिन बाद बरकत मियां के मकान पर उनके हमदर्दो की भीड़ जमा 

थी, कुरसिए सदारत पर काबिज़ दखील होने के लिए कौन कौन से दांव पेंच मुफीद हो सकते हैं इस मुद्दा पर तफसील से बातें हो रही थीं मगर बिरादरी के तनासुब पर गाड़ी आकर फंस जा रही थी. कल्लू की बिरादरी उनको वोट देने के लिए अभी से भांज रही थी आज के जमाने में किसी भी चुनावी नतीजे की पेशीनगोई बिरादरी के तनासुब पर ही टिकी हुई होती है इस मामले में कल्लू ख़लीफा बीस पड़ रहे थे. उनको हराना आसान नहीं था. इस मुद्दा पर मगज़मारी चल रही थी के मूसन मियां को बड़ी दूर की सूझी, उन्होंने कहा.. कि अंज़ुमन के बाई लाज़ में साफ साफ लिखा है कि सदर के लिए दाढ़ी वाला होना जरूरी है, कल्लू ख़लीफा के पास दाढ़ी तो है नहीं, चुनाव में महज बीस दिन बाकी रह गये हैं, इतनी कम मुद्दत में एक मुश्त दो अंगुस्त दाढ़ी बढ़ा लेना गैर मुमकिन है. इस बारीक नुक्ता का इज़हार करने के बाद मूसन मियां ने जोरदार चुटकी बजाई. मूसन मियां की यह अकल वाली बात सुनकर वहां मौजूद सभी लोग मूसन मियां की अक्लदानिश के कायल हो गये. यह एक ऐसा कानूनी नुक्ता था जिसकी बुनियाद पर टिका बिना मुकाबिला बरकत मियां कुरसिए सदारत पर रौनक अफरोज़ हो सकते थे. तारीकी में उम्मीद की पहली किरन देख कर बरकत मियां ने बंगाली की दूकान से दो किलो रसगुल्ला, दो बंडल 222 बीड़ी, और 20 पान का जोड़ा मंगाने का आर्डर दे दिया.
कल्लू मियां वोट के मामले में बरकत मियां से बीस थे मगर दांव पेंच के लिए उनके पास मूसन मियां जैसा दिमाग नहीं था. सारे पहुंच वाले लोग बरकत मियां के साथ थे. इधर तो बस अल्लाह का नाम था. चुनाव के मुतल्लिक खर्चों का हिसाब किताब लगाया गया तो पता चला कि ‘घर में भूजी भंाग नहीं और अम्मा चली भुनाने,’ वाली कहावत सादिक आ रही है. लेकिन फिर भी अखाड़े में बिना मुकाबिला लंगोट खोल देना मरदानगी के खि़लाफ नज़र आया इस लिए बरकत मियां से मुकाबिला की बात तय हो गई. मोअजि़्ज़न की बरख़ास्तगी से पहले आधा किलो गुड़ मंगा कर ठंडा पानी का इन्तजाम किया गया.
शहर में एक तबका ऐसा भी था जो कुरसिए सदारत के लिए बरकत मियां और कल्लू खलीफा दोनों को गैर मौजूं समझ रहा था. इनमें से दो चार लोगों ने साबिक सदर साहब से कहा कि वे भी सदर के उम्मीदवारों में शामिल हो जांए मगर उन्हांेने साफ साफ मना कर दिया कि इस दंगल से उनको कुछ लेना देना नहीं है. वजह यह थी कि इनका पŸाा साफ करने के लिए इमाम साहब ने पहले ही तुरूप का एक्का चल दिया था. इमाम साहब का कहना था कि सदर साहब बहावी हैं, इनसे दुआ सलाम रखना गैर मज़हबी काम है, यहां तक कि इनसे सलाम करने और उनके सलाम का जबाब देने से भी निकाह टूट जाता है. एक काफिर को अंज़ुमन का सदर बनाया जाये यह कोई मुसलमान बरदास्त नहीं कर सकता. इमाम 

साहब का एक ही झटका सदर साहब को ज़मीनबोस करने के लिए काफी था. हालात के नज़ाकत के मद्दे नज़र साबिक सदर किसी हाल में लंगोट बांधने के लिए तैयार नहीं थे.
कल्लू ख़लीफा के बारे में इनलोगों की राय थी कि यह हज़रत लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर किस्म के आदमी हैं, कब कौन सी मुसीबत खड़ी कर देंगे पहले से अन्दाजा लगाना मुश्किल है. जबकि बरकत मियां पढ़ाई लिखाई के मामले में कल्लू ख़लीफा से दो हाथ आगे हैं, उनमें सबसे बड़ी अच्छाई है कि वे अकल से पैदल हैं, इस हालात में बिना मूसन मियां की मरज़ी एक पŸाा भी नहीं हिल सकता और मूसन मियां अपने खास आदमी हैं, कान पकड़ कर जो जी चाहे करवाया जा सकता है. दोनों उम्मीदवारों का मुआयना करने के बाद यह तय पाया गया कि बरकत मियां का साथ उन लोगों के लिए ज्यादा फाययदे मन्द रहेगा.
नोटिस जारी होने के अड़तालीस घंटे के भीतर शहर के मुसलमान सीधे सीधे दो खेमों में बट गये. एक की बागडोर कल्लू खलीफा के हाथ थी तो दूसरे की बरकत मियां और मूसन उस्ताद मिलजुल कर संभाले हुए थे. दोनों खेमा एक दूसरे के सामने सीना ताने खड़ा था. आल इन्डिया और बी.बी.सी. कहे जाने वाने लोग गरमा गरम और चपटी कही जाने वाली ख़बरें सारे शहर में परोस रहे थे. किसने लोटा, किसने मुसल्ला और जानमाज़ चुराया, किसने मीनार की तामीर में कितना उड़ाया, किसने कितना चन्दा हज़म किया और किसने कितनी बार झूठ बोला, सारा आंकड़ा सड़कों पर गश्त करने लगा. शहर में एक चुनावी देवता दाखिल हो गया. जो झपट झपट कर लोगों की इज्जत उतारने पर लगा हुआ था. हैरत की बात यह थी कि हर आदमी अपने मुख़ालिफ की लुटिया डुबोने के लिए चुनावी देवता के सामने सर झुकाए खड़े थे.
परचा दाखिला में आठ दिन बाकी था फिर भी रायअम्मा को अपने हक में हमवार करने के लिए हर उम्मीदवार जोर लगाए हुए था. एक दिन जुम्मन मियां यूं ही टहलते टहलते जुमेराती मियां के घर जा पहुंचे, भाभी से अलैक सलैक के बाद चुनाव का हाल चाल पूछा तो जुमेराती मियां ने कहा..‘अरे जुम्मन भाई बिला वजह परेशान हो रहे हैं, पहले जा कर किसी से अन्जुमन का बाईलाज पढ़वाइए फिर वोट मांगने आइएगा, शायद आपको पता नहीं कि अन्ज़ुमन का सदर वही हो सकता है जिसके चेहरे पर दाढ़ी होगी. कल्लू ख़लीफा के पास दाढ़ी नहीं है, वह क्या ख़ाक चुनाव लड़ेगा.’ यह सुन कर जुम्मन उस्ताद के ऊपर बज्रपात हो गया भागे भागे कल्लू ख़लीफा के पास पहुंचे और जब उनको यह बात बताई तो उनके पांव से ज़मीन खिसक गई. अब क्या हो सकता है समझ में नहीं आया तो घबरा कर उन्होने जुम्मन उस्ताद से पूछा...
‘अरे जुम्मन क्या तुम ऐसे हकीम या वैद्य को जानते हो जिसका तेल लगा 

कर बीस दिन में दाढ़ी बढ़ाई जा सके.’
कल्लू ख़लीफा की यह बचकानी बात सुन कर जुम्मन उस्ताद ने कहा..
‘पगला गये हो का. भला दस पन्द्रह दिन में दाढ़ी कैसे बढ़ेगी’
दाढ़ी वाला मसला इतना बुरा फंसा कि चुनाव में ही अड़ंगा की गंुजाइस दिखाई देने लगी. इस मसला का मुमकिना हल क्या हो सकता है इस तलाश में दोनों ही एक वकील के घर जा पहुंचे. वकील ने बतौर फीस सौ रुपया पहले ही रखवा लिया फिर यह बताया कि बाईलाज के मुताबिक चुनाव लड़ने के लिए दाढ़ी वाला होना ज़रूरी नहीं है, चुनाव जीतने के बाद शपथ लेते समय ही ज़रूरी है. वैसे आप अपने साथ एक दाढ़ी वाला आदमी भी बतौर डमी उम्मीदवार रखें और अपने साथ उसका भी परचा दाखिल कराएं, एतराज़ होने पर देखा जाएगा. उस समय कोई न कोई तरकीब निकाल ली जाएगी.
वकील साहब ने कल्लू ख़लीफा को काफी हद तक मुत्मईन कर दिया था. इस लिए जो होगा देखा जाएगा के तर्ज पर वे चुनाव की तैयारी में जुट गये. चुनाव की घमाघमी चल ही रही थी कि एक दिन ख़बर फैली कि कल्लू ख़लीफा काफिर हो गये, वजह यह बताई गई कि एक दिन चुनाव प्रचार के दौरान वे शौकत बकरा के यहां गये थे और उन्होंने बाकायदा शौकत बकरा को सलाम किया और बतौर मुसाफा उनसे हाथ भी मिलाया. वोट की लालच में कल्लू ख़लीफा इतने गिर सकते है, दीन धरम को ताक पर रख कर बेदीन लोगों से मामला कर सकते हैं. इस ख़बर को सुन कर उनकी बीबी हत्थे से उखड़ी हुई थीं, अपने शौहर के सामने कभी जुबान न खोलने वाली ललकार ललकार कह रही थीं... 
‘मुआ यह बूढ़ा पगला गया है, वोट के चक्कर में इसकी बुद्धि भरष्ट हो गई है, भला बताओ इस उमर में मुझे तलाक पड़ गई, इसको इतना भी ध्यान नहीं रहा कि कोई सुनेगा तो का सोचेगा. इस उमर में हमारी यही फजीहत लिखी थी, हाय अल्ला! यह दिन देखने से पहले मुझे उठा लिया होता तो कितना अच्छा होता, अब घर पर ही एक गैर मुहरम से परदा करना पड़ेगा, बूढ़े की अकल पर परदा पड़ गया है, क्या बताऊं.’
कल्लू ख़लीफा जितना सफाई पेश कर रहे थे उतना ही मामला फैलता जा रहा था. उधर वोट बैंक में भी दरार पड़ने लगी थी. पक्के तरफदार भी नाराज़गी का इज़हार कर रहे थे. नाथो बुआ तो पूरी तरह जान सांसत में डाले हुए थीं. सबसे बड़ी मुसीबत तो यह थी कि मूसन मियां इस ख़बर को एक्झास्ट फैन से हवा दे रहे थे.
एक दिन कुदरत नाई की दूकान पर इमाम साहब की दूसरी शादी पर उंगली उठाई जा रही थी, लोगों का कहना था कि पहली बीबी की मौजूदगी में इमाम साहब की दूसरी शादी जरूर उनकी किसी गैर शरई हरकत का नतीज़ा है, इस ख़बर को जुम्मन उस्ताद ने कुछ इस तरह 

उछाला कि बरकत मियां की गोल सांसत में फस गई और कल्लू ख़लीफा के सर आई बला ख़ुद बख़ुद टल गई.
परचा दाखि़ला के दिन दो दो कौव्वालों के साथ परचा दाखि़ला के लिए कल्लू ख़लीफा ज़ामा मस्जि़द की तरफ रवाना हुए, उनके साथ लगभग पांच सौ आदमियों का ज़ुलूस भी चल रहा था. दोनों कौव्वाल नजि़्मया कलाम पढ़ते हुए आगे आगे चल रहे थे यह मंजर देख कर मूसन मियां का माथा ठनका, समझ में नहीं आया कि इसकी कौन सी काट की जाए, इतना ज़्यादा आदमी इकठ्ठा करना सबके कूबत की बात नहीं. मगर मूसन मियां तो मूसन मियां, दिमाग में बिजली कौंधी, फौरन विकास पारटी के दफ्तर में जा पहुंचे किसी वज़ीर का दौरा था. ढेर सारे लोग उनका इस्तेकबाल करने के लिए जमा थे. जिला मंत्री से बातें की, बातचीत के बाद वहां की सारी भीड़ ले कर बरकत मियां के घर आ गये. थोड़ी देर बाद फूल मालाओं से लदे बरकत मियां लगभग सात आठ सौ आदमियों के साथ ज़ामा मस्जि़द की तरफ जा रहे थे. जोरदार नारा लग रहा था... ‘जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा, कमाने वाला खाएगा लूटने वाला जाएगा, इन्कलाब जिन्दाबाद,’ बरकत भाई संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं.’
शहर के लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि ज़ामा मस्जि़द में आखिर इतनी भीड़ क्यों जमा हो रही है? भीड़ की ख़बर सुनकर थाने के जवान रायफलें ताने मौके पर पहुच गये. पुरसुकन माहौल में परचा दाखि़ल किया गया, कल्लू ख़लीफा और बरकत मियां का परचा तो हस्बे तवक्को था मगर जुम्मन मियां ने परचा क्यों दाखि़ल किया, यह किसी की समझ में नहीं आया. परचों की जांच के लिए तीन दिन का वक्त दिया गया.
‘बरकत को वोट दो’, ‘कल्लू को वोट दो.’ शहर की ख़ामोश फिज़ां में रात दिन दोनों ज़ुमले गूंजने लगे. गड़े मुरदे उखाड़े जा रहे थे, तो बरसों पुराने झगड़े बड़ी आसानी से सुलझते भी जा रहे थे. मुरदा रिश्तों में जान आ रही थी, झगड़ों के हल भी निकल रहे थे कहीं बढ़ भी रहे थे कुल मिला कर चुनाव का मामला काफी गरम था. गैर मुस्लिम भाइयों में भी अन्जुमन के चुनाव की खबर आग की तरह फैल चुकी थी. अखबारों में ख़बरें भी आने लगी थीं.
बाद नमाज़ ज़्ा़़़़ुमा परचे की जांच के लिए वक्त मुकर्रर किया गया था. इस बार दूसरे ज़्ाुमा के मुकाबिले नमाजि़यों की तादात काफी ज्यादा थी. सबसे पहले बरकत मियां का परचा निकाला गया इसमें काबिले एतराज़ कोई बात न थी. सो शम्सू मियां ने जो चुनाव इंचार्ज थे उसे ज़ायज़ करार दिया. दूसरा परचा कल्लू खलीफा का पेश हुआ तो इस पर यह एतराज़ आया कि इनका चेहरा दाढ़ी से खाली है, इस लिए बाई लाज की दफा चार के मुताबिक इनको सदर का उम्मीदवार नहीं बनाया जा सकता. इस मामले को मूसन मियां ने इतनी जोर शोर से उठाया कि कल्लू ख़लीफा की बोलती 

बन्द हो गई. इस दोरान कल्लू मियां की मदत के लिए वकील साहब सामने
आये, वज़ाहत करते हुए उन्होने कहा कि दफा चार का इतलाक सदर चुने जाने के बाद होगा, इनको सदर चुनने में यह दफा कŸाई मना नहीं है, हलफबरदारी के वक्त इनके चेहरे पर दाढ़ी होना जरूरी है. इनसे एक हलफनामा ले लिया जाए कि इनको सदर का चार्ज मतलूबा दाढ़ी के बाद ही मिलेगा.
वकील साहब की यह दलील सुन कर मूसन मियां का चेहरा लुढ़क गया. कई बार अपना माथा सहलाने के बाद उन्होंने वकील साहब की काट पेश करते हुए कहा कि बाईलाज के मुताबिक बाद चुनाव अन्दर मियाद एक माह चार्ज लेना जरूरी है, इस एक माह के अन्दर कल्लू खलीफा के चेहरे पर एक मुश्त दो अंगुश्त दाढ़ी बढ़ाना नामुमकिन है, इस लिए इनका परचा खारिज किया जाना अन्जुमन के हक में होगा.
शम्सू मियां की पूरी हमदर्दी कल्लू खलीफा के साथ थी मगर दाढ़ी वाला मामला ऐसा आकर फंसा कि उनकी अकल गुम गई. अपने सर आई बला टालने के लिए उन्होंने हाज़रीन से पूछा...भाई आप लोगों की क्या राय है? बरकत मियां के लोगों ने परचा खारिज़ा के लिए जोरदार आवाज लगाई तो कल्लू खलीफा के लोगों ने दबी जुबान से मुख़ालफत की. शम्सू मियां ने थोड़ी देर सर झुकाए हुए मामले पर गौर ख़ोज करने के बाद परचा खारिज कर दिया. पूरे मज़मा में एक सन्नाटा तारी हो गया. किसी की समझ में नहीं आया कि आगे क्या होगा?
सन्नाटे को चीरती हुई पुद्दन रेडियो की आवाज उभरी....
शम्सू मियां! बाईलाज में यह भी लिखा हुआ है कि सदर को नमाज़ी भी होना चाहिए, पचवक्ता की बात कौन कहे बरकत मियां के लिए तो जुमा की भी मुहताजगी रहती है. इस एतराज पर तो पूरा मज़मा खलबला उठा मगर शम्सू मियां ने इस एतराज को काबिले एतराज नहीं माना और कहा.. बरकत मियां के परचे की जांच के समय ही इस एतराज को उठाना चाहिए था, अब जबकि उनका परचा ज़ायज़ करार किया जा चुका है फिर इस तरह के एतराज़ की गुंज़ाइश नहीं है. फिर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा..
‘पुद्दन भाई हमलोग सदर के चुनाव के लिए पंचवक्ता नमाजी की तलाश करेंगे तो कयामत तक अन्जुमन का चुनाव नहीं हो सकता.’
कल्लू ख़लीफा का परचा ख़ारिज हो जाने के बाद लोगों को यह चुनाव बे मजा नजर आने लगा. इसलिए आधी भीड़ खिसक गई. इस आवाजाही के बीच जब जुम्मन मियां का परचा सामने आया तो मूसन मियां ने सख़्त परेशानी महसूस की. इस परेशानी की वजह वह दाढ़ी थी जो वनप्से नफीस उनके चेहरे पर मौज़ूद थी. बिना मुकाबिला चुनाव की गुंजाइश ख़त्म देख कर मूसन मियां ने अंधेरे में एक तीर चलाया, कहा कि जुम्मन मियां की दाढ़ी छोटी है इसलिए उनकी उम्मीदवारी ख़ारिज़ की जाए. यह सुन कर 

कल्लू ख़लीफा के समर्थकों को ताव आ गया फिर जबाबी दावा आया कि बरकत मियां की भी दाढ़ी छोटी है. किसकी दाढ़ी बड़ी है किसकी छोटी है इसका फैसला कैसे किया जाए? यह मामला टेढ़ा फस गया. लाख माथा पच्ची करने के बाद भी कोई हल नहीं निकला तो पुद्दन रेडियो ने सुझाव दिया कि दोनों की दाढ़ी नाप कर देख लिया जाए, अपने आप फैसला हो जाएगा. दोनों ओर की गोल पूरी तरह दबाव बनाए हुए थी मजबूरन शम्सू मियां को दोनों की दाढ़ी नापने का हुक्म देना पड़ा ताकि यह मालूम किया जा सके कि किसी की दाढ़ी एक मुश्त दो अंगुश्त से कम तो नहीं.
दोनों की दाढि़यों की लम्बाई नापने की जिम्मेवारी सलाहू नाई को सौंपी गई. उसने नाप कर बताया कि दोनों की दाढि़यां एकमुश्त दो अुगुश्त के मेयार को पूरा नहीं कर रही हंै. अब क्या हो..एक बार फिर मशविरा शुरू हुआ और तय पाया गया कि सलाहू नाई की मुठ्ठी काफी बड़ी है फिर एक दूसरे नाई एख़लाक से कहा गया कि वह दाढि़यों की नाप करे. लोगों को यकीन था कि इनके नापने के बाद झगड़ा खतम हो जाएगा क्योंकि लोगों को पता था कि एख़लाख नाई का कद छोटा है इस लिए उनकी मुठ्ठी छोटी होगी मगर उनकी उंगलियां बड़ी निकलीं.
मूसन मियां किसी भी हाल में बरकत मियां को सदर बनवाना चाहते थे. दौड़ कर एक कंघी ले आये और बरकत मियां की दाढ़ी में फिराना शुरू कर दिया. यह हालत देख कर कल्लू खलीफा भी दूसरी कंघी ले आये और जुम्मन मियां की दाढ़ी संवारने लगे. इस बार की नपाई में जुम्मन उस्ताद की दाढ़ी मतलूबा लम्बाई से ज़्यादा निकली. यह देख कर जुम्मन उस्ताद के साथी अपने पर काबू नहीं रख सके. और उबल पड़े. जोरदार नारा लगा.‘जीत गया भाई जीत गया, जुम्मन जीत गया.’
अपने मुख़ालिफ पारटी की यह खुशी देख कर मूसन मियां के कलेज़े पर छुरी चल गई. इधर बरकत मियां नाई पर खौल रहे थे. अभी कल ही दाढ़ी बनाते समय ज्यादा कतर बैठा मालूम होता है, यह कुदरतवा जुम्मन से मिला हुआ है, वरना जुम्मन की दाढ़ी मुझसे आगे निकल जाती ऐसा हो ही नहीं सकता.
जो होना था, हो चुका था फिर भी उन्होंने एतराज पेश किया. दो तीन बाल की दाढ़ी में कोई अहमियत नहीं है, मिलजुमला दाढ़ी की लम्बाई नापी जानी चाहिए. शम्शू भाई को यह एतराज कुछ दमदार लगा. कुदरत नाई को बुलाया गया उसने जुम्मन मियां के दाढ़ी के बढ़े हुए तीनों बालों को तर कलम कर दिया और दाढ़ी से मुतल्लिक शको शुब्हा की गुंज़ाइश को खतम करने के लिए एक बार फिर फीता मंगा कर दोनों की दाढि़यां नापी गईं तो जुम्मन उस्ताद की दाढ़ी दो सेन्टीमीटर कम निकली. यानि कि बरकत मियां चुनाव जीत गये. इस बार बरकत मियां के साथियों ने जोरदार नारा लगाया. ‘जीत गया भाई जीत गया, बरकत भाई जीत गया.’
                                                                        ----------

                                                  काफिर


‘तूं काफिर,,’ ‘तूं काफिर,’ ‘तेरी सात पुश्त काफिर,’ ‘तेरा बाप काफिर,’ ‘तेरी औलाद काफिर.’ लड्डन उस्ताद और खदेरन खलीफा के बीच जंग छिड़ गई थी. इसकी खबर सुनकर सारे मज़हबी लोग अपनी कुर्बानी देने के लिए सर पर कफन बांधे गली के नुक्कड़ पर ज़मा हो गये. मौकये वारदात पर सारे लोगों ने देखा, दोनों मज़हबी पहलवान जुबानी जंग छेड़ कर एक दूसरे को बआवाज बुलन्द ज़हन्नमी होने की खबर दे रहे हैं.. एक के बाद दूसरे की आवाज़ ज़्यादा तेज निकल रही थी. थोड़ी देर बाद गली के नुक्कड़ पर यह शोर उठा कि पुलिस आ गई, किसी की समझ में नहीं आया कि ‘तंू काफिर’ ‘तूं काफिर’ की रट लगाने वालों को पुलिस किस दफा में चालान करेगी.
ऐसा बताया जाता है कि अभी बहुत दिन नहीं बीते कि लडडन उस्ताद और खदेरन ख़लीफा, एक जान दो कालिब हुआ करते थे, मगर एक भैंस के इन्तकालपुर मलाल के बाद जब मौलाना बरकतुल्ला से पूछा गया कि इस भैस की मौत के पीछे किसका हाथ है तो उन्होंने कहा कि हाथ कंगन को आरसी क्या है? अभी देख लो इसी के साथ अपनी झोली से उन्होंने एक कागज निकाला और चिराग की लौ दिखाई तो उस पर खदेरन उस्ताद का नाम साफ साफ लिखा दिखा. अपने जि़गरी दोस्त की इस खुली गद्दारी से लड्डन ख़लीफा का खून खैल उठा. हाथ पैर से ख़लीफा, लड्डन उस्ताद से उन्नीस थे. इसलिए चुप रहे मगर बदला लेने के लिए मौलाना बरकत के चेलों में शामिल हो गये. इसके बाद ऐसी तरकीब लड़ी कि मुर्गे पर आफत आ गई यह आफत इतनी जोरदार थी कि कोई असल मुर्गा दरबे में आवाज देने के लिए नहीं बचा.
दस दिन गुज़रा, बीस दिन गुज़रा, एक माह होने को आया मगर ख़देरन उस्ताद का बाल भी बाका न हुआ. उस्ताद की बीबी शुबरातन को ताव आ गया, उस्ताद को धमकाते हुए बोली कि भैंस तो गई महामाई के बेढ़े, अपने साथ दस मुर्गा भी ले गई, कान खोल कर सुन लो, अगर दस दिन के भीतर खदेरना का जनाजा नहीं निकला तो तुम्हारी ख़ैरियत नहीं, अगर इस नासपीटे खदेरना का नास करने की ताकत बरकतवा में नहीं थी तो हमारा दस मुर्गा क्यों खाया, पीरमुर्शीद होगा तुम्हारा, मैं तो उसकी खैर लूंगी.
अपनी बीबी के कड़ुए पन से खलीफा वाकिफ थे. अल्मदद का जाप करते हुए वे फौरन मौलाना बरकत की ख़ानख़ाह की तरफ भागे. सूरते हाल जान कर मौलाना को दिन में तारा नज़र आ गया. एक पुराना दृश्य आंखों के सामने घूम गया वाकिया ज़वानी के दिनों का था. गरमी की दुपहरी में वास्ते 
ताबीज़ शुबरातन बुआ मौलाना बरकत के खानखाह में गई थीं, तरकीब

इस्तेमाल समझाते हुए मौलाना बरकत से जाने कौन सी गलती हुई कि बुआ हत्थे से उखड़ गईं, इसके बाद तो मौलाना के होश फाख्ता हो गये. वैसा ही वाकिया दुबारा भी हो सकता है, यह सोच कर मौलाना की आत्मा हिल गई. उस्ताद पर जोरदार हमला करने के लिए मौलाना साहब ने खलीफा से कहा...एक तोला असली ज़ाफरान ले आओ फिर देखता हूं कि उस्ताद में कितना दम है? ज़ाफरान लाने के चक्कर में मुर्गों के बाद उस्ताद की भैस की भंेट चढ़ गई.
अपने मुवक्किलों के जरिए मौलाना साहब ने खदेरन पर कई वार किया मगर खदेरन की तन्दुरुस्ती पर कोई असर नहीं पड़ा. अपने खास मुवक्किलों को भी लगाया मगर कोई फायदा नहीं हुआ. इतनी सारी मिहनत के बाद भी जब मौलाना को खदेरन चलते फिरते नजर आये तो लड्डन बगावत पर आमादा दिखाई पड़े. मामले की नज़ाकत को देखते हुए स्वयं मौलाना लड्डन के घर जा पहुंचे और कहा कि..... 
‘यार! लड्डन हमारे सारे वार खाली चले जा रहे हैं, आज तक ऐसा नहीं हुआ, लगता है प्रतिद्वन्दी के मुअक्किल खदेरना की हिफाज़त कर रहे हैं, ऐसा करो कि तुम हमारे दल में आ जाओ, इससे फायदा यह होगा कि हमारे मुअक्किलों की हमदर्दी तुम को मिलेगी, देख लेना खदेरना बीच चैराहा जलता हुआ दिखेगा, तब मानना हमारी खोपड़ी.’
मुअक्किलों की मदत से खदेरन का सत्यानाश करने के लिए मौलाना बरकत की सलाह लड्डन को जम गई. मात्र दल बदलने से बड़ी कामयाबी मिल सकती है, तो दल बदली करना कोई घाटे का सौदा नहीं. यह सोच कर लड्डन ने दल बदली के लिए हामी भर दी. इसके बाद मुअक्किलों को साधने के लिए लड्डन की बछिया वहीद मियां के दरवाजे पर बंध गई.
कई महीने बाद लड्डन को पता चला कि उनकी बछिया ने एक बच्चा दिया है, तो उसे देखने के लिए मन में उठने वाली लहर को लड्डन रोक नहीं पाये. वहीद मियां के घर जा कर अपनी बछिया के बच्चे पर उन्होंने हसरत भरी निगाह डाली, उसके ऊपर हाथ फेरा, फिर तो उनकी आंखों में आंसू आ गये. हाय रे! इतनी कुर्बानी के बाद भी खदेरना दनदनाता हुआ फिर रहा है.
मौलाना बरकत की बरक्कत से इस गांव का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि रोज़ा नमाज़ से लोगों को छुट्टी मिल गई. आराम के साथ ताड़ी पीना, सिनेमा देखना यानि अब गांव के लोग मन माफिक जि़न्दगी गुज़ार सकते थे. गायबाना हज़ का तरीका भी मौलाना साहब ने बता दिया था, न रेल का किराया, न हवाई जहाज का टिकट, न अरब के रेगिस्तान की गरमी सता सकती थी. पुलसरात पार करने का तरीका भी उनके पास था गरज यह कि गांव वालों की तरफ से दीन धरम का जिम्मा मौलाना ने अपने सर पे उठा रखा था उन्हें कमाई का थोड़ा सा हिस्सा कुर्बान करने की ज़रूरत 

थी.
लोग मौलाना का दामन थामे सारे मज़हबी झगड़ों से पाक थे. इसी मज़हबी करसानी का फायदा लेने के लिए भोले, कल्लू, प्यारे आदि सारे लोग मौलाना के हमनिवाला व हमप्याला बने हुए थे. बिना पढ़े लिखे लोगों का साथ रहने से सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हर बात को समझाने के लिए उनके पास एक मोटा सा डन्डा रहता है. यही वज़ह थी कि हर पढ़े लिखे को मौलाना की बातें मानने की मज़बूरी थी. एक दिन काज़ी़ साहब और बन्ने हलवाई काफी रात तक मौलाना के हुज़रा में सलाह मशविरा करते हुए पाये गये. सुबह मौलाना साहब ने फतवा जारी किया जो भी अपने विरोधी दल से दुआ सलाम रखेगा उसका निकाह टूट जाएगा. इस फतवा की जानकारी होते ही नौजवान चैकन्ना हो गये. उन्हें निकाह की कीमत मालूम थी, हजारों खरच करने के बाद भी निकाह जैसा मीठा फल नहीं मिलने वाला. निकाह टूट जाएगा तो क्या होगा? बूढ़े भी इस फतवा से काफी परेशान थे. अगर बुढ़ौती में निकाह टूट गया तो दुबारा जीवन जीने में परेशानी तो होगी ही साथ ही साथ अपने पोपले मुंह से दूसरी बार ‘कुबूल किया’ कहते हुए नाती पोतों के सामने जो रूसवाई होगी वह बहुत बड़ी बेशर्मी की बात होगी.
इस सूरते हाल में शुबरातिन बुआ काफी परेशान थीं. एक दिन उन्होंने जुम्मन चचा से कहा... ‘अजी सुनते हो, चलो यहां से दूर कहीं भाग चलें.’ जुम्मन चाचा को यह बात बहुत अटपटी लगी. ज़वानी में तो बाकायदा ब्याह कर लाये अब बुढ़ापे में कौन सी आफत आ गई कि भागने पराने की बात कर रही हो, जहां जाना होगा डंके की चोट पर जांएगे, किसी का डर लगा है क्या?
शुबरातन बुआ समझ गईं कि हमारी बात बूढ़े के दिमाग में नहीं घुस रही है, बात को साफ करते हुए बोलीं... ‘आज कल गांव की हवा बहुत खराब चल रही है, सिर्फ दुआ सलाम करने से ही निकाह टूट जा रहा है, पता भी नहीं चलता कि कौन किस दल का है? गलती आदमी से ही होती है, अगर जाने अनजाने किसी गैर दल वालों से दुआ सलाम हो गया, तो बस हो गई छुट्टी, निगाह टूटने के बाद दुबारा निकाह करने से पहले अगर मौत आ गई तो जन्नत का साथ छूटा. ऐसे तो आफत आ जाएगी. दो चार साल और जीना है कहीं और जी लेंगे पर इस गांव में नहीं.’
जुम्मन चाचा ने डपट कर शुबराती बुआ को चुप तो करा दिया मगर दुआ सलाम के मामले मे अगर वह चैकन्ना हो गईं तो.... शुबरातिन गई हाथ से. मगर होनी को कौन रोक सकता है. एक दिन अपने लंगोटिया यार सलाहू को देख कर लाख चैकसी के बाद भी मुंह से निकल ही गया ‘अस्सलाम अलैकुम’. फौरन दिमाग में खतरे का सायरन बज गया. मुंह से निकला ‘हाय शुबरातिन!’ लड़खड़ाते कदमों के साथ घर की ओर रवाना हुए, दरवाजे पर 

पहुंच कर अपना मुंह गमछे से लपेट लिया.
जुम्मन चाचा ने जिस वक्त बताया कि उनका निकाह टूट चुका है, शुबरातिन बुआ के सिर पर पहाड़ टूट पड़ा. ‘हाय अल्ला तूने किस गुनाह की सजा दी, और अब अपने मरद से ही परदा करना पड़ेगा. आग लगे मुआ गांव में.’ 
अपने शौहर का साथ टूटने का गम शुबरातिन बुआ मना ही रही थीं कि जमालो बी बुरका मांगने आ गईं. कहीं जाना है क्या? बुआ के इस सवाल का जबाब जमालो बी ने यह दिया कि छुट्टन के अब्बा ने हमीद मियां से सलाम कर लिया है, इसलिए हमारा निकाह टूट गया है. वे खाना खाने आने वाले हैं इसलिए उनसे परदा करना पड़ेगा. थोड़ी देर बाद बिट्टो भी आ गईं, उनका भी निकाह टूट चुका था. गांव वालों की आदत ही ऐसी खराब थी, जब भी किसी जान पहचान वाले से देखा देखी हुई कि चट से ‘सलाम अलैकुम’ कर दिया, यह नहीं सोचा कि मेरी बेटियों और बीबियों पर कितनी बड़ी आफत आ सकती है.
गांव में एक थी कल्लू बुआ, वे अपनी लाठी टेकते हुए एक दिन थाने जा पहुची और थानेदार से अपने शौहर के खिलाफ रपट लिखने को कहा..
वज़ह यह बताई कि उनका शौहर बिला इज़ाज़त घर में घुसा चला आता है, यह सुन कर थानेदार की खोपड़ी घूम गई. इस मामले में कौन सी कानूनी कार्यवाही की जा सकती है? मौलाना बरकत के फतवे के बारे में जब थानेदार को बताया गया तो कानूनी सलाह लेने के लिए बेचारा थानेदार  कचहरी भागा. पर उसे वहां भी कोई सलाह नहीं मिली.
दस दिन के भीतर गांव की आधी औरतें तलाकशुदा बन कर इद्दत पर बैठ गई थीं. ताकि तीन महीना तेरह दिन के बाद दुबारा अपने शौहर से निकाह कर सकें. गांव में हड़कंप मच गया था. लाख सावधानी के बाद भी सलाम करने की गलती हो ही जाती थी, यही गलती बुद्धन पहलवान से भी हो गई जब उनको बताया गया कि आपका भी निकाह टूट चुका है तो उनका पारा चढ़ गया. एक मोटा सा डन्डा ले कर मौलाना के हुजरा पर जा धमके. उन्होंने सोचा ‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी’, मौलनवा से आज हिसाब किताब पूरा करके ही दाना पानी करूंगा लेकिन हुज़रे की कुन्डी में लटका ताला देख कर बुद्धन पहलवान भौचक रह गये. पूछने पर मालूम हुआ कि वे एक दिन पहले से ही एक तलाकशुदा औरत के साथ गायब हैं. बुद्धन पहलवान ने अल्ला का शुक्रिया अदा किया और गाली दी... चलो अच्छा हुआ.. साला गांव छोड़ कर भाग गया, बात बात में शरियत का हवाला देता था.
                                                                           


                                             सुरक्षा


दिल्ली से छूटने के बाद मगध एक्सप्रेस रंेगती हुई धीरे धीरे बढ़ी लेकिन गाजियाबाद से आगे निकलते ही उस सुपरफास्ट ट्रेन ने तेजी पकड़ ली. ऐसा मालूम हो रहा था जैसे भागलपुर की दूरी को बांहों में पकड़ने की जल्दी में हो.
मेरे सामने वाली स्लीपर बर्थ पर एक आदिवासी महिला गुमसुम सी खिड़की के बाहर शून्य में घूर रही थी. वह आदिवासी औरत दूसरे मुसाफिरों से कुछ अलग दिखाई पड़ रही थी., मैंने गौर से उसकी तरफ देखा. ऐसा महसूस हुआ कि दुख दर्द और पीड़ा का अथाह समन्दर उसके चेहरे पर हिलोरें मार रहा है. औसत सी साड़ी ब्लाउज और उसके पैरों में पड़े चप्पल गवाही दे रहे थे कि वह किसी अमीर घराने में नौकरानी होगी. जहां तक मेरा ख्याल था कि आदिवासी होने के कारण उसकी मंजिल भागलपुर या पटना हो सकती है. लेकिन इतनी लम्बी दूरी के मुसाफिर के पास कोई सामान नहीं था, यह देख कर मुझे आश्चर्य हुआ. मैने सोचा शायद अपने मालिक की चोरी करके भाग रही हो या चोरी का इल्जाम लगा कर मालिक ने इसे भगा दिया हो, कुछ भी हो सकता है, मगर ऐसा नहीं लग रहा था क्योंकि उसकी कुल जमा पूंजी मात्र वह कपड़े थे जिसे उसने पहन रखा था.
इस ट्रेन में हजारों यात्री थे किसको फुर्सत थी कि कोई उनके बारे में सोचे. लेकिन इस औरत का चेहरा मुझे उसकी ओर खींच रहा था. उसके ख्यालों के चुभन से खुद को बचाने के लिए अपने मन को मैंने दूसरी ओर लगाना चाहा, मगर असफल रहा. उसका ख्याल गहराई तक घुसता जा रहा था.
तीस साल की उम्र, सांवला रंग, गठी हुई देह. उसकी हालत किसी गैर मामूली घटना की तरफ संकेत कर रही थी, मगर यह घटना क्या हो सकती है? यह औरत कौन है? कहां से आ रही है? कहां जाना चाहती है? मेरे सामने बार बार यह सवाल खड़ा हो रहा था.
मेरी सोच का तानाबाना उस समय बिखर गया जब एक टिकट चेकर ने उससे टिकट के बारे में पूछा...
‘ऐ औरत! अपना टिकट दिखाओ’ उसकी निगाहें टिकट चेकर की तरफ उठीं फिर अपने आप एक मुजरिम की तरह झुक गईं, उसके पास टिकट नहीं था. टिकट चेकर भी मुर्गे की तलाश में था इस लिए दूसरे मुसाफिरों की तरफ चला गया लेकिन दो मिनट बाद फिर उसी से टिकट मांगने लगा, इस बार उसने झाड़ भी लगाई, फिर वह धमकी देता हुआ आगे बढ़ गया कि वह अगले स्टेशन अलीगढ़ उतर जाये, नहीं तो किराया के साथ जुर्माना भी उसे भरना पड़ेगा, और जेल जाने की नौबत भी आ सकती है. 
इस धमकी के बाद भी वह औरत गुम सुम बैठी रही, जैसे उसने कुछ सुना 
ही न हो. सामने वाली बर्थ का मुसाफिर बिस्तर बिछाने की तैयारी कर रहा था जिसे देख कर वह औरत मेरी बर्थ पर आ गई. मैं भी सोने का इरादा कर रहा था मगर जाने क्यों उसे बैठने से मना नहीं कर पाया. वह सहमी, सिकुड़ी, कुछ डरी डरी सी मेरी बर्थ पर एक किनारे बैठ गई. एक अजनबी मुसाफिर वह भी औरत, ‘मैं उसके चक्कर में क्यों पड़ूं, कोई मुसीबत खड़ी हो गई तो लेने के देने पड़ सकते हैं.’
अलीगढ़ आया और चला भी गया पर वह औरत अपनी जगह पर जमी रही, उसे न तो अपनी रूसवाई का डर था और नही जेल जाने का खौफ. एक्सप्रेस अलीगढ़ से दस पन्द्रह किलोमीटर आगे बढ़ी होगी कि दूसरा टिकट चेकर आ पहुंचा, उसने भी टिकट की मांग की तो इस बार भी आई बला टालने की गरज से उसने खामोशी ओढ़ लिया. मगर इस बार वाला टिकट चेकर कुछ ज्यादा ही रेलवे विभाग का वफादार निकला, दो सौ रुपया किराया और जुर्माना वसूलने पर अड़ा रहा. उसके साथ आये दो सिपाही भी ललाई आंखों से उस औरत को घूर रहे थे. टिकट चेकर ने जब देखा कि उसकी बातों का उसके ऊपर कुछ असर नहीं हो रहा तो उसने सिपाहियों को हुक्म दिया कि उसे गिरफ्तार कर लें. और उसे जी.आर.पी.एफ. के डिब्बा में ले चलें. कोई जेब कतरी या उठाईगीर जान पड़ती है. मरम्मत होगी तो सारी हकीकत जाहिर हो जाएगी.
एक सिपाही ने जैसे ही उसका हाथ पकड़ना चाहा, वह जल्दी से उठी और जा कर टिकट चेकर के पांव पर गिर गई, फिर उसने गरदन उठा कर टिकट चेकर को देखा. वह अपनी छल छलाई आंखों से अपनी जान की अमान मांग रही थी. उसके भीतर के दर्द उसकी आंखों से बाहर आने के लिए मचल रहे थे. जिसे रोकने की कोशिश में उसके चेहरे का तनाव बढ़ता जा रहा था मगर इन्सानी दर्द के एहसास से खाली टिकट चेकर बस एक ही रट लगाए हुए था, ‘जुर्माना दो या जेल चलो’
जो कुछ हो रहा था एक टिकट चेकर और एक बे टिकट यात्री का मामला था मेरा इससे क्या लेना देना था लेकिन अन्दर ही अन्दर कहीं न कहीं मैं टिकट चेकर की इस हरकत से आहत हो रहा था. टिकट चेकर को जल्दी थी. वह यह कहता हुआ आगे बढ़ गया. ‘इस औरत को जी.आर.पी.एफ. के डिब्बा में ले जाओ.’
उस औरत को यकीन हो गया अब उसकी मदत को आने वाला कोई नहीं है. इसलिए हालात से समझौता करती हुई उन सिपाहियों के साथ जाने को तैयार हो गई, मेरी आंखों से ओझल होने के पूर्व उसने हमारी तरफ आखिरी निगाह डाली. जैसे इतनी देर तक साथ निभाने के लिए शुक्रिया अदा कर रही हो. मैंने महसूस किया कि उसकी आंखों में एक खामोश अनुरोध भी था, उसकी यह निगाह चीरती हुई कलेजे में धस गई, दिल ने धिक्कारा, ‘एक मजबूर की मदत करने से कतरा रहे हो, लानत है, तुम पर धिक्कार है’ 
तुम्हारे सिद्धान्तों और गरीबों की हालत पर आंसू बहाने वाली तुम्हारी कलम को चुल्लू भर पानी में डूब मरने की जरूरत है. अगर कुर्बानी के बुलावा को स्वीकार करने की तुम्हारे पास ताकत नहीं है तो भविष्य में फिर कभी किसी गरीब की हालत पर आंसू बहाने का तुमको कोई अधिकार नहीं होगा. तुम स्वयं के साथ धोखा देना बन्द करो.’ इस औरत के लिए कुछ करो नहीं तो यह औरत जीवन भर तुम्हारे दिलो दिमाग पर कचोटें मारती रहेगी. जब कभी तुम्हारी कलम गरीबी का नक्शा खींचने की इरादा करेगी उस समय यह औरत तुम्हारा मजाक उड़ाती मिलेगी. फिर तुम्हें एहसास होगा हकीकत से आंख चुराने का परिणाम क्या होता है? अगर तुम जीवन भर की टीस से बचना चाहते हो तो आज इस औरत को बचा लो.. इसी के साथ ही अपनी बर्थ से यंत्रवत खड़ा हुआ फिर मैंने पुलिस वालों से कहा.. ‘इस औरत को छोड़ दो.’
‘क्यों छोड़ दें? इस औरत को जेल भेजना है,’ मैंने सिपाहियों से कहा... इसका जुर्माना अदा करने के लिए तैयार हूं, ऐसी हालत में जेल भेजने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है.
इस औरत का जुर्माना तुम दोगे? आखिर क्यों? पुलिस वालों को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ, आप अपना जुर्माना लीजिए और इस औरत का पिन्ड छोडि़ए, बकिया बातों का उŸार देना आवश्यक नहीं है. इतने में टिकट चेकर भी आ गया, मैंने भागलपुर तक का किराया और जुर्माना मुबलिक दो सौ रुपया अदा कर दिया, किराया और जुर्माना अदा करने के बाद मुझे जो सकून मिला वह शायद जीवन का पहला अनुभव था. इतना करने के बाद मैंने महसूस किया कि मेरी लेखनी को आज पहली बार मजबूत आधार मिला है. जब कभी इन गरीबों पर हमारी कलम चलेगी झूठ और फरेब की झलक तक नहीं होगी और जो कुछ भी लिखूंगा असली होगा, उसका असर भी होगा, कुछ समय पहले तक इस औरत का अस्तित्व हमारे लिए परेशानी का कारण था लेकिन अब दिमाग पर कोई दबाव या जोर नहीं था. एक अच्छे काम के बदले मुझे मानसिक शान्ति प्राप्त हुई थी, यह काम का पहला असर था. आंख बन्द कर आराम से लेट गया. मन हल्का था आंखें बन्द कर स्वयं का मूल्यांकन कर रहा था कि उस औरत ने मुझसे सवाल किया...
‘बाबू जी आपने लिए मेरे लिए इतना रुपया क्यों खर्च किया, मैं जेल चली जाती तो आपके लिए क्या फर्क पड़ता? आपके साथ मेरी कोई जान पहचान भी तो नहीं, आप अपना रुपया मुझसे कैसे वसूल करेंगे? मेरा ठौर ठिकाना भी तो आप नहीं जानते. फिर आपने इतनी बड़ी किरपा करने की जरूरत क्यों समझी.’
वह औरत एक पर एक सवाल ठोंके जा रही थी जिसे रोकने के लिए मैंने कहा..‘पैसा वसूल करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, तुम कोई भी हो, कहीं की भी हो, मुझसे क्या लेना देना, तुम अपने घर पहुंच जाओ यही मेरे लिए 
बहुत है.’
मेरी बातों को गौर से सुनने के बाद उसने कहा..
‘मेरे जीवन का अभी तक अनुभव यही रहा है कि आदमी अपने एहसान का बदला जरूर वसूल करता है. आप अपने इस एहसान की कीमत किस प्रकार वसूल करंेगे, मैं नहीं जानती, अगर बता दें तो बड़ी किरपा होगी’ अनजाने में ही सही उसके जीवन की सारी कड़ुवाहट मेरे सामने बिखरी हुई थी, मेरी नींद उड़ गई, एक बार फिर उसका वजूद मेरे लिए उलझाव पैदा कर रहा था और इस उलझन से बचने के लिए मुझे यही उचित लगा कि उसके साथ और उलझाव न पैदा किया जाए.’
‘देखो तुम्हारा किराया और जुर्माना मैंने अदा कर दिया है, अगर इसकी कीमत देना चाहती हो तो तुम मेरे इस काम की कीमत चुका सकती हो, अपनी कहानी बता कर, बोलो स्वीकार है?’
‘बाबू जी आप भी अजीब आदमी हैं, दो सौ रुपया खरच करके आप मेरी कहानी जानना चाहते हैं. इससे आपको क्या लाभ मिलेगा? अभी तक तो मुझे यही पता था कि हर जवान औरत पर किए जाने वाले एहसान उसके जिस्म से वसूल किए जाने का रिवाज है.’
मैंने उसकी बात काटते हुए कहा... ‘समाज क्या करता है और उसके रीति रिवाज क्या हैं, मुझे नहीं मालूम, उससे मेरा कुछ भी लेना देना नहीं अगर तुम मेरे एहसान का बदला चुकाना चाहती हो तो तुम अपनी पिछली जिन्दगी की कहानी बताओ, बस. अगर तम्हें कोई आपŸिा हो तो मेरी ओर से कोई दबाव नहीं. उसी से मुझे इसकी कीमत मिल जाएगी. 
वह आदिवासी औरत अपनी कहानी बताने के लिए मुझे अपने गांव ले गई और एक ऊंची पहाड़ी के दामन में खड़ा कर दिया. वहां बोलते बतियाते पहाड़ों की गोद में एक पियार का पेड़ था. पके फलों से उसकी डालियां झुकी हुई थीं. गांव से दूर हाने के कारण शायद किसी की निगाह उस पेड़ पर नहीं पड़ी थी. पके फलों से लदा फदा ऐसा पेड़ देख कर कोई भी ललचा सकता था. उसके ऊपर आदिवासी लड़की चढ़ी हुई थी, सारी दुनिया से बेखबर पियार तोड़ रही थी. घर वालों के पेट के सामना करने के पहले खुद अपने पेट का इलाज करना था. इस पूरे पेड़ का फल उसका अपना था, कोई छीन झपट लेगा इसका खतरा भी वहां नहीं था. वह आराम के साथ अपना पेट भर रही थी और सोच सोच कर मगन हो रही थी कि दउरी भर पियार देख कर उसके मां बाप खुश हो जांएगे. वह अपने मां बाप की खुशी का अन्दाजा लगा कर प्रफुल्लित हो रही थी कि इतने में कड़कती हुई उसे आवाज सुनाई पड़ी....
‘ओ लड़की्! क्या कर रही है, जानती नहीं यह सरकारी पेड़ है इसका फल तोड़ना मना है, चल नीचे उतर...’
लड़की ने मुड़ कर देखा तो बनरखा उसे पेड़ से नीचे उतरने के लिए हुकुम
दे रहा था... उसे डर लगा, वह देख चुकी थी कि जंगल के अधिकारी उसकी अइया और बपई तथा गांव वालों की कैसी दुर्गति करते हैं. पीट पीट कर जेल भेजवा देते हैं. उस लड़की ने सफाई दी...
‘बाबू भूख लगी थी इस लिए पियार तोड़ रही थी, गलती हो गई, माफ की जिए, दुबारा ऐसा नहीं करूंगी. उस लड़की ने पियार से भरी दउरी देखा, फिर बनरखा के ऊपर निगाह डाली उसका दिल रो पड़ा. मजबूरन उसे पेड़ से नीचे उतरना पड़ा. उसके पेड़ से नीचे उतरते ही बनरखा ने उसका हाथ पकड़ लिया और मुंह पर जोरदार थप्पड़ मारते हुए बोला... ‘चल इधर’
उसके बाद बनरखा उसे एक झाड़ी के अन्दर ले गया, थप्पड़ खाने और डर के कारण उसके पास विरोध करने का सामथ्र्य नहीं था. आधा घंटा बाद आदिवासी लड़की झाड़ी से बाहर निकली तो बनरखा ने उसे पूरी औरत बना दिया था. शाम ढले जब वह लड़की पियार से भरी दउरी ले कर घर पर आई तो उसके भीतर कोई उत्साह नहीं बचा था.
‘बाबू! पहली बार मेरी देह भूख ने छीन लिया था, आंसू तो नहीं निकले पर मेरी आत्मा कलप रही थी. आंसू क्या निकलते वे तो झाड़ी में ही सूख चुके थे. ‘हमारा कोई था भी नहीं जिसके सामने अपनी चीख को जुबान दे कर शान्ति पाने का प्रयास करती. बाबू जी! भूख ऐसी बदज़ात हकीकत है जो सड़ा खाना खाने पर भी विवश कर देती है. वह पियार भी सड़ चुका था पर मैं उसे भी फेंक नहीं सकती थी.. क्योंकि वह भूख मिटाने के काम आता. बाबू जी! भूख केवल भूख होती है. उसके सामने इन्सान बनाने वाली सारी विशेषतांए सर पटक कर दम तोड़ देती हैं.’
इतना सुनने के बाद उसने सांस ली फिर आगे बोली.... ‘बाबू सुनो एक दिन अइया ने जंगल में लकड़ी लाने के लिए भेजा था, लकड़ी गढ़ कर वापस आ रही थी कि एक दूसरे बनरखा ने घेर लिया. जंगल से लकड़ी लाना कानून के खिलाफ है लेकिन हमारा समाज अपनी विवशताओं के कारण इस कानून को तोड़ने के लिए विवश है. वह बनरखा मेरी टांगी छीन कर चलने लगा तो मैंने उसके सामने हाथ जोड़ कर विनती की, पांव पकड़ा, लेकिन उसके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा. वह आगे बढ़ता रहा, मैं उसके पीछे पीछे चलती रही, अचानक उसने मेरी कलाई पकड़ ली. मेरे भीतर आग सी भड़की, मगर ऐसी आग से क्या लाभ जो स्वयं को राख कर दे. मेरे लिए टांगी की कीमत मेरे बदन से कहीं ज्यादा थी. यह मेरे जीवन का दूसरा मौका था जब मैं खुद को जीवित रखने के लिए अपनी आबरू का सौदा करने के लिए बाध्य की गई थी. अभी सोलहवीं ताजी बयार बदन पर लगी भी नहीं थी कि सांस लेने के लिए जिस मोड़ पर रूकती थी बिना सौदा किए कीमत वसूल करने वाले पहले से ही वहां मौजूद मिलते थे. दूसरों के लिए मुफ्त प्राप्त होने वाली वस्तुओं की भी कीमत अदा करने के लिए मजबूर की जाने लगी तो अपना बदन समेट कर एक दलाल के साथ 
दिल्ली चली गई. यहां मेरा सौभाग्य कहिए या दुर्भाग्य कहिए, एक बड़े आदमी के यहां घरेलू नौकरानी की तरह काम करने लगी.
‘बाबू जी! बड़ा सा मकान, गरमी का नाम नहीं, बैर और पियार जमा करने में जितनी मशक्कत करनी पड़ती थी उसकी आधी मिहनत के बदले पेट भर खाना और आराम से सोना मिल रहा था और मुझे क्या चाहिए था. बढि़या कपड़ा पहनने को मिल रहा था, और रहने के लिए पक्का मकान था ही.’
‘बाबू जी! उस दिन छोटे साहब का कमरा साफ करने के बाद मैंने सोचा कि इनका बिस्तर कैसा है? जरा लेट कर देखा जाए, साफ सुथरे कमरे में नरम नरम बिस्तर पर आराम से चिŸा लेटी हुई दिवारों पर टंगी तस्वीरों को देख रही थी. बाबू ऐसा लगा जैसे जीवन वह नहीं जिसकी कल्पना हम गरीब करते हैं बल्कि जीवन वह है जिसकी झलक दिवार पर टंगे चित्रों में दीख रही थी. यही सोचते सोचते नींद आ गई. कुछ देर बाद अपने ऊपर एक इन्सानी बदन का बोझ महसूस हुआ फिर आंख खुली तो अपने बचाव का कोई रास्ता नहीं था. समझ गई कि यहां भी मुझसे कीमत वसूलने का प्रयास हो रहा है. छोटे साहब मुझको दबोचे हुए थे, मैंने सोचा जो रोटी देता है वह कीमत भी वसूलता है. लेकिन जब मुझे इसका अलग से भुगतान मिला तो अन्दाजा हुआ कि बिकने वाली चीजों की कीमत इस बात पर निर्भर है कि उसे बेचने के लिए किस तरह के बाजार में रखा गया है? 
‘और एक दिन छोटे साहब अपने कारोबार के सिलसिले में कहीं गये हुए थे. बहू जी कहीं किसी किटी पारटी का आनन्द ले रही थीं और माता जी अपने कमरे में ठाकुर जी की पूजा कर रही थीं कि बड़े साहब ने अपने कमरे में बुलाया. उनके सर में दर्द हो रहा था. बाप के समान पूज्यनीय आदमी की सेवा करने में किसी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं हुई. सर दबाते हुए अभी दो मिनट बीते होंगे कि उन्होंने दारू की बोतल और गिलास लाने का आदेश दिया, नशा चढ़ा तो वे भी अपनी कीमत मेरी देह से वसूलनेे लगे. अपने तरीके से उनका उनका बेटा भी कीमत वसूल ही चुका था. वह देह ही थी जिसके लिए दोनों लालायित थे. पढ़े लिखे आदमियों से दूर रहने वाला आदिवासी असभ्य समाज भी बाप, बेटे की साझेदारी को अच्छी निगाह से नहीं देखता. मगर मैंने संसार का कई रंग देखा था. मैंने अपने दिल को समझाया, बाजार में बिकने वाली वस्तु खरीदार नहीं देखा करती, इससे लाभ भी क्या हंै? भूख के सामने जीवन के सारे सिद्धांत अपनी चमक खो देते हैं. मुझ जैसी औरत को रीति, कुरीति जैसे चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए वरना पुनः उस बाजार की और लौटना पड़ेगा जहां बिकने वाले माल की कीमत कम आंकी जाती है.
बाप और बेटे के बीच एक तीसरे कोण की तरह मैं चल रही थी. कि मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर एक चैथा कोण भी अपना वजूद दर्ज कराने के लिए बेकरार है. इसकी जानकारी होने के बाद बाप और बेटा
दोनों की नींद हराम हो गई. इस चैथे कोण को रोकने के लिए मुझे भरपूर कीमत मिली. एक हाथ से बाप ने दिया तो दूसरे हाथ से बेटे ने भी दिया. अपने पांव पड़ी जंजीर की मजबूती का अन्दाजा करके मैंने बार बार अपनी मजबूरी के साथ समझौता किया. लेकिन चैथी बार अपने को वीरान करने के बाद मेरे सामने एक सवाल खड़ा हुआ ये लोग तो राह के मुसाफिर हैं कुछ दूर तक साथ निभाने के बाद अपनी राह पकड़ लेंगे लेकिन जीवन की आखिरी मंजिल तक सहारा देने के लिए भी तो एक स्थाई साथी की आवश्यकता पड़ती है, इस सहारे का मैंने स्वयं गला घोटा है, अगर इसी तरह चलता रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है, मैं जीवन के रास्तों पर तनहा भटकते हुए किसी चटियल मैदान में गिर कर दम तोड़ दूंगी. मेरी लाश पर कोई आंसू बहाने वाला भी नहीं होगा. स्थाई सहारे की तलब उसी समय पूरी हो सकती है, जब कोई उंगली पकड़ने वाला मिले. यही उंगली पकड़ने वाला कल मेरा हाथ थामने वाला होगा.
मैंने इस चैथे कोण के वजूद को मिटा कर सही किया या गलत इसका मूल्यांकन करने के लिए मेरे अन्दर साहस नहीं था. पियार के पेड़ पर चढ़ी, जलावनी लकड़ी लेकर आती हुई, शाम के धुधलके में दिसा फरागत के बाद वापस आती हुई, आदिवासी लड़कियों की तस्वीरें मेरी आंखों में घूम गई. मैंने अपने आप को समझाया जो भी मैंने किया ठीक किया इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी मेरे पास नहीं था.
‘बाबूजी! मेरे साथ यह मजबूरी थी कि त्रिकोण के बीच चैथे कोण को अपना वजूद देने की अनुमति नहीं थी. लेकिन पांचवी बार मैंने अटल निर्णय लिया कि लाख मुसीबतों के बाद भी अब मैं अपने मातृत्व की सुरक्षा करूंगी. अब मुझे अपना सहारा मिल गया है, इसको बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दूगीं. बाबू जी! अपनी जान की कीमत पर भी मैं अपनी जिन्दगी का सहारा तैयार करूंगी. बाप और बेटे में इसका बाप कौन है, मैं नहीं जानती, मां बनाने वाले औजारों को जानने की जरूरत भी नहीं लेकिन इतना मुझे मालूम है कि इसकी मां मैं हूं और बाप भी. यह बच्चा मेरा है. देह के भूखे भेडि़यों से टूट और लुट चुकी मुझ जैसी औरत का यही सहारा बनेगा, ऐसा मेरा विश्वास है, मैंने कोई चोरी नहीं की है, कहीं डाका नहीं डाला है, मैं अपने पेट में पल रहे बच्चे की हिफाजत के लिए दिल्ली से भाग खड़ी हुई हूं. मुझे खुशी है कि इस संकट के समय मुझे आप जैसा आदमी मिला जो सौदागर नहीं है, अगर मेरी जिन्दगी ने साथ दिया तो मैं इस बच्चे को पूरब की तरफ सुबह से पहले उगने वाली सूरज की लाली की हकीकत समझाउंगी.’
जीवन जीने का सराहनीय साहस उसमें देख कर मेरा मन खिल उठा...वी काठी से मजबूत थी तो मन से भी. 
                                                                        

                                               तांत्रिक


भाई साहब और मेरे बीच खूनी रिश्ता नहीं था, उल्टे हम दोनों उन्नीस कहे जाने वाले जाति और धरम से संबन्ध रखते थे. ‘हिन्दू मुसिलम भाई भाई बाकी जाति कहां से आई’ नारे का भाई साहब पर कोई असर नहीं था. अपने धर्म गुरुओं का उपदेश कि हिन्दुओं से दूर रहो, मुझे कभी नहीं जंचा. इसका लाभ मुझे यह मिला था कि एक अदत मस्त मस्त भाभी का दुलारा देवर तो मैं था ही, अतिरिक्त लाभ के रूप में एक बच्चे का चचा भी बन गया था.
वैसे तो भाई साहब का मकान पूरे का पूरा शान्ति निकेतन था मगर थोड़ी सी गड़बड़ थी कि एक आवारा किस्म का भूत भाभी साहिबा को परेशान करने के लिए आ जाया करता था बिना बुलाए मेहमान की तरह. खूब परेशान करता था. इस भूत को भगाने के लिए अक्सर भाई साहब के घर ओझाओं, सोखाओं का डेरा जमा रहता था. वे किसिम के अनुष्ठान कराते थे जिसके लिए इलायची, सिन्दूर, लौंग, आदि की ब्यवस्था मुझे करनी पड़ती थी.
मेरी हर बात को भाई साहब ब्रह्म वाक्य मान कर आदर दिया करते थे. मगर ओझाओं, सोखाओं के विरूद्ध एक वाक्य भी सुनना उन्हें गवारा नहीं था. भूतों पे्रतों के संदर्भ में उनके अपने तर्क थे. जिनकी पुष्टि के लिए उनके पास प्रमाण के रूप में ढेरों उदाहरण भी थे. मगर एक दिन मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि वे एक नामी गिरामी ओझा पर हत्थे से बाहर उखड़े हुए थे और उसके ऊपर बुरी तरह गरज बरस रहे थे. पूरी तरह भड़ास निकाल चुके तब भाई साहब ने मुझसे कहा.. कि मैं अपने धरम वालों की मदत लूं और भाभी साहिबा को मजारों पर ले जाऊं. वहां उनका इलाज हो सकता है. दूसरे धरम वाले पीरों से तो भूत जरूर डरते होंगे.
भाई साहब की बात सुन कर मुझे चक्कर आ गया. भूतों, प्रेतों को नकारने वाला इन्सान अब उसी के चक्कर में घनचक्कर बने, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? यह मेरे लिए गंभीर समस्या थी मगर इससे बचाव का कोई रास्ता भी नहीं था. उस समय तो मैं चुप रहा पर अपने बचाव के लिए रास्ता तलाशने लगा कि ऐसे में हो क्या सकता है?
उस समय मेरी घबराहट बढ़ गई थी बावजूद इसके भाई साहब ने मेरी रवानगी की तारीख भी तय कर दी. इस स्थिति से घबरा कर मैंने खुद को तांत्रिक घोषित कर दिया. उन लोगों को मेरी बात मजाक लगी, मेरा जोरदार उपहास भी उड़ाया गया. भाई साहब ने कहा मजाक छोड़ो, कब जाने की तैयारी कर रहे हो?
अपनी इस नई घोषणा के बाद सबसे बड़ी समस्या यह थी कि बिल्ली के
गले में घंटी कैसे बांधी जाये. मेरी सात पुश्तों तक का भूतों से कभी पाला नहीं पड़ा था., अब हालत यह थी कि भाभी को तो कभी कभी भूत यूं ही आ कर मनोरंजन के लिए परेशान किया करते थे लेकिन मेरे ऊपर तो दाना पानी लेकर सवार ही रहने लगे.
एक दिन मैगजीन खरीदने के लिए किताब की एक दुकान पर पहुंचा, दिमाग में कुछ रौशनी सी मालूम हुई, सामने टंगी जादू की एक किताब दिखी, उसे तुरन्त खरीदा और घर आ गया. उस किताब को बहुत तन्मयता से पढ़ा, उसे समझने की कोशिश की, उसमें बताए हुनरों को सीखने का प्रयास करने लगा. थोड़ा सिद्धहस्त होने के बाद कल्लू खलीफा की मज़ार पर जा पहंुचा वहां एक लड़की ‘झूम बराबर झूम शराबी’ की स्टाइल में झूम रही थी, सामने एक मुर्गा रखा था उसकी दोनों टांगे बंधी थीं. सामने वाली प्लेट में लांैग, इलायची, सिन्दुर तथा कुछ और सामान सजा कर रखे हुए थे. उसके ऊपर एक नींबू भी रखा हुआ था, उसमें तीन चार सुइयां धसाई गई थीं, बगल में थोड़ी राख भी रखी हुई थी जिसे चुटकियों में ले कर लड़की के सिर पर फेंका जा रहा था, रह रह कर मिर्च की धुनी भी उड़ाई जा रही थी.
मज़ार पर की सारी वस्तुओं तथा उससे संबधित क्रिया कलापों को बारीकी से देख रहा था और उन सबका जादू वाली किताब से मिलान भी कर रहा था. अच्छी खासी जानकारी ले कर भाई साहब के घर जा पहुंचा. सबसे पहले अपने आप को तांत्रिक प्रमाणित करने के लिए एक उल्टी हांड़ी को दो लीटर पानी पिलाया, फूल की थाली में चार अदद सरसो लिपटाया जो लाख उलटने पुलटने के बाद भी छोड़ने का नाम नहीं ले रहा था. फिर उसी थाली को भाभी साहिबा की खुली पीठ पर सीखी गई कला के द्वारा चिपका दिया. थाली चिपकी रही. मेरा कमाल देख कर भैया भाभी आश्चर्य के समुन्दर में अभी डुबकी लगा ही रहे थे कि पानी में ंपहले से रखी गुडि़या की गर्दन टूट कर अलग हो गई जिसे भूत की जांच के लिए विशेष मंत्र विधि द्वारा तैयार किया गया था. यह सब देख कर दोनांे लोगों के चेहरे पर भय और आतंक छलकने लगा. लोहा गरम देख कर मैंने दोनों को एक एक मोमबŸाी दे कर कहा कि वे अपनी अपनी मोमबŸाी का सिरा एक दूसरे की मोमबŸाी से मिलांए. मेरे आदेश का पालन करते ही दोनों की मोमबŸिायां जल उठीं. फिर क्या था भइया और भाभी दोनों ने मेरी खूब खूब तारीफ की. और मुझे बिलादिक्कत तांत्रिक होने का प्रमाण पत्र दे दिया.. अब क्या था भाभी का इलाज करने की अनुमति भाई साहब ने मुझे दे दिया.. ‘यार अब तूं ही इनका इलाज कर, कहीं बाहर जाने की जरूरत क्या है?’
मेरी तारीफ करते हुए भाई साहब ने कहा... ‘यार तुम तो छुपे रूस्तम निकले, इसके बाद नाराज भी हुए. जब तुम तंत्र मंत्र जानते थे तो उसे छुपा कर क्यों रखा, मेरा हजारों रुपया स्वाहा करा दिया फिर भी कुछ लाभ नहीं 
मिला.’
तांत्रिक बनने के लिए मुझे काफी परीश्रम करना पड़ा था, उसका मीठा फल खा कर मुझे असीम आनन्द मिला मगर आगे क्या किया जाए, यह समझ में नहीं आ रहा था. इस समस्या के समाधान के लिए कोई मेरा सहयोग भी तो नहीं कर सकता था. पर मुझे अपने ऊपर यकीन था कि भाभी का मन तो मैं बदल ही दूगा. एक दिन दौड़ता हुआ भाई साहब के घर पहुंचा, मुझे पसीने से नहाया देख कर मियां बीबी दोनों घबरा उठे. मैंने अपनी उस स्थिति का कारण बताया कि अभी अभी चार में से तीन भूतों को बसुआ पोखरा की तरफ टहलते हुए देखा है.. उनका सरदार अकेला इस समय आपके शयन कक्ष में विराजमान है, उस पर हमला करने का यही सुनहरा अवसर है. इसी के साथ मैंने भाभी को आदेश दिया कि दौड़ कर रसोईं से नींबू ले आयें.,
भाभी साहिबा तो रर्सोइं की तरफ नींबू लाने के लिए चली गई पर भाई साहब साहब डरे हुए थे. कहने लगे... ‘यार पहले तो हमलोंगों की सुरक्षा का इन्तजाम कर लो, फिर भूत पर हमला करना.’
भाई साहब को पूरी सुरक्षा का आश्वासन मैं दे ही रहा था कि भाभी साहिबा हाथ में नींबू लिए आ गईं. जल्दी से उन लोगों को एक चटाई पर बिठाते हुए मैंने चटाई के चारो ओर एक रेखा खींच दिया और उन्हें बताया कि वे किसी भी हाल में इस खींची गई रेखा के बाहर न निकलेंगे. भाभी को एक सिक्का थमा कर मैंने कहा कि ‘आप इसे अपनी हथेली के बीच दबा लें,’ भाभी ने सिक्का हथेली में दबा भी लिया. भूत के प्रभाव के कारण उसकी गरमी उन्हें सहन नहीं हुई और सिक्का भाभी की हथेली से नीचे गिर गया. भूत की इस बŸामीजी पर मुझे गुस्सा आ गया, मैंने चिल्ला कर कहा एक छूरी ले आइए.. भाभी साहिबा भूल गईं कि किसी भी हालत में रेखा पार नहीं करनी है. वे घबरा कर रेखा पार करने ही वाली थीं कि.. मैंने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोक दिया. और अपनी जेब से छुरी निकाल कर नींबू में घुसेड़ दिया. उसमें रस के स्थान पर खून बह निकला. ऐसा दृश्य देख कर भाभी झूम गईं फिर उनकी देह ही अकड़ गई, उनके बदन में ऐंठन होने लगी मानो उन्हीं के पेट में छुरी घुसेड़ दी गई हो.
देहाती पुस्तक भंडार वाली किताब और कल्लू खलीफा के मज़ार की बलिहारी से मैं पूरा तांत्रिक बन चुका था फिर तो मुझे ही तंत्र और मंत्र के द्वारा भाभी जी का इलाज करना था.
भाभी के रोग के इलाज के लिए मैंने भाभी जी के मन को परखना शुरू किया. भाभी जी एक बड़े अफसर की पत्नी हैं, काम न धाम, केवल आराम ही आराम. इस आराम के कारण उनके बदन की चरबी बढ़ती जा रही थी, सबसे पहले किसी तरकीब से उनकी बढ़ती चरबी को रोकवाने का काम करना होगा. चरबी रोकवाने के लिए मैंने भाभी जो को समझाया कि मंत्र के द्वारा मुझे संदेश मिला है कि आप को अपने घर की साफ सफाई स्वयं 
किया करें, दूसरे लोग घर को अपवित्र कर देते हैं. इसके साथ एक और काम करना होगा कि घर का सारा सामान अब एक स्थान पर नहीं रहने देना है, उसे हर सातवें दिन इधर उधर हटाते रहना चाहिए. अगर आप ने ऐसा नहीं किया तो भूतों के साथ की गई छेड़ छाड़ हम सभी को भारी पड़ सकती है. क्योंकि जो भूत अभी भगाए नहीं जा सके हैं वे हमारे पीछे पड़े  हुए हैं.
मेरे इस आदेश का असर हुआ और भाभी ने घर की साफ सफाई खुद करना शुरू कर दिया. वे सुबह झाड़ू ले कर शुरू हो जाती थीं और रात आठ बजे तक घर की साफ सफाई करती रहती थीं. इतना करने में वे इतना थक जातीं कि रात में पलंग पर पड़ते ही नींद में चली जातीं.
मेरे मंत्र की क्रिया आठ दिन तक चली फिर तो भाई साहब के घर से भूत भाग गये. कुछ दिन बाद भाई साहब भाभी जी की इस दुर्दशा पर द्रवित हो गये. चोरी चोरी वे घर का कुछ काम भाभी जी की मदत करने के लिए निपटा दिया करते थे, जिन्हें भाभी जी को निपटाना होता. इसकी जानकारी होने पर मैंने भाई साहब को सबक पढ़ाने का निर्णय लिया.
मैं अब तक बिना किसी शक शुबहा के तांत्रिक बन चुका था. मेरी बात मानना उन दोनों की मजबूरी थी. मैंने उन्हें पूर्ण रूप से विश्वास दिलाने की गरज से एक पुख्ता उपाय बताया...‘सूरज निकलने के पहले दोनों पति पत्नी एक साथ छपका पहाड़ी पर जा कर एक अदत मुर्गा छोड़ने का कार्यक्रम बना लें और ऐसा एक महीने तक करना होगा. यही मुर्गा घर में आने वाले भूतों का भोजन होगा फिर वे कभी आपके घर की ओर देखेंगे तक नहीं.’ मरता क्या न करता दोनों को मेरी बात माननी पड़ी. मुर्गा लाने के लिए दूसरे दिन ही एक चपरासी को लगा दिया गया.
भाई साहब और भाभी जी दोनों दूसरे दिन से ही पहाड़ी पर जा कर मुर्गा छोड़ने लगे. जब वे वापस होते तब मेरे द्वारा नियुक्त छोटू कोल उन पर कब्जा जमा लेता. और मेरे घर पर मुर्गा ला कर मुझे सुपुर्द कर दिया करता था. सुबह सुबह आठ किलोमीटर की सैर का परिणाम यह निकला कि भाभी की कमर तेजी से पतली होने लगी मुझे डर लगा कि अगर यही क्रम चला तो भाभी जी को लंहगा बांधने में भी दिक्कत हो सकती है. 
चार महीने गुजर चुके है, भाभी के घर में भूत फिर वापस नहीं आये. तीस मुर्गा खा कर मैं मस्त मस्त हूं, मैंने जादू वाली किताब को गंभीरता से देखा, उसके द्वारा सीखे गये नुस्खे के कमाल पर खुश खुश हुआ.. 
‘चलो फर्जी ही सही, भाभी जी ठीक तो हो गईं, एक बड़े आदमी के लिए तीस मुर्गा के क्या मायने?’ इससे अधिक तो ओझा खा पी जाते.’

                                                                               

                                            काला झन्डा


साल को तो ख्याल नहीं केवल इतना ख्याल है कि उस समय मेरा कस्बा नोटीफाइड एरिया था, तब यहां कंक्रीट के जंगल उगे नहीं थे. कस्बा देखने पर आधा गांव दिखता था तो आधा शहर. उस समय मेरी नोटीफाइड एरिया बिना किसी चेयरमैन के चल रही थी यानि परगनाधिकरी के अधीन थी. उन्हीं का शासन चल रहा था.. गरमी के दिन थे और पूरे कस्बे में पीने वाले पानी की दिक्कत थी. त्राहिमाम मचा हुआ था, हर कोई शाम सबेरे पानी के लिए नल के अगल बगल परेड करता दिखाई देता था. कस्बे का कोई चुना हुआ चेयरमैन तो था नहीं जिससे लोग फरियाद करते या उलाहना देते, फटकारते, भला बुरा बोलते. अपना गुस्सा उतारते. परगनाधिकारी महोदय ही टाउन एरिया के ईन्चार्ज भी थे भला उनसे शिकायत करने की किसमें हिम्मत थी. सो उस समय कोई किसी की सुनने वाला नहीं था.
कस्बे के लोगों ने पानी की ब्यवस्था ठीक करने के लिए बारहा प्रयास किया पर वही ढाक के तीन पात. जनता की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं था. ई.ओ. साहब परगनाधिकारी को गालियां देते हुए नहीं थकते थे. दूसरी ओर परगनाधिकारी ई. ओ. को जिम्मेवार ठहरा कर अपना दामन छुड़ा लिया करते थेे.
सप्ताह भर की कसरत के बाद भी जब प्रशासनिक स्तर पर कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला तो मैंने कस्बे की औरतों और बच्चों को इकठ्ठा किया, एक जुलूस निकाला, सभी के हाथों में मटका और बाल्टी थी आधे शहर का चक्कर लगाने के बाद जुलूस में शामिल लोगों ने टाउन एरिया दफ्तर के सामने ला कर मटका पटकना शुरू किया. मटकों की तादात इतनी ज्यादा थी कि वहां पर मलबा सा जमा हो गया. इतना सब कुछ करने के बाद भी ऐसा महसूस हुआ जैसे चिकने पेड़ पर पानी पड़ा हो. प्रशासन पर कोई असर नहीं, मटका फोड़ने से भला प्रशासन पर क्या असर पड़ता.
मटका फोड़ो आन्दोलन बीते तीन दिन हो गया लेकिन पानी की ब्यवस्था में कोई अन्तर नहीं दिखाई पड़ा. लोगों की पीड़ा बढ़ती जा रही थी, अधिकारी समझ रहे थे कि इस समय पानी की ब्यवस्था करने से जनता का मन बढ़ सकता है इसलिए अधिकारियों ने जनता की चिल्लाहट पर ध्यान देना उचित नहीं समझा. इस समस्या के समाधान के लिए एक दिन मैंने कंधे पर लाल सा गमछा रखा और लोटा, साबंुन, बाल्टी लेकर परगनाधिकारी के बंगले पर जा पहुंचा. इस हालत में मुझे देख कर पहले तो साहब के बंगले के कर्मचारी बहुत घबराये लेकिन बाद में परगनाधिकारी को खबर भिजवाई 
गई तो बेचारे बाहर निकले. इस गैर जिम्मेदाराना हरकत का कारण उन्होंने जानना चाहा तो मैंने निवेदन किया कि श्रीमान् जी स्नान हेतु पानी की तलाश में भटक कर यहां तक आ गया हूं. आज चार दिन बीत चुका है, स्नान करने के लिए पानी नहीं मिला, कृपया अपने स्तर से मेरे स्नान की ब्यवस्था कराएं, आप पानी नहीं देंगे तो कौन देगा, देखिए साथ में बाल्टी भी लाया हूं, उसमें पीने के लिए पानी भी ले जाऊंगा.
परगनाधिकारी महोदय घाट घाट का पानी पिए हुए थे इस अवसर पर  हुज्जत करना उन्हंे उचित नहीं लगा, अविलम्ब उन्होंने एक चपरासी को आदेश दिया कि वह कूंए से पानी ला कर मेरे स्नान की ब्यवस्था करे.
हाकिम की चालाकी के सामने मेरी फितरत मार खा गई. चुप चाप लौट आया. मेरा यह हमला नाकाम रहा. इसकी चिन्ता तो थी ही दूसरा कौन सा अस्त्र उठाया जाए यह प्रश्न आ कर खड़ा हो गया. दूसरे दिन टाउन एरिया का कार्यालय खुलने के पूर्व उसके सामने एक मोटा सा बांस गड़वा दिया. इस बांस को बहुत बेढंगे तरीके से सजवाया गया. उस बांस के ऊपर तीन मीटर का काला झन्डा लहरवा दिया गया. एक वकील जो मेरे मित्र थे एक टूटा सा टीन पीट पीट कर अधिकारियों की आत्मा को धिक्कार रहे थे लेकिन अधिकारियों की खाल इतनी मोटी थी कि उसका उनके ऊपर कोई असर नहीं था. पुनः सायंकाल यही प्रक्रिया दुहराई गई. फिर भी यथास्थिति बनी रही. ऐसी सूरत में सारे अधिकारियों का नाम लिख कर बांस में सजाया गया. उन नामों को गर्दनों जैसी दिखने वाली चीज पर लिखा गया था. इन सारे गर्दनों को रावण का रूप में सजाया गया था. ब्यवस्था थी कि वहां से गुजरने वाला हर कोई पान खा कर उन रावणों पर थूके. यह एक तमाशा था जिसे देखने के लिए काफी भीड़ इकठ्ठा हो गई. पान खा कर थूकने वालों के भीड़ के कारण सड़क लाल हो गई. इस आन्दोलन की एक मजाक से अधिक की हैसियत नहीं थी. किन्तु इस मजाक ने नोटीफाईड एरिया के अधिकारियों को कस्बे में हास्य का विषय बना कर रख दिया था. उनके मित्रगण इस झन्डे और थूक के कारण उनका उपहास उड़ाने लगे. इसी बीच एक सिचाई मंत्री जी का दौरा हुआ तो मैंने उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने वहां उपस्थित जिला कलक्टर से कहा... 
‘जनाब! जिन नामों पर थूका जा रहा है, कहीं उनमें आपका नाम भी तो नहीं है?’ 
जिला कलक्टर उस समय तो कुछ नहीं बोले लेकिन मीरजापुर जा कर उन्होंने स्थानीय अधिकारियों को कुछ आदेश निर्देश दिया. परिणाम स्वरूप अधिशासी अधिकारी महोदय मेरे पास आये और परगनाधिकारी से बात करने के लिए कहा. मैं परगनाधिकारी के दफ्तर में गया तो उन्होंने हसते हुए कहा ... 
‘जनाब! कस्बे में पानी की कमी नहीं है अकारण आप मेरी फजीहत 
करवा रहे हैं. मैंने कहा.. ‘श्रीमान् जी आपका कसूर मैं अपने सर लेने के लिए तैयार हंू मगर आप मुझको बेपानी बना कर रखें यह मुझको स्वीकार नहीं.’
परगनाधिकारी महोदय ने मेरे इस साहसिक मजाक का आनन्द लेते हुए कहा कि 
‘आप ही बताएं के आपको पानीदार बनाने के लिए मेरी ओर से क्या सहयोग किया जा सकता है?’ 
मैंने कहा.. ‘श्री मान् मेरे घर के नल में पानी आ जाए तो मैं अपने आप को पानीदार मान लूंगा.’
सात घंटे तक पानी के लिए युद्ध स्तरपर काम होता रहा. 
कलक्टर मीरजापुर के दबाव में परगनाधिकारी पानी का पे्रशर नापने के लिए गरमी के दिनों में सड़कों का चक्कर काटते रहे. नोटीफाइड एरिया वालों की कड़ी मिहनत के बाद मेरे नल में पानी आया. फिर क्या था सारे मुहल्ले के लोग अपने अपने कनेक्सन से पानी भरने के लिए दौड़ पड़े. मैंने देखा कि ‘भालू आया भालू आया’ की तर्ज पर लोग ‘पानी आया पानी आया’ बोल रहे हैं. काले झण्डे के कमाल पर मैं झूम उठा...

                                                                                


वोट मिल जाएगा साकार, करम कर दीजिए,
भूख की  आग बहुत  तेज  है रोटी  दे दो.
इतने  वादों  का  खजाना मैं  कहां रखूंगा,
शर्म  नंगी  हुई जाती  है, लंगोटी  दे  दो.
-----
जि़न्दगी का रास्ता अब  आप  बतलाने  लगे,
भाई चारा का तरीका अब आप सिखलाने लगे.
लूट  कर नंगा कर दिया है आपने सारा जहां,
लोग नंगे  हो  गये  तो  आप  घबराने  लगे.
-----
खुद  फरामोशी का  आलम  हाय रे,
कर दिया सो कर दिया क्या बात है.
जब पड़ा  पाला  तो  फरमाने  लगे,
अब  मेरी  इज्जत तुम्हारे  हाथ  है.
-----



                                            आन्दोलन


नई बस्ती आन्दोलन इमरजेन्सी के दौरन शुरू हुआ. उस समय इमरजेन्सी का भूत हर ब्यक्ति के दिलोदिमाग पर सवार था. छोटे बड़े हर स्तर के नेता, मुर्गियों की तरह अपने अपने दरबे में पड़े थे. नगर की हालत यह थी कि ‘आये बारात या कि पाए बफात’ ‘किसी को जूता मिले या कोई खाए लात,’ होती नहीं है कोई हलचल मेरे शहर में.’ हर नेता की जुबान, तालू से चिपकी हुई थी. ऐसे भयग्रस्त वातावरण में करीब सौ के करीब बच्चे, बूढ़े, जवान मर्द औरत मेरे घर पर आ पहुंचे, उनके चेहरे उतरे हुए थे, वे रो रहे थे और उनकी आंखें आंसुओं से भरी हुई थीं.
मुझे देखते ही सभी रोते हुए अपना हाल सुनाने लगे, वे इतना कराह रहे थे कि मैं कुछ समझ नहीं पाया कि वे असल में कहना क्या चाहते हैं. मैंने सभी को शान्त किया और निवेदन भी, कि वे अपनी बातें बतांए .वे कहने लगे रोते हुए ही.. 
‘नेता जी! हम सभी लोगों को बचा लीजिए, हमलोगों को उजाड़ा जा रहा है, हमारे बाल बच्चे बर्बाद हो जाएंगे. नेता जी! अब आप ही हमारे सहारा हैं, सारे नेता हम से आंखें चुरा रहे हैं, हमारी कोई नहीं सुन रहा. लोग बोलते है कि इमरजेन्सी लगी हुई है, ऐसे में कुछ नहीं हो सकता. अब आप ही हम गरीबों के सहारा हैं चाहें तो उजड़वा दंे या उजड़ने से बचा लें.
मेरे घर के सामने मौजूद चेहरे मेरे जाने पहचाने थे, उनके साथ मेरा उठना बैठना भी था. वे इस तरह से मुझसे बातें कर रहे थे जैसे मेरे हाथ में जादू की कोई छड़ी हो. वे अपनी सुरक्षा के लिए भीख मांग रहे थे. वैसे भी इमरजेन्सी में हर आदमी के लिए अपनी जान बचाना कठिन हो चुका था. ऐसे में कौन दूसरे की मदत करने वाला था. उनकी बातें सुन कर मेरा पाजामा भी ढीला हो गया.
उनकी समस्या यह थी कि वे पचासों साल पहले से जिस बस्ती में घर मकान बना कर आबाद थे. वह जमीन जिला पंचायत की नजूल की शक्ल में थी. पहले वह जमीन ऊबड़ खाबड़ थी, गहरे गहरे गढ्ढे थे, उसे पाट कर लोगों ने मकान बनवा लिए थे. पचासों साल से घर मकान बनवा कर आबाद रहने वाले लोगों का उस जमीन पर कानूनी हक नहीं था. वे अतिक्रमण कर्ता थे. गरीबी के कारण उन लोगों ने उस जमीन पर कानूनी हक पाने के लिए प्रयास भी नहीं किया था. वे तो दाने दाने के लिए मोहताज थे. वे प्रयास भी कैसे कर लेते, कानूनी हक पाने के लिए, आर्थिंक और शैक्षिक कुशलता की जरूरत होती है. जो उनके पास नहीं थी.
मजे की बात यह कि सरकार द्वारा कई सर्वे सेटलमेन्ट भी कराए गये पर उन गरीबों को उस जमीन पर कोई हक नहीं दिया गया. इमरजेन्सी लग 
जाने के बाद नगर का एक चालाक सेठ सक्रिय हो गया, उसकी निगाह इस जमीन पर पहले से ही थी पर मौका अच्छा नहीं मिल रहा था. इमरजेन्सी में सभी जगहों पर सेठों की बन आई थी, ऐसे लोगों को लगने लगा था कि वे कानून को अपनी इच्छानुसार उलटवा, पुलटवा सकते हैं. सेठ ने इमरजेन्सी के एक महीने बाद जिला पंचायत अघ्यक्ष से साबिका बैठाया, उनसे गुप चुप सौदा किया. उसका इस शर्त के साथ जिलापंचायत अध्यक्ष से समझौता हुआ था कि जमीन खाली होने के बाद ही लिखा पढ़ी का काम होगा. जमीन खाली करवाने के लिए ही सेठ जोगाड़ कर रहा था.
मामला गंभीर था, सो जल्दी में ही निपटाना था इस लिए आदमियों की जगह मशीनों को लगा दिया गया था. एक बुलडोजर बस्ती में गुर्राने लगा, उसके साथ पुलिस के सिपाही और मकान गिराने के कारीगर तथा मजदूर भी थे. पुलिस की साया में विभागीय अधिकारियों का दबाव बस्ती वालों पर बढ़ता जा रहा था. इमरजेन्सी में पुलिस और अधिकारियों से टकराना कठिन काम था सो मैंने अपने सहयोगियों से राय मशविरा किया तो लोगों ने कहा कि मामला एक भारी पत्थर के समान है जिसे चूम कर छोड़ना पड़ेगा. प्रशासन से ऐसे समय में नहीं लड़ा जा सकता इस लिए दामन छुड़ा लेना ही हितकर होगा. तय दिया गया कि जब दिल्ली का चांदनी चैक, शालीमार, दरियागंज के मुहल्ले घाराशायी कराए जा सकते हैं, उसे बचाने के लिए कोई नेता सामने नहीं आया फिर मेरे मुहल्ले के लोग किस खेत की मूली हैं. पर मुझे उन गरीबों के साथ न चलना, पीठ दिखाने जैसा जान पड़ा.
एक ओर आग और दूसरी ओर खांईं के बीच चलने की मेरी मजबूरी थी पर कुछ समझ में नही आ रहा था कि क्या करना चाहिए. इस उथल पुथल के बीच मुझे लगा कि सबसे पहले झगड़े की क्या जरूरत है? जिलापंचायत अध्यक्ष से मिलना चाहिए और जमीन के बारे में बात करनी चाहिए. आखिर जमीन तो जिलापंचायत की ही है. उससे राजस्व विभाग का कुछ लेना देना नहीं है, जिलापंचायत का अध्यक्ष मीरजापुर में बैठता है, वहां जाना होगा.
अध्यक्ष से बात करने के लिए हमलोग तीन आदमी मीरजापुर उनके आवास पर पहुंचे. तीन घंटे की प्रतीक्षा के बाद किसी तरह उन्होंने मिलने का समय दिया यानि के चार बजे के आस पास उनके सामने हमलोगों की पेशी हुई, जिस समय हमलोग अध्यक्ष महोदय से बातें कर रहे थे उस समय उनके सारे अहलकारान हमारी ओर ऐसे देख रहे थे मानो गांव में ऊंट आया हो. 
थोड़ा अटपटा तो जरूर लगा पर तत्काल समझ में आ गया कि उनकी आंखों में हमलोगों के लिए अचरज क्यों है? क्योंकि हमलोग किसी अध्यक्ष से नहीं बल्कि एक ऐसे आदमी से मिल रहे थे जो कभी एक रियासत का राजा हुआ करता था.
उन लोगों का बर्ताव उलझन भरा था फिर भी हमलोगों को तो अध्यक्ष 
से किसी भी हाल में मिलना ही था. हमें किसी तरह उनके सामने हाजिर कराया गया.
हमलोगों ने देखा कि राजा साहब की आंखों से चिनगारियां फूट रही हैं. उन्होंने खुद को रोकते हुए पूछा... ‘कैसे आना हुआ’ एक संक्षिप्त सा सवाल
हमलोगांे ने उनके सामने अपनी बातें रखी. कुछ देर तक वे खामोश रहे फिर बोले...
‘मुझे सारा कुछ मालूम है, जानते नहीं हो आप लोग कि इमरजेन्सी लगी हुई है, कानून का साथ दीजिए नहीं तो प्रशासन आप लोगों को ऐसा सबक सिखाएगा कि सारा कुछ भूल जांएगे.. अब आप लोग जा सकते हैं.’
अभी उनके कहे शब्द गूंज ही रहे थे कि उनके दो अहलकारान आ कर हमें धकेलने लगे. हम तो खुद वहां से निकल ही रहे थे फिर भी वे हमें धकेल रहे थे. उनकी इस हरकत पर मुझे गुस्सा आ गया, एक को हमने जोरदार घक्का दिया फिर कोई सामने नहीं आया.
इस तरह हमारा पहला प्रयास असफल हो गया. निराश हो कर हमलोग मीरजापुर से रावटर््सगंज लौट आये. यहां आ कर मैंने कुछ कामरेड सांसदो तथा एक कांग्रेसी सांसद को सूचना देने का पहला काम किया. इसके बाद मैंने जिला कलक्टर, कमिश्नर, पुलिस कप्तान को भी सूचनाएं दी फिर मैंने लाइटनिंग काल के जरिए मुख्यमंत्री जी को भी उजाड़े जाने की योजना से अवगत कराया.
इस माथा पच्ची से यह लाभ मिला कि उप पुलिस अधीक्षक ने मुझे अपने कार्यालय पर बुलवाया और दूसरे दिन डाक बंगले पर बस्ती के बाबत होने वाली मीटिंग की सूचना दिया तथा मुझे आमत्रित भी किया. 
मामले में आया नया मोड़ उत्साहवर्धक था. निराशा पर आशा की परत चढ़ने जैसा. पर मैं सावधान था, बस्ती गिराए जाने की कार्यवाही कभी भी की जा सकती है सो मैने उस बस्ती में एक फोटोग्राफर को लगा रखा था कि जब भी बुलडोजर चलने लगे उसे कैमरे में कैद करते जाना. मेरे पास एक पक्का प्रमाण हो जाएगा बस्ती गिराने का. स्थानीय गुप्तचरों द्वारा हुई इस जानकारी के कारण प्रशासन शिथिल हो चुका था, उसके सामने कई तरह के खतरे दिख रहे थे, कस्बे के लोग भी बागी हो सकते हंै .एक एक दिन गुजरता जा रहा था, जो बस्ती वालों के लिए अच्छा था.
मैं निधांरित समय पर उप पुलिस अधीक्षक के बंगले पर हाजिर था और मेरे साथ बस्ती वालों की भीड़ भी थी. भीड़ अपने मुकद्दर का फैसला जानने के लिए आतुर थी.
उप पुलिस अधीक्षक के मीटिंग हाल में उप पुलिस अधीक्षक के अलावा परगनाधिकारी तथा ए.डी.एम. प्रशासन भी मौजूद थे. वहां पर थाने का स्टाफ भी हाजिर था जो मजे ले कर होने वाली कार्यवाही की जानकारी जुटाने के लिए उपस्थित था. जैसे ही मैं हाल में घुसा ए.डी.एम. मुझे घूरने 
लगे, मैं किसी कुर्सी पर बैठ भी नहीं पाया था कि वे मुझ पर बरस पड़े. उनकी यह हरकत शिष्टता तथा पंचायत के नियमों से विपरीत थी और शराफत से बाहर तो थी ही. मुझे ही नहीं वहां पर उपस्थित सभी अधिकारियों को भी उनका ब्यवहार बुरा लगा. पर किसी ने कुछ नहीं कहा.. सभी गुपचुप बैठे हुए थे. सभी की चुप्पी देख कर उन्होंने मुझे धमकाना शुरू किया...
‘नेता बनते हा,े तुम्हारी नेतागिरी तुम्हारी ... में घुसेड़ दूंगा, का कर लेंगे तुम्हारे कामरेड एम.पी. या यहां का जो सांसद है वही. जानते हो न इमरजेनसी का जमाना है, हाथ पैर तुड़वा कर जेल में डलवा दूंगा, जमानत लेने वाला भी कोई नहीं मिलेगा. जूते इतने पड़ेंगे कि सर गंजा हो जाएगा. जाओ भागो यहां से, कल सुबह तक तुम्हारी बस्ती गिरा दी जाएगी और उस पर बबूल बो दिया जाएगा.’
अब क्या बताऊं उनकी बकवास बरदास्त से बाहर थी फिर भी मैंने उनसे निवेदन किया...
‘श्री मान् जी बबूल का फल आदमियों की लाश सिझाने के काम में आता है, इसलिए इसकी अमेरिका में बहुत अधिक डिमांड है. अगर संभव हो तो उसके सप्लाई का ठेका आप मुझे देने की कृपा कीजिएगा.’. 
मेरी बातें उन्हंे चुभ गई और वे चिल्ला उठे.. ‘गेट आउट’
मैं तत्काल गेट आउट हो गया. इस घटना से केवल मैं तथा बस्ती वाले ही दुखी नहीं थे वरन् अधिकारी भी दुखी थे, जो वहां हाजिर थे. हम बस्ती वाले मातम में तो थे ही, पर भूख कहां रूकती है सो मैं बाजार के एक होटल में खाना खा रहा था कि ए.डी.एम. की जीप होटल के सामने आ कर रूक गई, उसे देख का मैं चैंक गया... मामला क्या है? पर जीप में से पहचाने जाने वाले चेहरों को उतरता देख कर मुझे संतोष हुआ, ये तो अपने लोग हैं, कोई डर की बात नहीं है. उतरने वालों में से एक आदमी ने मुझे संदेश दिया कि ए.डी.एम. साहब ने मुझे तत्काल अपने बंगले पर बुलाया है. पांच घंटे पूर्व मैंने ए.डी.एम. साहब को देखा था. उनका आतताई चेहरा मेरी आंखों में घूम कर चुभने लगा. मैंने लाख प्रयास के बाद भी मैं ए.डी.एम. के यहां जाने से इनकार कर दिया.
खाना खा चुकने के बाद भी जीप से आये लोग ए.डी.एम. साहब से मुलाकात के लिए मुझसे आग्रह करते रहे तो मेरे मन में जनहित का विचार आया.. हो सकता है बात बन जाए, कभी कभी बिगड़ी बातें भी बन जाया करती हैं. रास्ता निकलने की लालच का अनुमान कर, खुद के भावों को रोक मैं जीप में बैठ गया. रात आठ बजे का समय और सर्दी के मौसम का आलम फिर भी मेरी हाकिम के पास तलबी का समाचार, बस्ती वालों को मिल गया, वे लोग भी ए.डी.एम. कार्यालय की तरफ भाग निकले. पहले की मीटिंग के बारे में उन्हें पता ही था., मैं ए.डी.एम. के आवास पर पहुंच तो 
गया पर उन्होंने कोई नोटिस नहीं लिया, मुझे अजीब लगा, हो क्या रहा है? उनके सामने खड़े खड़े ही मैंने उस कागज को पढ़ने की कोशिश किया तो मेरा माथा ठनका, वे मेरी गिरफ्तारी का वारंट तैयार कर रहे थे.
आने वाले हालात का मुकाबिला करने के लिए मैंने खुद को तैयार किया जो होगा देखा जाएगा. तब तक ए.डी.एम. साहब ने मुझे बैठने के लिए भी नहीं कहा फिर क्या था, मैंने झटके से कुर्सी खींची और उस पर धम्म से बैठ गया और सिगरेट जला लिया. मार का बदला मार वाले तर्ज पर. मैंने सिगरेट की घुआ का गोल छल्ला उड़ाया ही था कि उन्होंने टेढ़ी निगाह से मेरी ओर देखा एकबएक उनका दाहिना हाथ रूक गया, लिखना बन्द हो गया. थोड़ी देर बाद जब वे लिखने से खाली हुए तो कड़क आवाज में बोले
‘जनाब अभी तक आपका दिमाग ठीक नहीं हुआ’
‘मेरा उŸार था, श्रीमान् जी मेरा दिमाग न तो पहले खराब था और नही अभी खराब है, आप अपने दिमागी हालत के बारे में बताएं, ठीक काम कर रहा है कि नहीं.’
अभी हमारी बात खतम भी नहीं हो पाई थी कि वे गुरर्राते हुए बोले...
‘घबराओ नहीं अभी सारा कल बल निकल जाएगा’
मुझे उनकी बात बहुत बुरी लगी और महसूस हुआ कि इस अधिकारी ने बस्ती उजाड़े जाने वाले मामले को ब्यक्तिगत मामला बना लिया है. मेरे मुह से अचानक निकला...
‘जो करना हो कर लीजिए साहब! मैं तो आपके सामने हाजिर हूं ही’
मेरा इतना कहना था कि उनका दांया हाथ मेरे गले पर आ पहुंचा और उन्होंने मेरा कालर पकड़ कर जोरदार झटका दिया, मैं गिरते गिरते बचा पर संभल गया. मेरी गर्दन पर उनकी पकड़ का दबाव बढ़ता जा रहा था. मेरे सामने सेना का रिटायर्ड कैप्टन, मजबूत कद काठी अनुशासन के नाम पर उदंड, ऐसा मैं कभी सोच ही नहीं सकता था कि एक जिम्मेवार सैनिक इतना उदंड हो सकता है. 
मैं आगे के परिणाम के बारे में जानता था, मुझे अनुमान था कि इमरजेन्सी में क्या क्या हो सकता है. मेरा दम घुटने लगा, मैंने उनका दांयां हाथ छुड़ाने की कोशिश किया पर सब बेकार, किसी तरह मैंने खुद को संभाला और तेजी से छटपटाया तभी सामने वाली कुर्सी से वे जा टकराए और धड़ाम से फर्श पर गिर गये. मैं उनकी पकड़ से छूट चुका था और उस अनहोनी का गवाह था. मैंने देखा कि उनके माथे से खून निकल रहा है. मुझे घबराहट हुई, अब तो जेल जाना ही होगा. गनीमत थी कि वहां उनके कारकून नहीं थे अगर होते तो शायद मैं भाग भी नहीं पाता. किसी तरह से वहां से भागा यह सोचता हुआ कि भाड़ में जाए बस्ती, पहले अपनी जान बचाओ. मैं इतना आदर्शवादी भी नहीं था कि वहीं खड़ा रहता तथा पुलिस को गिफ्तारी और बयान देता, पुलिस मेरी बात मानती भी तो नहीं.
वहां से भागते समय मुझे लगा कि कुछ गलत हो रहा है सो मैं फिर उनके आफिस में गया और उन्हें जमीन पर से उठा कर सामने पड़े बेड पर लिटा दिया. मैने देखा कि उनकी सांसें चल रही हैं और वे ठीक हैं. पास ही में पानी रखा हुआ था, पानी ले कर मैंने उनका मुंह धोया, माथे पर पसरा खून धोया और जब वे होश में आ गये फिर मैं वहां से भाग निकला. 
मुझे भागता हुआ देख कर बस्ती के जो लोग वहां थे वे भी भाग खड़े हुए. मैं इस अप्रत्याशित घटना से काफी डर गया था, भागा भागा अपने मित्र वकील के पास पहुंचा. उन्हें सारा हाल बताया तो वे घबरा गये.. 
वकील साहब अचानक उठे और एक डन्डा लेकर मुझे पीटने लगे, जब तक मैं समझ पाता कि हो क्या रहा है तब तक कई डन्डे मेरी पीठ पर काले निशान बना चुके थे. फिर मुझे वकील साहब एक सरकारी डाक्टर के पास ले गये और मेरा मेडिकल कराए. मेडिकल हो जाने के बाद वकील साहब ने मुझे समझाया कि ऐसा करना जरूरी था. अब तुम्हारा मेडिकल हो चुका है अगर वह अधिकारी तुम पर मुकदमा करता भी है तो तुमको बचाया जा सकता है. मेरी बुद्धि में बात घुसी कि तभी तो मेरा मित्र धुआंधार मुझे पीटे जा रहा था, यानि वह मुझे नहीं एकतरफा कानून को पीट रहा था. 
पर मुकदमा वगैरह कुछ नहीं हुआ, किसी की ओर से मुकदमा दाखिल नहीं कराया गया. इस घटना के दस पन्द्रह दिन बाद ही इमरजेन्सी भी उठा ली गई और वह अधिकारी भी कहीं ट्रान्सफर कर दिया गया. बस्ती आज भी जस तस के वैसे ही पड़ी हुई है. कभी जब मैं उस मेडिकल रिपोर्ट को देखता हूं तब कांप जाता हूं और सोचता हूं इस लोकतंत्र में भी अगर अधिकारी अपने पर आ जांए तो क्या क्या कर सकते हंै. मार पीट कतल कुछ भी. उन्हें पशु बनने में देर नहीं.

                                                                              

                                           तुम जलाओगे ये गुलशन हमें मालूम न था,
                                            तुम हो तालीम के  दुश्मन हमें मालूम न था.
                                            ये तबाही,  ये मुसीबत, ये  सितम की आंधी,
                                            तुम हो  बैठे पसेचिल्मन, हमें मालूम  न था
                                                                  -----
                                       मुल्क अपना, लोग अपने, अपनी  ये सरकार है,
                                      एक  कुरसी  से  उठा  तो  दूसरा  तैयार  है.
                                      कौन   कहता  है  बैलेट  से सरकार  गई बदल,
                                      नाग सिंह की जीत है तो सांप सिंह की हार है.
                                                                            -----


                                        ज़रा सोचिए तो...

                                      
गये थे नमाज़ बख़्शवाने रोज़ा गले लग गया. हिन्डाल्को प्रगति शील सभा रेणूकूट के कार्यालय में आ कर बैठा ही था कि पुलिस की भारी भीड़ रायफलें खनखनाती हुई पूरे दफ्तर को घेर कर खड़ी हो गई. बिना कसूर ददुआ जैसे अपराधी के समान दफ्तर की घेरेबन्दी देख कर मुझे ताव आ गया, मगर मेरे बड़े नेता बिजली कर्मचारी संघ के प्रान्तीय अध्यक्ष उस समय वहीं मौजूद थे, इस लिए अपना गुस्सा दबाना ही मुनासिब था और मैंने गुस्से को दबाया भी. मैने देखा कि अध्यक्ष महोदय आराम से बैठे हुए सुर्ती ठोंक रहे थे. उनको ठंडा देख कर वहां मेरे सहित उपस्थित सारे लोग भी ठंडी हवा पीने लगे. बहुत आराम से पुलिस के जवान हमें गाय गोरू की तरह हांकते हुए स्थानीय चैकी तक ले गये.
चैकी पर हमलोगों के लिए चाय पानी का अच्छा इन्तजाम किया गया था. मगर जो बाड़ा बनाया गया था उससे बाहर निकलने की हमलोगों को अनुमति नहीं थी. एक के बाद एक हमारे साथी चैकी पर आते रहे परिणाम स्वरूप शाम तक काफी भीड़ वहां इकठ्ठा हो गई. इस भीड़ में मेरे मित्र चैरसिया साहब और सिंह साहब भी थे.
दिन भर तो हसते हसते बीत गया मगर शाम होते ही स्थानीय प्रशासन के सामने समस्या आ गई कि हमलोगों जैसे नामाकूल लोगों का क्या किया जाये, इनके कागजी कफन दफन का क्या तरीका निकाला जाये. हमलोगों को रेणूकूट में रखना खतरे से खाली नहीं था. मीरजापुर जेल भेजने के लिए साधन नहीं था( उस समय का सोनभद्र यातायात के मामले में काफी पिछड़ा था)  
और हमलोगों को रेणूकूट में छोड़ दिया जाता तो वहां चल रही स्ट्राइक को बल मिल जाता. जो प्रशासन को किसी भी हाल में गवारा नहीं था. ऐसी स्थिति में प्रशासन ने हमलोगों को चोपन थाना भेजने का निर्णय लिया. रेणूकूट चैकी के सामने एक ट्रक लग गई. हमलोगों को हंका कर वहां तक ले जाने के लिए पुलिस वालों ने एक मजबूत घेरा बनाया, हमलोगों की गिनती आरंभ हुई जो एक दो से शुरू हो कर पैतालीस पर जा कर रूक गई. इस तरह हमलोग कुल पैतालीस थे मगर गिनती में से उन लोगों को नहीं घटाया जा सका जो ट्रक के आगे से उतरते जा रहे थे. जब हमलोग चोपन थाना पहुंचे उस समय हमलोगों की कुल तादात महज सोलह थी. इसके पहले ही पैतालीस लोगों की गिरफ्तारी का समाचार पुलिस हेडक्वार्टर भेज दिया गया था. आरोप लगाया गया था कि गिरफ्तार शुदा सारे लोग रेणूकूट की स्ट्राइक को प्रात्साहित करते और भड़काते हुए पाये गये. समाचार सुनते ही पुलिस कप्तान घबरा उठे और सारा काम धाम छोड़ कर रेणूकूट आ पहुंचे. पिपरी थानाध्यक्ष को डाट डपट कर वे सीधे चोपन थाना 
आ गये. गिरफ्तार लोगों को अपने सामने पेश करने का आदेश दिए. थानाध्यक्ष चोपन को तो पसीना आने लगा, उनके थाने में कुल सोलह लोग ही थे अब वे पूरे पैतालीस आदमी कप्तान साहब के सामने कैसे पेश करते. वे कांपने लगे. कोई उपाय न देख कर वे मेरे पास आये बोले...
‘भाई साहब! आप कोई उपाय करें,’ मैं भी क्या उपाय करता? मैं चुप था तो चुप था’ फिर मुझे कप्तान साहब के सामने पेश किया गया उन्हांेने सख्ती के साथ मुझसे पूछा, बाकी आदमी कहां चले गये?’
‘साहब! वे चले नहीं गये बल्कि गरमी के कारण ट्रक में ही सूख गये. हुआ यह साहब कि थानेदार पिपरी साहब उस समय थोड़ा चढ़ाए हुए थे उसकी गरमी इतनी थी कि गिनती को कौन कहे आदमी तक सूख गये. उन्हें सूखना ही था. हुआ यह कि लोगों को ट्रक में पीछे से घुसेड़ा जाता वे ट्रक पर चढ़ते पर आगे से उतरते जाते. केवल सोलह आदमी ही तो रेणूकूट से यहां लाए गये. इसमें किसी की कोई गलती नहीं है साहब! केवल दारू साहब का कसूर है. थे सोलह और गिन लिया पैंतालीस’
कप्तान साहब के थाने पर आने के पहले हमलोग विशेष अतिथि की तरह आनन्द ले रहे थे, लेकिन भगोड़े साथियों के बारे में सुनकर थानेदार चोपन पूरा अकड़ू खां बन गये. उन्हें भी तो कप्तान साहब ने काफी भला बुरा कहा था सो उन्हें तो गरम होना ही था आखिर वे कप्तान साहब की डांट को कैसे ठंडा करते.
थोड़ी देर बाद थाने के मुंशी ने हमलोगों का नाम और पता पूछना शुरू किया और कागज पर लिखने लगा. हमलोग भी तो घाट घाट का पानी पिए हुए थे सो हम सभी ने अपना नाम पता सारा के सारा गलत बताया. अब मुंशी को क्या पता कि क्या सच है क्या गलत है.
हमलोग अभी तक तो पुलिस का मुकाबिला कर रहे थे पर रात होते ही जब हमें हवालात में ठूंसा जाएगा तब खटमलों और हवालात की बदबू से भी लड़ना होगा. हवालत में कम्बल बिछा कर जब फकीरी लेनी ही है तो जितना संभव हो सके पुलिस वालों को परेशान करना चाहिए. पुलिस वालों को परेशान करने के लिए हमलोगों ने निश्चित किया कि पुलिस वाले चाहे जो पूछें, हमसे जो भी जानना चाहें, हम नहीं बोलेंगे, एक तरह से चुप रहेंगे. 
दीवान जी हमलोगों से बार बार कई तरह के सवाल पूछते रहे पर हमलोगों ने उनके एक सवाल का भी जबाब नहीं दिया. उस समय केवल मुझे ही आजादी दी गई थी कि मैं बोल सकता था पर मैं भी क्या बताता. मुझे तो किसी का नाम पता मालूम ही नहीं था. चोपन पुलिस हमारे मोन ब्रत से हार गई. चोपन थाने वालों को पता था कि मैं रवटर््सगंज का हूं सो वहां के छोटे दारोगा को बुलवाया गया और उनसे प्रयास करवाया गया कि हमलोग अपना अपना नाम पता बता दें. रावटर््सगंज के छोटे दारोगा इतना परेशान हो गये कि उन्होंने चोपन के दारोगा को गाली देना शुरू कर दिया... ‘साला 
बिला वजह मुझे बुलवा लिया, यह तुम्हारा काम है अपने स्तर से निपटाओ’
पुलिस वाले इतना परेशान हो गये कि उन्हें अपने उच्चाधिकारियों को खबर देनी पड़ी कि सारे पकड़े गए लोगों के नाम व पता अज्ञात हैं. इतना सब करने में रात हो गई. हमलोगों को हवालात में डाल दिया गया. हमलोगों ने फर्श पर कम्बल बिछाया, हवालात से पेशाब की बदबू आ रही थी जो बर्दाश्त से बाहर थी. मुशी जी से इसकी शिकायत की गई और निवेदन भी कि आज के लिए किसी दूसरे कमरे को बैरक बना दीजिए पर मुंशी जी भी तो पुलिसिया खेलों के खिलाड़ी थे, वे क्यों पसीजते.. गरज उठे...
‘यह हवालात है कोई गेस्ट हाउस नहीं, मंत्री बन कर आओगे तो हमी लोग गेस्ट हाउस का भी प्रबंध करेंगे.’ गोया मुंशी ने हमलोगों के निवेदन पर ध्यान नहीं दिया. हवालात से बाहर आने की कई तरकीबों में से हमलोगों ने एक का चुनाव किया... हम सभी लोग भूख भूख चिल्लाने लगे. हवालात में इतनी चिल्लाहट पसरी कि मुशी जी हाजिर हो गये ...
‘का बात है काहे चिल्ला रहे हो...’
फिर वही आवाज ‘भूख भूख भूख.. खाना खिलाओ, खाना खिलाओ.’ मुशी हसने लगा, यहां खाना धरा है का कि खिला दूं, खाना नहीं मिलेगा. दारोगा जी आएंगे तो खिलाएंगे.
हमलोगों ने मुंशी को समझाया.. आप लोग भी आज हमलोगों के साथ खाना खाएं, रुपया हमलोग देंगे.. फिर क्या था बात बन गई.
पुलिस और पी.ए.सी. के जवान हंकाते हुए हमें चोपन बैरियर के एक होटल पर ले गये. हमलोगों का भूख लगी थी. दिन भर बिना चाय पानी के बीत चुका था. सो हम सभी लोग खाने पर टूट पड़े. रोटी, चावल, फ्राई दाल, गोश्त मछली भी, क्या नहीं था खाने में, चटनी सलाद और अचार तो था ही. पुलिस और पी.ए.सी. वाले हम हमलोगों के साथ छक कर खाए, उन्हें क्या पता था कि आगे क्या होने वाला है? खाने का कुल बिल चार सौ पचहŸार रुपयों का होटल वाले ने मुझे थमाया जिसे मैंने मुंशी जी को देते हुए होटल वाले से कहा कि ‘इसे दारोगा जी के नाम चढ़ा देना,’ होटल वाला मेरा मुंह देखने लगा...’
‘मेरा मुंह क्या देख रहे हो दारोगा जी ईमानदार आदमी हैं, तुम्हारा एक एक पाई दे देंगे, घबराओ नहीं,’ तभी भागा भागा थाने से एक चैकी दार आ गया, कहने लगा कप्तान साहब वायरलेस पर हैं और गिरफ्तार लोगों के नाम पूछ रहे हैं. इस सूचना के बाद हम सभी लोगों का हंकाते हुए मुंशी जी थाने ले आये और हवालात में ठूंस दिए. हमलोग अपने अपने कम्बलों पर पसर भी नहीं पाए थे कि थाने के बाहर से ‘इन्कलाब, जिन्दाबाद पुलिस प्रशासन मुर्दा बाद, जो हमसे टकाराएगा चूर चूर हो जाएगा’ के नारे सुनाई पड़नेे लगे... धीरे धीरे नारों की आवाज पास आने लगी, साफ पता चला कि यह आवाज तो कामरेड आर. के. की है जो बिजली कर्मचारी संघ 
ओबरा के अध्यक्ष हैं. वे दो तीन सौ पारटी कार्यकर्ताओं के साथ आग बबूला हो कर थाने का घेराव करने चले आये थे. वे लोग थाने में घुसते ही बिना किसी पूर्व सूचना के पुलिस वालों पर पिल पड़े, भीड़ ऐसे समय में क्या कर सकती है इसका अन्दाजा किसे नहीं, थाने में अफरा तफरी मच गई, पुलिस वाले अपनी जान बचाने के लिए थाने की खपड़ैल पर चढ़ गये, वहीं से टुकुर टुकुर तमाशा देखने लगे. ओबरा के कार्यकर्ताओं की भीड़ हमलोगों को थाने से बाहर निकालने के प्रयास में थी ऐसा करने के लिए वे कुछ भी कर सकते थे पर दारोगा और हमारी पारटी के एक कामरेड चैरसिया की समझाने बुझाने के बाद भीड़ शान्त हो गई और एक बहुत बड़ी घटना धटने से रूक गई. उसके बाद तो कानूनन जितनी सुविधा हमलोगों का दी जा सकती थी उतनी दी गई. तय किया गया कि दूसरे दिन चाय नाश्ता कराने के बाद ही हमलोगों को जिला जेल के लिए रवाना किया जाएगा. 
चोपन थाने में रात आराम से बीती शायद ऐसा नहीं होता अगर ओबरा के मजदूर साथी थाने पर न आ धमकते. पर सुबह होते ही दो साथी और गिनती में कम हो गये. इसकी जानकारी होते ही चोपन के थानेदार के चेहरे पर हवाई उड़ने लगी, ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे, बेचारे के समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह जान बचाई जा सकती है. वे कभी हमलोगों पर आंखें तरेरते तो कभी सिपाहीयों को भला बुरा कहते और खुद को हल्का करते. थानेदार के ऊपर बौखलाहट सवार थी, उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. ऐसी हालत से निपटने के लिए थानेदार ने बहुत दूर की सोचा शायद यह पुलिस का पुराना तरीका था. विपŸिा से पार पाने का. वे थाने से बाहर निकले तो देखा कि रास्ते की थकान मिटाने के लिए दो आदिवासी सोन नदी के किनारे आराम से बैठ कर दाना पानी कर रहे हैं. थानेदार की आंखों में बिजली कौधी. वे अपने आफिस में घुसे फिर तुरंत निकल भी आये, करीब करीब दौड़ते हुए आदिवासियों के पास जा पहुंचे, वहां पहुंचते ही उनकी पिटाई करने लगे, कोई बात चीत नहीं, कोई कारण नहीे मार पीट का. वे बेचारे अपना कसूर समझ पाते कि दारेगा ने अपनी जेब से गांजे की दो पुडि़या निकाला और आदिवासियों को गरियाने लगे..
‘साले गांजा बेचते हो चलो मरो, जाओ जेल किसी भी हाल में तुमलोगों को नहीं छोड़ूगा’
आदिवासियों को भी थानेदार ने हमलोगों की तरह हवालात में ठंूस दिया और उनके ऊपर गांजा का ब्यापारी होने का आरोप भी लगा दिया. अब पहले से गिरफ्तार लोगों की तादात पूरी हो चुकी थी. दारोगा आराम से खुली हवा पीने लगा. उसे तो तादात पूरी करनी ही थी.
आठ बजे दिन के आस पास थाने के सामने एक ट्रक आ कर लग गया. थानेदार ने हमलोगों को हुकुम दिया कि आप लोग ट्रक पर लदो और मीरजापुर जेल चले जाओ, आप लोगों को जेल ही संभाल सकती है थाना 
नहीं. अब यहां का काम खतम. पर थानेदार की बात कौन मानने वाला था, हमलोगों ने ट्रक पर लदने से इनकार कर दिया..
मीरजापुर जेल भेजना है तो कोई बस मंगवाओ, वह भी ठीक ठाक, खटारा नहीं फिर हमलोग उस पर लदंेगे नहीं तो नहीं. हमलोगों में से कुछ फुसफसाहटें निकली... ‘साला हमलोगों को गिट्टी और बालू समझता है.’..
थानेदार जानता था कि हमलोगों से टकराना आसान नहीं, जाने कौन सा बवाल हो जाए फिर कहीं ओबरा वाले आ न जांए, कल की तरह, हो सकता है कि वे आ भी रहे हो.
दारोगा हलकान था, उस समय अच्छी बसों की सोनभद्र में कमी थी, खबर रेणूकूट तक पहुंची फिर वहां के कारखाने से एक नई मिनी बस हमलोगों को मीरजापुर ले जाने के लिए चोपन थाने पर आई. हमलोगों का लाद कर वह बस मीरजापुर के लिए करीब दस बजे के आस पास रवाना हो गई.रावटर््सगंज पहुंचने के बाद बस के ड्राइबर ने पान खाने के लिए बस रोक दिया. मौका अच्छा देख कर मैं बस से नीचे उतर गया और अपने एक परिचित के चालू होटल में जा कर बैठ गया. मेरी गिरफ्तारी की सूचना रावटर््सगंज में पहले ही पहुंच चुकी थी. देखते देखते ही होटल के सामने भीड़ इकठ्ठा हो गई. वहां चाय नाश्ता चला फिर तय किया गया कि खाना खा कर ही आगे चला जाएगा, बीच में खाना कहीं नहीं मिलेगा. हमलोगों के खाने के साथ स्थानीय लोग भी शामिल हो गये और होटल का बिल छह सौ के पार चला गया जिसे देख कर हमलोगों की देख रेख करने के लिए आया दारोगा घबड़ा उठा.. ‘बाप रे बाप इतना बिल..’, वे हमलोगों को वही छोड़कर रावटर््सगंज थाने की तरफ भागा, वहां से एक सिपाही ले कर आया और उसने अपने तरीके से बिल का निपटान करवाया.
आगे बढ़ने पर यही स्थिति मडिहान पहुचने पर आन खड़ी हुई फिर तो दारोगा गिड़गिड़ाने लगा... मुझे भी उसकी दयनीयता पर दया आई और मैंने साथियों को दुहराव करने से रोक दिया. मडिहान में जो कुछ भी हमलोगों ने खाया पिया उसका भुगतान हमलोगों ने ही किया. हमलोगों की निगरानी करने के लिए साथ चल रहा दारोगा खुश खुश था. मीरजापुर पहुंचने पर हमलोगों को जेल में दाखिल करा दिया गया. जेल में दाखिल होते समय मैंने सुरक्षा में लगे दारोगा से माफी मांगा...
‘भाई साहब क्षमा करें, हमलोगों ने जो कुछ भी किया वह हमारे ब्यवहार और आचरण का हिस्सा नहीं है पर आप लोगों ने इन दो निरपराध आदिवासियों को जेल में भेज कर क्या किया? उसे क्या कहा जाएगा? जरा साचिए तो....
                                                                       

                                               प्रतिज्ञा


‘क, क, कमल तुम आ गये, कई दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी’ कमल को देखते ही श्यामली भावुक हो उठी..
‘तुमको कैसे पता था कि मैं यहां आने वाला हूं, मैं तो कहीं और जाने वाला था, बस यूं समझ लो कि भटक कर यहां चला आया.’ कमल ने श्यामली को बताया
श्यामली थोड़ी देर तक अपनी सूनी सूनी आंखों से शून्य में निहारते हुई कुछ सोचने का प्रयास कर रही थी, कहना तो बहुत कुछ चाहती थी मगर उसकी जुबान तालू से चिपकी हुई थी. उसके चेहरे पर बनने वाली लकीरें गवाही दे रही थीं कि उसके लिए अपने ज़ज़्बात पर काबू पाना कठिन है. अपनी पीड़ा को अपने भीतर दबाने के लिए श्यामली ने अपने होठों को दांतों के बीच रख कर जोर से दबाया, पर होठों की पीड़ा उसके दिल में छिपे दर्द के दबाव में दम तोड़ बैठी. उसके भीतर छिपा तूफान, सब्र का बांध तोड़ने के लिए बेकरार था लेकिन कमरे में चुपचाप बैठी गौरैया श्यामली को बल प्रदान कर रही थी कि जिया जा सकता है जीवन.
प्रश्न का उŸार न पा कर कमल ने पुनः अपना सवाल दुहराया. 
‘श्यामली.. तुमने मेरे प्रश्न का उŸार नहीं दिया, ‘तुमको कैसे पता चला कि मैं यहां आने वाला हूं, तुम मेरी प्रतीक्षा क्यों कर रही थी? मैं तो किसी वीरने में जाने के लिए निकला था मगर न जाने कौन सी ताकत मुझे यहां तक खींच लाई, मुझे कुछ नहीं पता.’
श्यामली अभी तक अपना चेहरा कमल की तरफ फेरे अपने होठों को दांतों से दबाए हुए थी. अगर होठों से खून निकलता तो कमल के ऊपर जा छिटकता पर ऐसा नहीं हुआ.
तीसरी बार भी जब कमल को अपने प्रश्न का उŸार नहीं मिला तो उसने अपने दोनों हथेलियों के बीच श्यामली का चेहरा पकड़ कर और अधिक भावुक हो कर पूछा...
श्यामली बता तो सही, तुम्हें ‘कैसे पता चला कि...’ इसके आगे कमल की जुबान से आवाज नहीं निकली. इसका उŸार वह श्यामली की आंखों में तलाशने लगा.
श्यामली की आंखों में कुछ भी तो नहीं था, न आशा न निराशा, न कोई उमंग, कमल को अपने पास पाकर भी उसके दिल से उत्साह का लावा नहीं फूटा.
कमल बार बार श्यामली से एक ही सवाल पूछ रहा था ‘तुम्हें कैसे पता चला कि मैं तुम्हारे पास आ रहा हूं.’ थोड़ा संयमित होने के बाद श्यामली की जुबान खुली तो ऐसा मालूम हुआ जैसे बहुत दूर से किसी कूंए से 
आवाज आ रही हो.
‘हां मुझे मालूम था कि तुम मेरे पास आ रहे हो और कहां जा सकते हो, लेकिन इसका कारण बता पाना मेरे वश का नहीं. अगर मैं तुम्हें समझाना चाहूं तो भी नहीं समझा सकती.
कमल भी कुछ नहीं बोल पाया, दोनों खामोश थे. दोनों जाने क्या क्या सोचने लगे थे. नदी के दोनों किनारे एक साथ सफर कर रहे थे मगर अलग अलग. श्यामली ने खामोशी तोड़ा...
‘कल तुमने यहां तक आने में देरी क्यों लगा दी? मैं तो तुम्हारा एक सप्ताह से इन्तजार कर रही थी..’
‘मैं कैसे चला आता तुम्हारे पास, मुझे तो खुद भी मंजिल का पता नहीं.’
‘अब तो तुम्हें अपनी मंजिल मिल गई’ श्यामल ने कमल से बातें करते हुए उसके चेहरे को देखा, एक अजीब सी निगाह से.
‘पता नहीं’ कमल ने बताया 
‘क्यों?’ पूछा श्यामली ने
भटकने वालों के लिए मंजिल का कोई प्रश्न ही नहीं होता. अगर भटकने वाले को मंजिल मिल जाए तो भटकना ही अपना अर्थ खो देगा. कमल ने श्यामली से तर्क दिया
‘तो फिर तुम कैसे आ गये मेरे पास, मेरे करीब’ पूछा श्यामली ने.
‘एक ही सवाल बार बार क्यों पूछ रही हो श्यामली!, तुम्हें समझना चाहिए कि भटकने वाले से अगर कोई पूछे कि तुम यहां कैसे आ गये तो वह क्या बताएगा, वह तो भटक रहा है, कहीं से कहीं जा सकता है. कमल ने श्यामली को बताया.
कमल का उŸार सुनकर श्यामली एकदम खामोश हो गई, उसने खुद को लड़खड़ाता हुआ पाया, उसकी आंखों में आंसू आ गये, उसने आंखें उठा कर कमल की तरफ देखा तो पाया कि वह भी उसे ही देख रहा है, शायद वह श्यामली को समझने का प्रयास कर रहा था. दोनों ही अपनी भावनाओं के बनाए बांध की सुरक्षा में लगे थे. आखिर कब तक? अचानक वे दोनों एक दूसरे से लिपट गये और खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए अलग भी हो गये.. अचानक आया तूफान थम चुका था और बाहर उछल कूद कर रही गौरैया भी फुरर्र हो चुकी थी.
श्यामली ने धीरे से पूछा... कमल अब आगे का क्या परोग्राम है?
‘क्या बता सकता हूं मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा’ किधर भटकूंगा? बिना पतवार की नांव की तरह किस घाट लगूंगा, मुझे क्या पता’ कमल ने बताया श्यामली को.
‘कटी पतंग की तरह जीवन जीने का कोई मतलब नहीं, कटी पतंग को बच्चे नोच नोच कर फेंक देते हैं. इस पर भी कभी विचार किया है कि नहीं’ पूछा श्यामली ने.
‘मैंने तो कभी भी जीवन और उसके जीने के तरीके के बारे में सोचा ही नहीं’ कमल भावुक हो उठा.
‘फिर तो तुम्हें कोई खूंटा तलाशना चाहिए और उसमें खुद को बांध लेना चाहिए.’ श्यामली ने प्रतितर्क किया.
‘खूंटा भी तो कमजोर हो सकता है, समय उसे भी तोड़ सकता है.’
‘ऐसा क्यों सोचते हो हर खूंटा कमजोर नहीं होता.’
श्यामली की बातें सुन कर कमल का धीरज टूट गया...
‘बंाधा तो गया था एक खूंटे से, मां, बाप, भाई दोस्त सभी ने मिल कर मुझे बांधा था, उस खूंटे से हमेशा बंधे रहने की गारंटी भी लोगों ने दी थी, कि यह खूंटा तुम्हें नहीं छोड़ेगा पर हुआ क्या...? मेरा साथ छोड़ कर खूंटा ही मुझसे अलग हो गया? अब तो यादें ही बाकी हैं. जो मुझे कचोटती रहती हैं. अब तो कचोटें आग बन चुकी हैं. साथ देने वाले ने जो वादा किया था उसने ही उसे भुला दिया. वह मुझे अकेला छोड़ कर जाने कौन सी सजा दे कर गई है. आखिर मैं उसे कैसे अनजाने हाथों में सौंप दूं. सोच रहा हूं अब जो जीवन बचा है, उसे वीराने में गुजार दूं. सभी नातों रिश्तों से अलग, एकदम अकेले. श्यामली मैं तुमसे एक बात कहना चाहूंगा कि रास्तों में मिलने वालों से हमेशा सावधान रहना, न जाने कौन उनमें चोर उचक्का निकले, कौन गिरह कट निकले. मतलब निकल जाने के बाद वह. अपनी राह पकड़ लेगा. दुबारा धोखा खाने के बाद ज्यादा कष्ट होगा और अधिक समस्याएं पीछे पड़ जाएंगी. कांटों के बीच से अपना दामन बचा कर निकल जाना ही होशियारी है. अब तुमसे क्या बताऊं श्यामली! ‘अब मुझमें और अधिक धोखा खाने की हिम्मत नहीं है.’
कमल की भावुकता को श्यामली बहुत गंभीरता से सुन रही थी, जिस समय कमल बोलते बोलते चुप हो गया श्यामली बोली...
‘कमल तुम पढ़े लिखे समझदार आदमी हो, मैं तुम्हें क्या समझा सकती हूं न तो तुम्हें आदेश देने लायक ही हूं, तुम्हारे ऊपर कठिन समय आ गया है, ऊपरवाला ही तुम्हारी मदत कर सकता है. इस समय का मुकाबिला तुमको मर्दानगी के साथ करना होगा, बिना घबराये अपने दायित्वों का निर्वाह तो करना ही होगा. इसी में भलाई है.
श्यामली की बातें सुनते ही कमल फूट पड़ा... एक बच्चे के समान रोने लगा, 
‘तुम्हारा कहना एकदम सही है, पर डरता हूं खुद से, जीवन जीने का रास्ता बहुत ही कठिन है, तमाम तरह के इसमें घुमाव व उतार हैं, मेरे जीवन का सफर भी लम्बा है, अपने आप से जलता और कुढ़ता हूं, कोई रास्ता नजर नहीं आता. सिवाय खुद में गोते लगाने के, ऐसी हालत में कुछ समझना, देखना, जानना, कुछ बोलना नहीं चाहता. यह हालत तो उस भूखे के सरीखा है जो भूख लगने पर खाली बर्तन खड़खड़ा कर खुश होता है.
श्यामली को कमल की निराशा भरी बातें बुरी लग रही थीं उसे कमल पर 
गुस्सा आया..
‘इस तरह की सोच से क्या हासिल होने वाला है, लगता है तुम अपनी बुद्धि खो बैठे हो और खुद को समाप्त करने पर तुले हुए हो., दिख रहा है कि तुम्हारा दिल तुम्हारे दिमाग पर हावी हो गया है जबकि दिमाग को दिल पर हावी होना चाहिए.’
कमल फिर बिफर उठा, लगा चिल्लाने... ‘श्यामली मुझे ताकत दो ताकत दो एक ऐसी ताकत जिसे तुम ही मुझे दे सकती हो..’ कमल ने आपना सिर श्यामली की जांघों पर धर दिया और विलपने लगा... श्यामली का मन भर आया और उसने अपना आंचल कमल के चेहरे पर डाल दिया, कमल को लगा जैसे वह रेगिस्तान में किसी बरगद के नीचे सुस्ता रहा हो.
कमल बहकता जा रहा था पर श्यामली उसके मन को राहत पहुंचाना चाह रही थी. वह जानती थी कि सड़ा पानी या मन दोनों दिमाग को सड़ा देते हैं, बह जाये तो ही अच्छा है.
एक तूफान था जो कमल के सिर पर आया था और गुजर गया. तूफान गुजरने के बाद जिस तरह का सन्नाटा होता है उसी तरह कमल भी शान्त हो चुका था. उसके चेहरे पर अब कोई ऐसा चिन्ह नहीं था जिससे साबित होता कि कमल अभी भी नकारात्मक भावनाओं की गिरफ्त में है.
अचानक उसके चेहरे का रंग बदलने लगा, देखते देखते उसके चेहरे पर गंभीरता दुबारा छाने लगी. जिसे देख कर आदमी कांप जाता है, कहीं कमल फिर तो नही डूब रहा अपनी कल्पना में? श्यामली को शक हुआ.
‘कमल जरा तुम मेरी ओर देखो,’ उसने कमल को समझाते हुए कहा... ‘देखो कमल तुम गलत स्थान पर बिल्कुल नहीं आये हो, तुमने तो कहा था कि तुम्हें वीराने की तरफ जाना था, मेरा वजूद भी तो वीराने की तरह ही है, बारह साल गुजर चुके हैं, मेरी बगिया में भी फूल महके थे, उगे थे पर कुछ समय के लिए ही, फिर मेरे मुकद्दर पर स्याह चादर तन गई, इसके पहले कि मुझे कोई अंधेरा लील लेता उसी दौरान परछाईं की तरह तुम दिखे, मेरे दिल ने आवाज दी कि परछाई के साथ ही चलो, परछाई भी सहारा दे सकती है. इसी विश्वास के सहारे दस साल का समय गुजर गया पर टेढ़े मेढ़े रास्तों पर चलने के लिए परछाईं का करती. इतना तो था ही कि ठोकर लगने से बचाती रही और अब मैं उसी परछाईं की भीख मांगने निकली हूं तो यकीन मानो अपना घर जला कर ही रौशनी करना चाहती हूं. कमल संभव है यह सब मेरा भ्रम हो तो भी क्या अंतर पड़ता है, दस साल का सफर तो कट ही गया न. आगे जो भी होगा देख जाएगा. इस दौरान ठोकर नहीं लगी, यही कम नहीं. यह परछाईं का ही कमाल है कि मैं जलती रही, तड़पती रही पर राख बनने से बच ही गई. मेरा वजूद आज भी कायम है. कभी कभी निराशा के आलम में मैंने गलतियां भी की हैं पर आगे बढ़ती रही जिसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं, तुम सारा कुछ जानते हो, तुमने 
देखा है. मुझे यकीन था कि मेरा कोई सहारा है जो मुझे गिरने से उठा ही लेगा. कमल मैं तुम्हें रौशनी के मीनार की तरह देखा है अब जान बूझ कर उस मीनार को खुद न तोड़ो.’
‘यकीन मानो कमल हर पल तिल तिल कर जी रही हूं और जी जी कर मर रही हूं पर हर क्षण तुम मेरे साथ ही रहे. समस्याओं से जूझने की ताकत मेरे पास तुम्हारे कारण ही आई. परीक्षा की हर घड़ी में मैंने तुम्हें अपने साथ खड़े पाया, जानते हो नऽ सहारा का कोई आकार नहीं होता, वह तो एक अहसास होता है और वह मेरे साथ है
श्यामली की बातें सुनने के बाद कमल बोला...‘श्यामली तेरी सारी बातें ठीक है मगर...’
‘यह अगर मगर क्या होता है कमल! तुमने ही तो स्वाकर किया है कि तुम वीराने की तलाश में निकले हो फिर यह अगर मगर कैसा. वीराने तक तो आ ही गये हो, थोड़ा आराम करो, फिर आराम से सोचो कि आगे क्या करना है?’
‘कमल मेरी आंखों में झांक कर देखो क्या मैं तुम्हारे जीवन का सहारा नहीं बन सकती, मेरी भी हालत तो तुम्हारे जैसी ही है. चलो हम मिल कर आगे का रास्ता तय करने के बारे में सोचते हैं. अब तक तो हमलोग एक सच्चे मित्र की तरह थे. हम पर जाने किस किस तरह के आरोप भी लगे, बिना सिर पैर की बातंे हमारे जिस्म पर चस्पा की गईं पर हम कभी नहीं घबराए फिर आज क्यों तुम्हारे पांव लड़खड़ा रहे हैं? मैं समझ नहीं पा रही हूं. समझने की कोशिश करो कि क्या हम दोनों एक दूसरे का हमसफर नहीं बन सकते. मैं वादा करती हूं कि मैं तुम्हारी खुशियों में आड़े नहीं आउंगी पर गम में मैं तुम्हारे साथ सदैव रहूंगी. कम से कम तुम तो यह भूल ही जाओ कि तुम अकेले हो, मैं तुम्हारे साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए राजी हूं.
श्यामली अपने मन की सारी पीड़ा समेट लिया. उसकेे होठों पर मुस्कराहट पसर गई, प्यार से कमल के सिर को अपनी जांघों पर ले आई और उसका माथा सहलाने लगी. कमल ने अपनी आंखें बन्द कर लीं और श्यामली की बातों के बारे में गुनने लगा..फिर बोला...
‘श्यामली तुम तो जानती ही हो कि मेरे ऊपर छह बच्चों की जिम्मेवारी है और तुम भी अपने बच्चों के प्रति जिम्मेवार हो, हमलोगों की निगरानी हमारा समाज कर रहा है ऐसी स्थिति में हम दोनों कैसे विवाह कर सकते हंैं? लोग क्या कहेंगे? इसके बारे में सोचना गुनना बन्द कर दो, हमारी दुनिया पहले भी अलग थी और आगे भी रहेगी.’ श्यामली का चेहरा कसैला हो गया उसने कमल को कोसा...‘कमल तुम कैसे आदमी हो अभी तक श्यामली को नहीं समझ पाये और यह भी तो नहीं समझ पाये कि शादी से क्या होता है, शादी तो एक तरह से नाटक है पर क्या शादी से मन का मिलन भी 
होता है या खाली देह ही मिलती है. देह के अलावा भी तो बहुत कुछ होता है. शायद तुम्हें देह की भूख मिटाए बिना जीने की आदत नहीं है पर मैंने तो पूरे दस साल गुजार दिए हैं और देह को कहीं भागने नहीं दिया है. यकीन मानो कमल, बिना देह की भूख मिटाए भी जीवन जिया जा सकता है अगर साथी प्यार करने वाला हो, कदम कदम पर साथ निभाने वाला हो. क्या तुम मेरी जैसी औरत से भी कमजोर दिल के हो. अगर हिम्मत हो तो हम दोनों धरम, जाति की मान्यताओं में दखल दिए बिना ही जीवन की नाव किनारे लगा सकते हैं. ऐसा करना हमारी विवशता भी है अपने बच्चों की खातिर. अगर तुम ठीक से सोचोगे तो मैं क्या चाहती हूं इसकी साफ तस्बीर तुम्हें दिखाई देगी.’
श्यामली तुम रूको, तुम्हारी बातें तो मुझे देवता बना रही हैं जबकि ऐसा नहीं है. देह को अलग और मन को अलग रखना मेरे वश का नहीं. पर मैं कोशिश करूंगा कि जैसा तुम कह रही हो वैसा ही करूं..
कमल और श्यामली की बातें उलझाव भरी अवश्य थीं पर उनकी अपनी पृष्ठ भूमि थी जिस पर वे दोनों खड़े थे जिसे दोनों समझ भी रहे थे.
श्यामली कमल से बातें करके छत की तरफ देखने लगी जैसे छत से उसकी उलझनों का कोई रास्ता लटका हुआ हो. दोनों एक दूसरे जैसा ही महसूस रहे थे. कमल एकदम गुमसुम था श्यामली ने कमल को टोका.. ‘लगता है कमल कि तुम्हारा मुझ पर यकीन नहीं है...’ 
कमल ने तभी श्यामली का मुह अपने हाथों से बन्द कर दिया... ‘ऐसा न बोलो श्यामली, यकीन नहीं होता तो मैं कब का खाख हो चुका होता, मेरे जीने का मतलब सिर्फ और सिर्फ तुम हो. मैं अब तक इतना लुट और टूट चुका हूं कि मुझे खुद पर भी यकीन नहीं रह गया है. मैं सोच भी नहीं सकता कि तुम भी मुझसे छिन जाओ फिर मैं किस तरह आगे जी सकूंगा.
जाने क्या हुआ कि श्यामली कमरे से बाहर निकल गई और जब वापस आई तो उसके चेहरे पर अजीब रंग पसरा हुआ था. वह लाल साड़ी में लिपटी हुई थी और बहुत अधिक सुन्दर लग रही थी. उसके हाथ में एक डिबिया थी, उसने उसे कमल की तरफ बढ़ाया और ...
‘देखो कमल यह सिन्दूर है, इससे तुम मेरी मांग भर दो, मैं केवल तुम्हारी हूं और तुम्हारी ही रहूंगी. मैं जीवन भर इस सिन्दूर की लाज निभाउंगी इसका वादा करती हूं, हमलोग देह से मिलें न मिलें पर हमारा मन तो मिला हुआ है.’
श्यामली का यह रूप देख कर कमल भीतर से कांप उठा... ‘श्यामली तुम मेरा इम्तहान ले रही हो. मैं इसमें पास नहीं हो सकता.’
पर श्यामली तो चुप थी उसे जो करना था कर चुकी थी. मैं श्यामली का ऐसा रूप देख कर परेशान था आखिर मैं उसकी मांग में सिन्दूर कैसे भर सकता था वह भी केवल दिखावा जबकि बात कुछ और थी. मुझे लगा कि 
श्यामली मुझसे कई गुना तकतवर है और मैं उसके मुकाबिले में एक डरपोक आदमी हूं, मेरे पास साहस नहीं कि मैं उसके साथ के रिश्ते को सामाजिक रूप दे सकूं. मैंने माथा पकड़ लिया. एक बार फिर मैंने खुद को दुनिया का सबसे कमजोर आदमी महसूस किया जिसके कारण मैं शुरू से ही परेशान परेशान था. मुझे आज भी ख्याल है श्यामली ने अंत में कहा था..
‘कमल जब कभी तुम्हारी देह की भूख तुम्हारे नियंत्रण से बाहर हो जाए मेरे पास चले आना मैं अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दूंगी, भूल जाऊंगी कि मेरी मांग में सिन्दूर है कि नहीं.’ किसी अनजान डर के कारण पर मैं श्यामली के पास कभी न जा पाया. 
                                                                     

                                           क्यों आरती मन्दिर में हो, मस्जि़द में क्यों अज़ान,
                                           नाराज़  हैं   खु़दा,  तो    रूठे   हुए  भगवान.
                                           हिन्दू  है,ं   कहीं   पर  तो   कहीं  मुसलमान
                                           अफसोस  के  इस  देश  में  बाकी नहीं इन्सान.
                                                                             -----
                                          ये लम्बी नाक तक दाढ़ी, ये दो बालिश्त की चुटिया,
                                          इन्हीं दोनों की साजिश ने  डुबोई  देश की लुटिया.
                                           ये खूंरेजी,  ये कत्ले आम,  आपस  में  करा  देना
                                          ये  मौलाना व पंडित  की  सियासत  बड़ी घटिया.
                                                                          -----
                                               ये नेता  है,  जरा सा  हट कर चलिए, 
                                              ये कब क्या बोल  जांये, कुछ न कहिए.
                                             ये ऐसे   नाग  हंैं,  दो मुंह  हंै  इनके,
                                              किधर  से  कब चलेंगे  बच के चलिए.
                                                                      -----
                                              मेरी कविता ख्यालों  को नया  एक  मोड़ देती  है?
                                              ये  सीधी  राह  पर लाती है, ला कर छोड़ देती है,
                                             बहुत ही  साफ मंजिल का  पता देती है दुनिया को,
                                               जो  जिन्दा  हैं, उन्हें  एक तार  से जोड़  देती है.
                                                                          -----
                                                           रोटियों  की  जंग  कोई  जंग  है?
                                                         गोलियां  सरकार की, खा  कर मरें.,
                                                        जंग कुरसी की बहुत अच्छी है चीज,
                                                        हार   हो  तो डाक  बंगला  में रहें



                                                    फूल


मैंने दस साल बाद उसे देखा था. वही मासूम और भोला चेहरा, कतरनी  के समान चलने वाली जुबान आज भी उसके मुंह में थी बस थोड़ा सा उसका शरीर बदला हुआ था. समय बदल गया था और अब मैं उसकी चोटी नहीं खींच सकता था, उसकी नाक पकड़ नहीं सकता था. और नही उसकी आंखें अपनी हथेली से बन्द करके पूछ सकता था कि ‘बोलो मैं कौन हूं’
वह कली से फूल बन गई थी. जवानी के बारे में क्या कहना वह कई तरह के प्रतिबंध लाती है. मैं जानता हूं, उससे अब कुट्टी करने का समय बहुत पीछे भाग चुका है. जवानी आते ही बचपन की सारी बातें भी पीछे छूट गई हैं. मैं जानता हूं कि जवानी आंखों के इशारे पर चलती है. उसकी आंखें बहुत कुछ बोल रही थीं जिसमें ढेर सारे सवाल थे जिसे मैं समझ रहा था.
बचपन की जुदाई जब जवानी के मुलाकात में बदलती है फिर तो बचपन को जीवित करने का प्रयास शुरू हो जाता है. ऐसी स्थिति में खामोशी का कोई मतलब नहीं.. लम्बे अंतराल के बाद मुझे देख कर उसने बहुत शरमा कर बोला था ‘नमस्ते कैसे हो’ 
मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या उस नमस्ते के बाद मेरे बारे में कुछ और जानने की उसे जरूरत नहीं थी? लम्बे अंतराल के बाद क्या केवल इतना ही ‘नमस्ते कैसे हो.’ बस इतना ही. शायद इसका उŸार इस बात में छिपा हुआ हो जब जुबान साथ न दे तो आंखों से बातें करनी चाहिए. उसकी आंखें शायद कुछ बोल रही थीं....
उसकी गोद में एक बच्ची थी, मासूमियत से उसने अपनी मम्मी से पूछा... मम्मी ये अंकल कौन हैं? एक छोटी सी बच्ची मेरे बारे में जानना चाहती थी. एक भोली भाली मासूम सी लड़की, किसी के भी दिल में उतर जाने वाली. उसकी मम्मी अपनी नजरें नीचे झुकाए हुए.. चुप चाप थी. लड़की लगातार पूछ रही थी... ‘मम्मी ये अंकल कौन हैं.’ उसकी मम्मी ने कोई जबाब नहीं दिया. मैं कब तक देखता कि वह क्या बोल रही सो मैंने लड़की को अपनी गोद में ले लिया...
बाहर आते ही मुझे लगा कि मेरा पूरा प्यार मेरी बाहों में समा गया है. मैंने महसूस किया कि मेरा अस्तित्व मेरे चारो ओर फैलता जा रहा है. काफी देर तक मैं बच्ची को गोद में लिए भटकता रहा, कभी उसके माथे को चूमता तो कभी उसके नाजुक हाथों को, तभी मुझे जान पड़ा कि मैं खुद को खो रहा हूं और मैं क्या हूं शायद इसका मुझे पता नहीं.
काफी देर बाद जब लड़की को उसकी मम्मी के पास छोड़ने गया तो वह लड़की अपने ढंग से मेरा परिचय करा रही थी और मेरी ओर देख भी रही 
है. लड़की मेरी गोद से उतरने का नाम नहीं ले रही थी. उसकी मम्मी की निगाहें कभी मेरे ऊपर टिकतीं तो कभी अपनी बेटी पर जा कर टिक जातीं. उसके चेहरे पर बनने और बिगड़ने वाली लकीरें उसके भीतर उठने वाले तूफानों के बारे में बोल रही थीं, मुझे एकाएक उसके चेहरे पर परिवर्तन दिखा. एकाएक उसने बच्ची को मेरी गोद से छीना और चली गई. आंगन की छत से मैंने उसे देखा तो वह लड़की को अपनी गोदी से चिपकाए खूब खूब प्यार कर रही थी, उसे चूम और चाट रही थी.
मैं उसे देख कर बीते दिनों में चला गया... बैर खाने का दृश्य, अमरूद तोड़ने का दृश्य, तख्ती और पट्टी के लिए लड़ाई, सियाही की शीशी के लिए लड़ाई फिर किताब को टुकड़े बना कर फेकने का दृश्य, मुझे लगा कि मैं अब भी उसकी चोटी खींच रहा हूं. और वह नाराज हो कर किनारे बैठ गई है, उसने मुझसे कुट्टी कर लिया है. मेरी नई किताब जिसे मैं उसे देना नहीं चाहता उसने मुझसे छीन लिया और फाड़ दिया है फिर वादा कर रही है कि वह ऐसी गलती फिर कभी नहीं करेगी. मेरा गुस्सा फिर भी कम नहीं हुआ तो मुझे दस पैसे का घूस देने लगी फिर भी मैं नहीं पिघला तो मेरा हाथ पकड़ कर मुझसे चिपक गई.
मैने उसे आंगन के नीचे देखने के बारे में सोचा कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए, अब मैं बचपन से बहुत दूर हूं, पर मुझे लगता था कि मेरी जान उसकी मुठ्ठी में कैद हो चुकी है. बचपन के संबधों की जड़ें समय के साथ कितनी गहराई तक जा पहुचती हैं इसका आभास तक नहीं होता पर आदमी जीवन के सफर में कोई नया मोड़ आने के बाद जरूर सोचता है कि इसकी जड़ों का कोई न कोई सिरा जिन्दगी को छू रहा है, पर उसके आगे क्या होगा इसका फैसला समय के हाथों में होता है. समय एक ऐसी वास्तविकता है जो नये को पुराना बना देती है और पुराने को नया. मेरे सामने भी पुराना नया हो रहा था.
विशेष परिस्थितियों में केवल ‘नमस्ते कैसे हो’ वे शब्द भर नहीं होते वे ‘अ’ से अनार वाले संबधों के बाहक भी बनते हैं. ऐसा क्यों होता है इसे समझने और समझाने के लिए सिवाय भावनाओं के कुछ और नहीं होता किसी के पास. पीछे मुड़ कर देखने से, उसमें गोता लगाने से ही अन्तरआत्मा खिलती हुई दिखने लगती है और मुंह से अचानक निकलता है वाह रे वे दिन, वाह रे बचपन.
सुबह सुबह बाथरूम से जब बाहर निकला तो देखा कि वही लड़की हाथ में मंजन और ब्रश लिए सामने खड़ी है फिर तो मुझे जान पड़ा कि उसने मेरे दामन में खुशियों का खजाना उड़ेल दिया है. बाद में एक लोटा पानी ले कर भी वह तुरंत चली आई, इतना ही नहीं उसने मुझे आदेश भी दिया कि मैं मुंह की बढि़या से सफाई करूं कि उसे गन्दे लोग कŸाई पसन्द नहीं.
मैं अभी हाथ मुंह धो ही रहा था कि कमरे में से किसी चीज के गिरने की 
वाज आई, मैने देखा कि वह लड़की कोई सामान खोज रही है. मैं वहीं खड़े खड़े उसका खोजना देख रहा था और काफी आनन्दित भी था. उसे वह सामान नहीं मिला जिसे वह खोज रही थी जब कमरे से बाहर निकलने लगी तो उसने मुझे देखा और साधिकार मुझसे पूछा...‘अंकल वह डिब्बा कहां है?’ मैंने उससे पूछा कौन डिब्बा.. फिर मैंने बिस्कुट का एक पैकेट उठाया... लो इसे लो.
‘यह डिब्बा नहीं अंकल’
फिर मैंने उससे पूछा... ‘तुझे कौन सा डिब्बा चाहिए’
‘दाढ़ी बनाने वाला डिब्बा’
‘उसका क्या करोगी तुम ?’
उसने बताया कि उसके मकान के सामने ही उसकी कोई सहेली रहती है, वह रोज दाढ़ी बनाने वाला डिब्बा अपने डैडी को देती है, दाढ़ी बना चुकने के बाद उसके डैडी उसे बहुत प्यार करते हैं..
‘अंकल बताइए न वह डिब्बा कहां है? अंकल उसे मैं आपको दूंगी, आप मुझसे प्यार करेंगे न’ 
मैं तो उसे देख रहा था, क्या बोल रही लड़की, प्यार की कैसी तस्वीर इसके दिमाग में घंस गई है, एकदम शुद्ध और पवित्र, बिना बनावट वाली.
‘बेटे मैं तो दाढ़ी बनाता ही नहीं, तुम अपने घर जा कर दाढ़ी बनाने वाला डिब्बा अपने डैडी को दिया करना’
मेरी बातें सुन कर लड़की उदास हो गई, उसने अपना मुह मेरी तरफ से घुमा कर दूसरी तरफ फेर लिया.
मैंने उसे गोदी में उठा लिया और उसे दुलारने लगा, फिर पूछा... ‘बेटे तुम उदास क्यों हो गई?’ उस लड़की ने बताया...‘अंकल मेरे डैड न जाने कहां रहते हैं, दाढ़ी बनाने वाला उनका डिब्बा आलमारी में बन्द है, मैं उसकी रोजाना साफ सफाई करती हूं. अंकल वह डिब्बा मैं आप को दे दूंगी. आप उससे रोज दाढ़ी बनाया कीजिएगा, उसके बाद उसे मैं रख लिया करूंगी. मेरी सहेली भी तो ऐसा ही करती है.’
लड़की की मम्मी जाने कब से हमलोगों को बात करते हुए देख रही थीं. वे कमरे में दाखिल हुईं, और मेरी गोद से लडक़ी को लेना चाहा. मैं उन्हें रोकता कि उसके पहले लड़की ने ही उनकी गोद में जाने से मना कर दिया और रोने लगी. उसकी मम्मी लडक़ी को अपने साथ ले जाना चाहती थीं पर वह उनके साथ जाने के लिए तैयार नहीं हुई.
पास ही में खड़ी खड़ी लड़की की मम्मी, न जाने क्या क्या सोचती रहीं फिर बोलीं...
‘मुझे अफसोस है कि इसने आपको बहुत परेशान किया, बहुत शरारती है भी. ऐसा बोल कर वह जाने वाली ही थीं कि लड़की बोल उठी...
अरे मम्मी! आप कहां चलीं. चाय कौन बनाएगा, आप चाय तो बनाइए, मैं
अंकल की प्याली में चाय पिउंगी, आप भी पी लेना, ‘मेरी सहेली की मम्मी भी तो अपने पापा के साथ चाय पीती हैं.’
इस तरह की स्थिति का सामना करने के लिए लड़की की मम्मी तैयार नहीं थी. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें?
मेरे मकान में चाय बनाने के लिए लड़की की मम्मी को तकलीफ उठाना पड़े, यह बात मुझे पसन्द नहीं आई. मैं उनसे कहा कि आप लड़की के साथ बैठें, मैं चाय बना कर लाता हूं.
गैस चूल्हे पर केवल पानी ही चढ़ाया था कि लड़की, अपनी मम्मी का हाथ थामे किचन में आ गई. किचन में आते ही अपनी मम्मी से कहा...‘छिः छिः मम्मी आपको शर्म नहीं आती, अंकल चाय बना रहे हैं. मेरी सहेली के पापा को कभी चाय बनाते आपने देखा है क्या?. मम्मी आप चाय बनाओ, हमलोग पियेंगे.’ इसी के साथ लड़की ताली बजाकर हसने लगी. उसकी मम्मी को किचन में छोड़कर मैं लड़की के साथ किचन से बाहर आ गया.
दूसरे दिन दाढ़ी का डिब्बा नहीं लाने पर लड़की मुझे फटकार लगा रही थी कि इतने में उसकी मम्मी आ गईं. थोड़ी देर तक हमलोगों की नोक झोंक देखती रहीं फिर किचन में चली गईं. काफी दिनों बाद चाय की टेबुल पर घर की बनी चीजंे मैं देख रहा था. चाय तैयार हो चुकी थी पर लड़की कहीं गायब हो गई थी. कई बार आवाज देने पर आई उसके हाथ में गुलाब का एक खूबसूरत फूल था. वह फूल दो दिन पहले ही खिला था. मुझे फूल तोड़ना बुरा लगता है, इस लिए मेरे कारण फूलों को कोई तोड़ता नहीं. लड़की के हाथ में उस फूल को देख कर थोड़ा झटका तो लगा पर कोई बात नहीं, बच्ची है, तोड़ लिया होगा. लड़की फूल को मेरी तरफ ला कर बोली... ‘इसे मम्मी के लिए लाई हूं.’
‘तो इसे मम्मी को दे आओ, मेरे पास क्यों ले आई?’
उसकी मम्मी पास ही में खड़ी थीं. लड़की अपनी मम्मी का सिर झुकाने लगी.. लड़की की मम्मी ने सोचा कि वह शायद चाय पीने के लिए सिर झुका रही हैं पर ऐसी बात नहीं थी, पहले आप फूल लीजिए फिर चाय पियेंगे. लड़की की मम्मी ने बच्चे की जिद समझ कर उस पर घ्यान नहीं दिया इसी बीच लड़की थोड़ा हिली कि चाय की प्याली नीचे गिर कर टूट गई. तभी लड़की मेरा हाथ अपनी ओर खींच कर बोली...
‘अंकल आप इस फूल को मम्मी के बालों में लगा दीजिए, मेरे डैड भी ममी के बालों में फूल लगाया करते थे, बहुत अच्छा लगता है अंकल.’
लड़की की बात सुनकर उसकी मम्मी झटके से उठ कर खड़ी हो गईं. वे कभी मुझे तो कभी लड़की को देखने लगीं, इतने में चाय ठंडी हो गई.लड़की की बात पर जब उसकी मम्मी ने ध्यान नहीं दिया फिर वह मेरी पीठ पर सवार हो गई. मैं लड़की को पीठ पर पाकर पीछे के बीते दिनों में चला गया. एक बार बचपन में मैं उसकी मम्मी से हार गया था और 
दण्ड स्वरूप कमल का फूल पोखरे से तोड़ कर उसे देना पड़ा था.
मैंने देखा कि उसकी मम्मी अब भी सिर झुकाए खड़ी थीं... कुछ सोच कर मैंने लड़की के हाथ से फूल अपने हाथ में ले लिया और फिर... उसे उसकी मम्मी के बालों में खोंस दिया. लगा कि वह गुलाब का फूल फिर से खिल उठा है.
लड़की अपनी मम्मी के बालों में फूल देख कर मुस्कराने लगी, उसका  चेहरा फूल जैसा खिल उठा.. दौड़ते हुए मुझसे लिपट गई...
‘अंकल मेरी मम्मी खूबसूरत दीख रही है न. न जाने क्यों हमेशा मंुह लटकाये रहती हैं.’
मैं तो समझ ही रहा था कि लड़की की मम्मी क्यों उदास रहा करती हैं और अब तो किसी कहानी की तरह बन गई हैं. आज वे न तो विधवा हैं और नही परित्यक्ता, केवल एक महिला हैं, खुद में डूबी हुई, आशा करती कि कोई उनका अपना ऐसा हो जो उन्हें संभाले. जूड़े में फूल लगाने से क्या होगा, उसे लगाने वाला भी तो कोई होना चाहिए. 

                                                                  
                                           आफताब   आएगा,   माहताब   आएगा,
                                             क्या कहा, फस्ले गुल पर  शबाब आएगा.
                                          सोचने से  कभी भला  इनकलाब आएगा,
                                            ख़त लिखा ही नहीं तो क्या ज़बाबआएगा.
                                                                        -----
                                                   कर्ज की  मौज़ मस्ती नहीं चाहिए,
                                                  हमको मांगे की हस्ती नहीं चाहिए.
                                                 गैर की  हर इनायत  मुबारक तुम्हें,
                                                   तौबा, तौबा  ये मस्ती  नहीं चाहिए
                                                                      -----
                                                     चांद  तारों की बात मत करिए,
                                                     माहपारों  की  बात  मत करिए.
                                                     जो  अन्धेरों  को  रौशनी न दे,
                                                    उन सितारों की बात मत करिए.
                                                                     -----
                                                  जिस्म नंगा  हो  तो  हमको कमंडल  चाहिए,
                                                 भूख के मारे हुओं  को  सिर्फ मंडल  चाहिए.
                                                 देश की छाती पर नाचे कोई इसका गम नहीं, 
                                                 वादा  पैक  हो  जिसमें, वही  बंडल  चाहिए.
                                                                       -----


                                               नज़्म

                                                       जिसको  मीरा  ने  कलेजे  से  लगाये   रखा,
                                                      जिसको  रसखान  ने  पलको पे  सजाये रखा,
                                                       जान  तुलसी की है, आशिक है कबीरा जिसका,
                                                       कीट्स,  शेली  ने  जिसे  खूने जि़गर से सींचा,
                                                       इसी  के रूप   में  कुरआन  ख़ुदा  ने   भेजा,
                                                       लबे  कृष्ण  से  निकली  तो  बनी  है  गीता,
                                                       कभी  ढली   है   माशूक  की   अंगड़ाई   में,
                                                       कभी  सकूनो  दिलो   जान  है  तनहाई   में,
                                                       कभी  यह  बज़्मे तखैफुल की दुलहन बनती है,
                                                        कभी यह इश्क के  आंगन की  चुभन बनती है,
                                                        कभी  ज़मीन  पर उतरी  है, रागिनी  बन  कर,
                                                        कभी  फि़ज़ाओं  में  बिखरी है, चादनी बन कर,
                                                        कभी यह  मचली है  झरनों की गुनगुनाहट  में,
                                                         बशक्ले  शोला ये नज़रूल  के साथ साथ चली,
                                                         बशक्ले  नूर  ये  टैगोर  के  नगमों  में  ढली,
                                                          इतनी  पाकीज़ा  है  कुरआन   की आयत जैसे
                                                         इतनी  मासूम  है  भारत  की  रिवायत   जैसे
                                                                                         -----

                                              गीत

                                             चलें  मशालें  लेकर हम  सब,  अंधियारे  भागेंगे,
                                             दीन   हीन  किस्मत के मारे  सभी बेचारे जागंगे.
                                            खेत, मेड़ और खलिहानों में अपना हिस्सा मागंेगे.
                                            कौन है अपना, कौन पराया छुपा राज सब जानेंगे.
                                            चलें मशाल लेकर हम सब अंधियारे भागेंगे....

                                            बंजर पर हक सबका होगा, परती  भी अपनी होगी,
                                            आसमान में  हिस्सा होगा धरती  भी  अपनी होगी,
                                           रंजो अलम सब अपना होगा, मस्ती भी अपनी होगी,
                                           छेड़ छाड़ न  होगी हमसे,  हस्ती  भी अपनी होगी.
                                            चलें मशाल लेकर हम सब अंधियारे भागेंगे...

                                          छोटे   बच्चे  शोभा  होंगे,  स्कूलों  में  कक्षा   के,
                                          नगरी  नगरी   द्वारे  द्वारे  फूल  खिलेंगे  शिक्षा के,
                                         सब में सबकी हिस्सेदारी होगी, दिन बीतेंगे भिक्षा के,
                                         होंगे  कोई   और   जो   भूखे   होंगे   रक्षा  के.
                                         चलें मशाल लेकर हम सब अंधियारे भागेंगे...

                                          यहां पर अम्न है, सुख चैन है, गड़बड़ नहीं कोई,
                                         जिधर  भी  देखिए   हालत  ठीक  लगती  है.
                                         हमीं हैं जिसने मुल्क  को  उठाया  है ज़माने मे,ं
                                         जहां भी हाथ फैलाया  वहीं  से भीख मिलती है.
                                                                      -----
                                           मैं  बहरा  मंत्री हूं  कुछ  सुनाई  नहीं  देता,
                                            कहां क्या गड़बड़ी है, कुछ दिखाई नहीं देता.
                                           वहीं दस्तख़त बनाता हूं, जहां सेक्रेटरी कह दे,
                                          बड़ा मोटा है परदा  कुछ  सुनाई  नहीं देता.
                                                                        -----
                                           रोटी की हर आवाज़  को  सख्ती  से दबा दो,
                                           हड़ताल का जो नाम ले उसे गोली से उड़ा दो,
                                           जो मांगे अपना हक  उसे  शूली  पर चढ़ा दो,
                                           ये  हुक्म  हमारा  है  ज़माने  को  सुना   दा.े
                                                                     ------

                                          राग दरबारी न  छेड़ो,  भैरवी  को  छोड़  दो,
                                         रक्त  पीने  का समय है, ज़ामो  मीना छोड़ दो.
                                        आज फिर तुम राग दीपक को नया अन्दाज़ दो,
                                         जब  उठें शोालें  तो महलों के ज़ानिब मोड़ दो.
                                                                          ------















Comments

Popular posts from this blog

असुविधा के चालीस साल 

अंतर गाथा दो अंश

जंगलदंश वाम उग्रवाद के साथ हिंसा तथा अहिंसा पर एक वैचारिक विमर्श