तीसरा रास्ता एन जी ओ पर केंद्रित उपन्यास के दो अंश


तीसरा रास्ता एन जी ओ  पर केंद्रित उपन्यास के दो अंश 


राजनीतिक व सामाजिक रूप से तीसरा रास्ता क्या हो, कैसा हो?
एन.जी.ओ. संस्कृति ने क्या सामाजिक बदलावों के लिए ईमानदारी से प्रयास किया?
एन.जी.ओ. की गतिविधियों का यथार्थ लेखा जोखा प्रस्तुत करता उपन्यास है तीसरा रास्ता...
तीसरा रास्ता फन्ड राजनीति के घालमेल पर से भी पर्दा उठाने का एक प्रयास है.
देखें.....


                                                 गोत्र

ठीक एक साल पहले सुधा मानवाधिकार जन समिति में एक्टिविस्ट की तरह भर्ती हुई थी और अमरेश सुधा से साल भर बाद सहायक एकाउन्टेन्ट के पद पर। उस समय निखिल दा वहां एकाउन्टेन्ट विभाग के सर्वे-सर्वा थे। संस्था के मंत्री जी भी उन्हें सलाम बजाते। उन दोनों के रिश्ते में ऐसा क्या कुछ था कि दफ्तर की सामान्य परम्परा भी उनमें न दिखती, किसी को कुछ नहीं मालूम। मालूम तो सुधा के बारे में भी किसी को कुछ नहीं था सिवाय इसके कि वह नशीली हवा की तरह है, तीस साल के भीतर वाली युवती, भरपूर जवानी और मस्त जुबान से छलकती किसी नशा की तरह।
वह महीने में दो-तीन बार दफ्तर आती और महीने भर के लिए दफ्तर के लोगों के दिल-दिमाग में दैहिक-भाषा की कई-कई कविता-कहानियां छोड़ कर चली जाती। ऐसा भर ही होता तब भी ठीक था पर उसका आना इससे कुछ अधिक होता। लोग फुसफुसाते, काना-फूसियों का दन्तकथा की तरह पाठ करते, यानी मंत्री जी अमावस की पूर्णमासियों के बिना मानवाधिकार का कार्य नहीं कर सकते। गोया कुछ है जरूर, तभी तो सुधा सीधे मंत्री जी के रूम में दाखिल होती, घन्टे दो घन्टे बाद बाहर निकलती।
लेकिन मंत्री जी के पास सिर्फ दफ्तर के कमरे तो नहीं... यह सब तो कहीं भी, किसी दूसरी जगह कुछ छिप-छिपाकर...
अमरेश दफ्तर में सुधा के बाबत होने वाली चर्चाओं से निर्पेक्ष रहता, वैसे भी वह कभी लोकमत वादी नहीं रहा है फिर भी ऐसा नहीं था कि सुधा के बाबत होने वाली चर्चाओं की गन्ध ने उसे नहीं छुआ था। छुआ था, वह भी सुधा को देखता, पढ़ता तथा गुनता फिर धीरे से मन में बुदबुदाता, ‘काफी तेज है’
सुधा के बारे में इतना भर सोच लेना ही अमरेश के लिए पर्याप्त होता। दैहिक भाषा का पाठ उसके लिए अंग्रेजी की तरह था, जितना याद करो उतना भूलो वाला... सो वह जाने-अनजाने भी नारी देह को अपने दिमाग में न बिठाता। अमरेश दफ्तर के दूसरों से इस मामले में भिन्न था। उसे अपना काम काफी प्रिय था यानि एकाउन्ट के कारबार में पूरे समय तक लिप्त रहना।
वही अमरेश, जब से दफ्तर में आया है, सुधा के बारे में सोच रहा है, ‘सुधा को आज आना चाहिए महीने का पहला सप्ताह गुजर चुका है। उसका चेक अभी तक गया नहीं है, आएगी जरूर... दफ्तर पांच बजे आमतौर पर बन्द हो जाया करता है, चार से ऊपर हो चुका है, लगता है सुधा अब नहीं आएगी...’
तभी मन्त्री जी की छल-छलाती कार दफ्तर के कैम्पस में घुसती हुई साफ-साफ दिखी.. सुधा कार में थी.. अमरेश बरामदे से आकर सीधे ऊपरी केबिन में जा घुसा, ‘औपचारिकता भी तो कोई चीज होती है’
मंत्री जी अपने कक्ष की तरफ चले गये और सुधा सीधे अमरेश के पास 
‘मेरा चेक’
‘हां तैयार है, काहे देर कर दी आपने?’
क्षेत्र में थोड़ा टसल चल रहा था, जंगल के माफियाओं ने जीना हराम कर दिया है।
जंगल के माफियाओं से आपको क्या लेना-देना?
‘लेना-देना है... तभी तो’
कैसा लेना देना?
‘लम्बी कहानी है। फिर कभी, आज थोड़ी जल्दी है, मंत्री जी के साथ एक जगह एप्वाइंटमेन्ट है राजस्व मंत्री से, जो गृहमंत्री भी हैं। उन्हीं से मिलना है।’
चेक, सुधा को देते हुए अमरेश ने आदर भाव से कहा....
‘फिर मेरा काम! आपसे थोड़ा काम था...’
‘मुझसे!’ चकराई सुधा, ‘क्या काम है, बतायें’
‘वक्त लगेगा, इतना जल्दी नहीं’ अमरेश ने बताया
‘फिर तो कल, कल सुबह, आपके घर आ जाती हूँ ओ. के’
‘हां, ठीक है, लेकिन न भूलिएगा’
‘सुधा नहीं भूलती अमरेश बाबू... अच्छा चलती हूँ’
फिर तो सुधा फुर्र हो गई थी, किसी चुनमुन चिरैय्या माफिक। मानवाधिकार जन समिति का कार्यालय अपने वक्त पर बन्द हो चुका था, अब किसी को क्या गर्ज कि पता लगाये मंत्री जी और सुधा दफ्तर से कब निकले, कहां गये... वगैरह वगैरह...पर?
अमरेश दफ्तर से सीधे अपने घर आया। रास्ते भर किसी सपने की तरह सुधा उसके साथ लगी रही श्सुधा नहीं भूलती अमरेश बाबू्य कितने करीने से सुधा ने कहा था... बहरहाल वह कल घर आएगी... फिर तो उसके स्वागत के लिए आज ही कुछ जरूरी तैयारी कर लेनी होगी। 
सुधा दूसरे दिन अमरेश के घर सुबह आई, ठीक आठ बजे। उसे उसी दिन 
उ० प्र० के एक सबसे पिछड़े जिले में जाना था, जहाँ वह जागरूकता अभियान चला रही थी तथा लोगों को प्रशिक्षित कर रही थी कि लोग अपने मानवाधिकारों की सुरक्षा कैसे करें।
बहुत ही टेढ़ा काम था। लोगों को मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए इतना सबल होना था कि उन्हें वन विभाग के जमींदार नुमा अफसरों, कर्मचारियों से ही नहीं, वरन् वन विभाग के लकड़ी-पत्थर, बालू तथा वनोपजों के तस्करों से भी भिडना था, यह भिड़न्त रोज की थी, पुलिस वन विभाग के कर्मचारियों की मदद कर रही थी तथा प्रशासन का लोक कल्याणकारी सांचा कान में तेल डाले पड़ा था...सुधा परेशान, परेशान थी...
सुधा वन सीमा से सटे हुए गांवों में काम कर रही थी। वहां आदिवासी मूल की जातियां निवास करती थीं। उनके पास जमीनों के जो कागजात थे, वे सब उ० प्र० ज० वि० अ० के श्रेणी चार के थे, जिससे साबित होता था कि वे जमीनदारी विनाश के पूर्वसे ही काबिज थे... फिर वे उन जमीनों केसीरदार क्यों नहीं हुए?
यह कानूनी मामला था, सुधा कानूनची न थी, जाने क्यों वह महसूसती कि काली कोट पहनकर कानूनों के सफेद इरादों व मकसदों को न तो समझा जा सकता है, न ही समझाया जा सकता है। सिर्फ दलाली की जा सकती है तथा मीठा भ्रम फैलाया जा सकता है कि कानूनों की उर्वर भूमि पर लोकतंत्र की गुणकारी, औषधीय फसलें लहराती हैं। पर सुधा करती क्या...उसे तो आदिवासियों का हित देखना था सो वह जिला कचहरी जा पहुंची।
कचहरी जाकर उसे मालूम हुआ कि उसके कार्यक्षेत्र में भू-स्वत्व का, जो मामला है वह वन अधिनियम की धारा ४, धारा २० बनाम जमीनदारी विनाश अधिनियम की श्रेणी चार का है इस परिक्षेत्र का असल जमीनदार वन विभाग है जिसे जमीनदारी विनाश के बाद राजस्व विभाग ने राजस्व भूमि का भौतिक कब्जा हस्तांतरित कर दिया है।
गोया कानूनन कुछ नहीं हो सकता...फिर... इसी फिर को सुधा निश्चित नहीं कर पा रही थी... वह हाईकोर्ट के एक मशहूर वकील से भी सलाह मशविरा ले रही थी कि क्या भारतीय वन संरक्षण अधिनियम १९८० को जनहित में किसी सीमा तक शिथिल किया जा सकता है?
अमरेश के घर पर सुधा हाईकोर्ट के वकील के यहां से होकर आई थी। वह थोड़ी चिन्तित थी.. उसके चेहरे का गब-गब रंग फक्क  था.. लेकिन अमरेश ने उस पर ध्यान नहीं दिया... वह तो अच्छी आवभगत के लिए चिन्तित था जिससे लगे कि सुधा उसके लिए विशिष्ट है।
आवभगत के बाद सुधा ने सीधे पूछा....
‘काहे के लिए बुलाया आपने अमरेश बाबू!’
अमरेश तो जैसे तैयार बैठा था, सुधा पूछे फिर आगे की बात बने...
अमरेश ने अपने लडके विनीत को पुकारा... विनीत आया, उसने सुधा को प्रणाम किया...
‘इसी का एडमिशन कराना है, अब मेरे पास पचीस हजार रुपये कहां है कि...? यदि मंत्री जी चाह लेंगे तो इसका नाम लिख जाएगा, आपका कहा मंत्री जी कभी न टालेंगे’
सुधा हंसने लगी, यद्यपि हंसने की कोई बात न थी। अमरेश चकराया था, ...काहे हंस रही है सुधा?
‘अमरेश बाबू! बहुत भोले हैं आप। आप की तरह दुनिया भोली नहीं्य। मंत्री जी! वह कभी किसी का छोटा से छोटा काम भी कराया हैक्या? आप उसे नहीं जानते्य आप जैसे सरल व निश्छल लोग इन मंत्रियों, संत्रियों को समझ नहीं सकते...’
‘तो फिर छोडिए... किसी दूसरी जगह पर इसका नाम लिखवा देते हैं’ अमरेश ने परिवर्तित प्रस्ताव रखा।
नहीं ऐसा नहीं है अमरेश बाबू... अगर आप कहें फिर मैं व्यक्तिगत स्तर से कोशिश करूं... सुधा ने अमरेश से पूछा...। अमरेश को कुछ भी मालूम न हुआ कि सुधा ने उसके लडके का एडमिशन कैसे करवाया... कितना रुपया लगा... क्या-क्या हुआ... यह सब सुधा का काम था।
समय बीतते देर नहीं लगती, तीन साल गुजर गये। सुधा जब भी दफ्तर आती अमरेश से मिलती तो लडके का हाल पूछती, फिर दफ्तर का काम निपटाती तथा चली जाती। सुधा अमरेश के लिए खूबसूरत तस्वीर भर नहीं थी, जो हिलोरे पैदा करती... सुधा अपना प्रतिलोम थी, एक ऐसी जो दूसरों की मदद के लिए ही बनी हो। सुधा ने बताया एक दिन कि वह करती क्या है?
‘हाईकोर्ट में रिट दाखिल हो चुकी है। सरकार को निर्देशित किया गया है कि बताए क्या उत्तर प्रदेश के सभी परिक्षेत्रों में जमीनदारी विनाश की कार्यवाही एक साथ संपन्न कराई गई? क्या कुछ खास परिक्षेत्र के लिए भू स्वत्व प्रदान करने के संबंध में विशेष व भिन्न प्राविधान किये गये? क्या विवादित परिक्षेत्र में राजस्व भूमि तथा वन भूमि का कानूनी सीमांकन कराया गया? तथा कितनी राजस्व भूमि वन विभाग को सौंपी गई, और अब उसकी भौतिक स्थिति क्या है? वन विभाग की बेदखली कार्यवाही पर स्टे आर्डर मिल गया है अमरेश बाबू। उक्त आर्डर वन विभाग एवं जिलाधिकारी तथा पुलिस को मिल भी चुका है।’
‘यह तो बहुत बड़ी जीत है आपकी...’ अमरेश ने सुधा की प्रशंसा की।
यह जीत-हार का मामला नहीं अमरेश बाबू, यह मामला तो सीधे अपने हितों की हिफाजत के लिए संघर्ष का हैकृसंघर्ष मेें भले ही हार हो पर उसका अन्तिम पड़ाव जीत ही होता है... कहते हुए सुधा दफ्तर से निकल गई, उसे जल्दी थी कार्य योजना क्षेत्र में पहुंचने के लिए। अमरेश अब सुधा से इतना प्रभावित था कि वह जब भी दफ्तर आती, उससे हाल-चाल पूछता, संघर्ष की अन्तिम योजना के बारे में बात-चीत करता, सोचता क्या करूं कि सुधा के लिए कुछ नया हो, पर कुछ कर न पाता।
आज अमरेश दफ्तर जल्दी आया है, उसे वेतन भुगतान के हिसाब को फाइनल करना है... वह कागजात पलट रहा है, कुछ तलाश रहा है, उसे सुधा का कागज नहीं मिल रहा। आखिर उसका नाम कैसेछूट गया... क्या कम्प्यूटर ने गलत नोटिंग की या उसका वेतन फीड ही नहीं किया गया...
अमरेश कम्प्यूटर के की बोर्ड से खेल रहा है... माउस उसके हाथ में है, सुधा का नाम स्क्रीन पर नहीं आ रहा... अमरेश निश्चित कर लेता है कि गलती हुई है फिर वह वेतन बाबू से संपर्क करताहै।
सुधा का वेतन नहीं बना है, उसे हटा दिया गया है। उसके प्रोजेक्ट का नवीनीकरण रोक दिया है मंत्री जी ने्य वेतन बाबू ने अमरेश को ऐसे बताया, जैसे उन्हें सारा याद हो, याद क्यों न हो, केवल सुधा का प्रोजेक्ट ही तो रोका गया था, किसी दूसरे का नहीं। अब अमरेश क्या करे... क्या मंत्री जी से बात करे...कुछ निश्चित नहीं कर पा रहा था अमरेश।
मंत्री जी सेकेन्ड हाफ में दफ्तर आये। अमरेश उनके आने की प्रतीक्षा में था। वह मंत्री जी के कक्षमें दाखिल हुआ...
पर अमरेश के हाथ में दाखिल होना ही आया, क्योंकि मंत्री जी के सर्वहितकारी चेहरे पर कोई तानाशाह काबिज था।
‘तुमसे क्या मतलब? किसका वेतन लगता है किसका नहीं... क्या तुम हिसाब लोगे? तुम्हें अपनी औकात मालूम है कि नहीं...’
अमरेश मुर्दा माफिक... मंत्री जी के ठीक सामने किसी लैम्प पोस्ट की तरह खड़ा और मंत्री जी घुमावदार कुर्सीपर घूमते हुए... पाइप में विदेशी तम्बाकू भर रहे हैं।
‘अब तुम जा सकते हो’ यह आखिरी आदेश अमरेश के लिए था... फिर अमरेश वापस अपने कक्ष में चला आया, खून के चकत्तों पर पांव रखता हुआ, तम-तमाया...
दफ्तर तो दफ्तर होता है। दफ्तर में हर तरफ मालिक और मजदूर की गंध फैली होती है, पर हर वक्त नहीं महकती। सुधा का मामला गन्ध से भरा था... सो महकता था, सुवासता था एक तरफ से दूसरे तरफ तक।
उस तरफ तक भी जो सुधा को एक चालू लडकी समझते थे, तथा मान कर चलते थे कि स्वयं सेवी संस्थाओं में लड़कियों की चमकों व महकों का अच्छा कारबार होता है। एक ऐसा कारबार जिसमें मुनाफे काग्राफ अनुमान से ऊपर होता है। ऐसे लोगों के लिए सुधा जो महज एक खिलौना थी, अब कर्मचारी हो गई...
‘क्या ऐसे ही निकाल दिया...कोई नोटिस वगैरह’ किसी ने पूछा...
‘नोटिस क्या देगा, अभी तो एग्रीमेन्ट में ही साल भर का समय बाकी है’ जोड़ा बेतन बाबू ने, अमरेश बाबू को आज ही बताया है मैंने।
फिर क्यों निकाला?
‘यही तो डिस्क्रेशन है भाई!’ अमरेश बाबू ने मंत्री जी की तानाशाही का खुलासा किया...
श्यह डिस्क्रेशन भी साला क्या चीज है...्य संस्था के कोआर्डिनेटर शर्मा जी तमतमाए हुए थे...
‘फिर तो किसी को भी मक्खी की तरह निकाला जा सकता है।’
और नहीं तो क्या वेतन बाबू पूरी तरह से नर्वस थे... ‘पचास से ऊपर का हो रहा हूँ अगर साले ने मुझे निकाल दिया तो...’
‘आप ही नहीं। कोई भी क्या कर लेगा, क्या सभी मिनिस्टर बन जाएंगे? सभी को धूल फांकनी होगी।’
यही तो वह कारण है, जिससे स्वयं सेवी संस्थाओं के कर्मचारी विरोध नहीं करते, फिर पिछले साल निखिल दा को नहीं निकाल फेंका, आखिर उनकी गलती क्या थी? यही न, कि वे मंत्री जी से भिड़ गये थे... क्या कर लिए हम लोग मंत्री जी का? अमरेश ने आक्रोश में सभी को फटकारा...
दफ्तर में खामोशी पसर चुकी थी। सारे कर्मचारी मंत्री जी को भला-बुरा कह रहे थे...‘साला! इतने सालों से सुधा से जुड़ा रहा फिर भी उसे रहम न आई...श्छिरू बहुत ही घिनौना आदमी है्य निखिल दा को सलाम करता था, केवल फन्डों के लिये’
खैर यह सब मौखिक रूप से कर्मचारियों में चल रहा था पर कोई बिल्ली के गर्दन में घंटी बांधने के लिए तैयार न था। अमरेश ने हड़ताल की संभावनाओं का टोह लिया पर कौन अपनी नौकरी गंवाये.. कैसे चलेगी रोजी...यह बहुत बड़ा सवाल था जो दफ्तर के लोगों को गूंगा बना चुका था, जो भी खुसुर-फुसुर थी सब बच-बचा कर, कहीं मंत्री जी को कुछ मालूम न हो जाये।
अमरेश परेशान था... सुधा से मिलने के लिए। सुधा अपने घर पर भी नहीं थी...कहां थी, कोई सूचना नहीं। उसने कहीं दूसरी जगह तो ज्वाइन नहीं कर लिया? कई तरह के सवालों में उलझा अमरेश कुछ निश्चित न कर पा रहा था आखिर करे क्या? कैसे मिले सुधा से?
आज की विकसित सूचना तकनीक के युग में भी अमरेश इतना पीछे है कि उसके पास साधारण फोन भी नहीं सो वह किसी का फोन नम्बर पूछता ही नहीं। दफ्तर में भी सुधा का नम्बर किसी को मालूम नहीं...तभी उसे ख्याल आया कि प्रोजेक्ट एरिया का फोन नम्बर तो होगा...। धनदाता संस्थाओं के प्रोजेक्ट एरिया डाइरेक्टरी को अमरेश ने खोला...जो एक खूबसूरत जिल्द वाली मोटी किताब थी...
संयोग ठीक था, सुधा का फोन नम्बर मिल गया... हां उसका मोबाइल नम्बर उसमें दर्ज नहीं था। अमरेश को थोड़ी राहत मिली... उसने दफ्तर से ही सुधा का फोन मिलाया...सुधा वहां नहीं थी, एक हफ्ते से बाहर है, कब तक आएगी? कुछ निश्चित नहीं...
अमरेश थके मन से घर वापस आया... सुधा को निकाले जाने की खबर से उसकी पत्नी भी आहत हुई। उसने समझाते हुए कहा।
‘कहीं तुम ऐसा-वैसा न करना कि निकाल दिये जाओ... तुम्हारी तो पूरी गृहस्थी है, सुधा का क्या है, अकेली है, फिर कहीं शादी हो जाएगी, उसे काहे की चिन्ता!’
सुधा के निकाले जाने के बाद दफ्तर में क्रिया की जो प्रतिक्रिया थी, वह कुछ ऐसे ठंडी हुई कि कहीं भी छींटा मारो, कुछ छन-छनाछन नहीं, लोहे की तरह दफ्तर के गर्म हुए लोग नौकरी जैसी बर्फ की सिल्ली के नीचे दबे पड़े थे। केवल अमरेश था जो सुधा की टोह में था, पर सुधा का कहीं अता-पता नहीं। वह भी थक हार कर दफ्तर के काम में जुट गया। संस्था के मंत्री जी पर तो सुधा के निकाले जाने का कुछ भी असर नहीं था, वह किसी फनियल की तरह अपनी रौ में था-विदेशी गाड़ी से दफ्तर आता, विदेशी तम्बाकू पीता तथा विदेशी धन दाताओं को पटाने की चिन्ता में गर्दन तक डूबा रहता।
लगभग बीस दिन गुजर गये। अचानक एक रात... अमरेश रात का खाना खाकर सोने की तैयारी में था तभी बाहरी दरवाजे पर कुछ खट-खट हुई... जैसे कोई दरवाजा खुलवाना चाहता हो।
अमरेश ने दरवाजा खोला... बाहर बेहाल सी, अस्त-व्यस्त सुधा खड़ी थी। उसके साथ एक नौजवान लडका धा, देखने में शालीन और सभ्य दीख रहा थाकृदोनों जल्दी में थे, वे सीधे दरवाजे के भीतर घुसे...
‘दरवाजा बन्द कर लीजिए’ नौजवान लडके ने आग्रह किया। 
कुछ न कुछ गड़-बड़ है, अमरेश ने सोचा और दरवाजा बन्द कर लिया। गड़बड़ तो था ही...अमरेश ने पत्नी से चाय लाने के लिए बोला ही था कि सुधा ने रोक दिया।
‘नहीं अमरेश बाबू कुछ नहीं, हम सिर्फ आपसे बात करने आये हैं, हमें रात भर आपके यहां रुकना हैकृभोर में तीन बजे हम निकल जायेंगे, मेरे घर पर पुलिस का पहरा है सो वहां जा नहीं सकती’ 
अमरेश समझ नहीं पा रहा था आखिर ऐसा क्या हुआ कि सुधा खुद को छिपा रही है, श्उसके घर पर पुलिस का पहरा है...्य इसके पहले कि अमरेश सुधा से जानकारी हासिल करने के लिए पूछता...
सुधा ने खुद बताना शुरू किया...
सुधा ने जो बताया वह किसी फिल्मी कहानी की तरह था, छोटे छोटे टुकड़ों में शूट किया गया यानि कि आदिवासी बनाम जंगल विभाग के झगड़े में आदिवासी आगे निकल गये... जंगल विभाग आदिवासियों की जमीन पर गढ्ढा खुदवाता, पेड़ लगवाता, आदिवासी गढ्ढड्ढा पाट देते, पेड़ उखाड़ फेंकते... एक दिन जंगल विभाग ने धांय-धांय किया... आदिवासी भाग खड़े हुए। एक सप्ताह बाद फिर जंगल विभाग ने धांय-धांय किया...कुछ इस तरह जैसे विज्ञापन कर रहे हों कि सहनशील व आज्ञाकारी नहीं बनोगे तो मारे जाओगे... पर इस विज्ञापन का असर नकारात्मक हुआ...
दूसरी तरफ से भी उसी सुर व तान में धांय-धांय हुआ। यह धांय-धांय किस तरफ से हुआ, आदिवासियों को नहीं मालूम। सुधा उस दिन अपनी संस्था के मुख्यालय पर थी, उसने घटना का पूरा विवरण मंत्री जी को बताना आवश्यक समझ, उनसे मिलना चाहा, पर मंत्री जी ने साफ मना कर दिया कि वह नहीं मिलेंगे।
फिर सुधा ने मंत्री जी से मोबाइल से संपर्क साधा, मंत्री जी ने मोबाइल आफ कर दिया। इधर सुधा अपने प्रोजेक्ट एरिया की घटी घटना सुन कर परेशान थी। दस गरीब आदिवासियों को जंगल विभाग के रेंजर की हत्या में पकड़ा जा चुका था। हत्यारों में सुधा का भी नाम एफ. आई. आर. में था... दूसरे दिन किसी तरह सुधा मंत्री जी से मिल पाई...
‘मैंने तुमसे कहा था न कि हाईकोर्ट में मुकदमा न दाखिल करो। मुकदमा दाखिल हो जाने तथा आदिवासियों को स्थगन मिल जाने के बाद भी कहा था कि सुलह कर लो, उस दिन बेचारा डी.एफ.ओ. उस विधायक के साथ कितना परेशान था। सारा खर्चा भी तो दे रहा था।अब भुगतो अकेले, ‘तुम वहां का प्रोजेक्ट बन्द कर दो, यह लो निरस्तीकरण का आदेश’ 
मंत्री जी ने आदेश थमाया फिर कहीं फुर्र हो गया। सुधा को बीच में रोक कर अमरेश ने पूछा...‘
आगे क्या हुआ?्य पुलिस मुझे तलाश रही है, मंत्री जंगल विभाग व जंगल माफियाओं से लाखों ऐंठ चुका है, मुझे अपनी संस्था से निकाल दिया है। मैं कुछ दिनों में समर्पण कर दूंगी पर मेरा समर्पण इतना आसान न होगा अमरेश बाबू!’
इतना कहते हुए सुधा के चेहरे पर रोबीली चमक पसर गई थी... साफ-साफ अमरेश ने देखा। सुधा के साथ वाला नौजवान अन्त तक खामोश था... उसकी खामोशी हालांकि रहस्यमय थी पर अमरेश इस बाबत क्या पूछे?
रात काफी बीच चुकी थी। घड़ी की सूई दो पार कर रही थी। तीन बजे सुधा को निकलना था। समय का ख्याल करके अमरेश ने किचन में जाकर चाय बनाया, साथ में कुछ नाश्ता भी लाया। घर में उसकी पत्नी तथा बच्चे सभी नींद में थे, किसी को जगाना ठीक भी न था।
सुधा को चाय थमाते हुए अमरेश ने पूछाकृ
‘सुधा ईमानदारी से बताना, ऐसे संकट में, तुम्हारे लिए मैं क्या कर सकता हूँ...’
‘कुछ नहीं अमरेश बाबू!्य अभी हमें भी कुछ नहीं करना, पहले तो मैं अदालत में समर्पण करूंगी फिर....’
नौजवान लडके की तरफ इशारा करते हुए सुधा ने उसका परिचय अमरेश से करवाया...श्ये हैं कामरेड विपिन, पहले मल्टीनेशनल में इंजीनियर थे और अब, बहरहाल इसे छोडि़ए ये मेरे समर्पण के बाद वापस लौट आएंगे, आपके पास। इनकी मुलाकात निखिल दा से जरूर करवा दीजिएगा, वो इन्हें नहीं जानते...। यह कह कर सुधा अपना बिखरा सामान समेटने लगी, ...और नौजवान लडका भी जाने की तैयारी करने लगा।
अमरेश उन्हें छोडने के लिए रेलवे स्टेशन तक गया... ट्रेन आई और चल दी, अमरेश ट्रेन का जाना देखता रहा। घर वापस लौटते समय वह सोच रहा था कि आखिर निखिल दा से सुधा का क्या काम हो सकता है?
निखिल दा तो अब अन्डर ग्राउन्ड हो गए हैं, तो क्या सुधा का गोत्र निखिल दा वाला ही है। अच्छा, अभी विपिन तो आएगा ही। फिर किसी सपने ने अमरेश को डरा दिया कि मानवाधिकार जन समिति का विशाल कार्यालय भवन वर्ल्ड सेन्टर की तरह धुंधआ रहा है, हर ओर आग ही आग।

                                         प्रस्ताव

अमरेश दिल्ली गया और खाली हाथ लौट आया। खाली हाथ लौटना उसके लिए अफसोस की बात न थी श्मेरा क्या, मुझे तो सिर्फ वेतन ही मिलता है, फन्ड मिले न मिले, इसे मंत्री जी जानें्य फन्ड तो शायद मिल भी जाता, उसका मित्र मंत्री सचिव ऐसा ही बोल रहा था पर शिकायत हो गई कि मानवाधिकार जन समिति ने केन्द्रीय सरकार वाली पार्टी के दो सांसद प्रत्याशियों को हरवा दिया जो विन्ध्य पर्वत माला क्षेत्रों से खड़े थे।
अमरेश जानता था कि डी. बी. और वर्तमान सांसद मधु निहलानी एक दूसरे से रस्सी माफिक गुंथे हुए हैं। ब्यूटी पार्लर से स्नो, पाउडर या परफ्यूम लगवा कर मधु निहलानी निकलती और सुगन्ध तथा ताजगी डी. बी. के चेहरे से फूटती। डी. बी. ने मधु निहलानी को जितवाने का काम किया था।
मधु निहलानी एक आकर्षक देह यष्टि वाली चित्ताकर्षक महिला। इतना तो बहुतों के पास हो सकता है, पर मधु निहलानी के पास यह समझ भी किसी जादुई ताकत की तरह थी कि देह का दिमाग से यदि उचित सन्तुलन हो, फिर तो कुछ भी हासिल करने का प्रयोग किया जा सकता है।
मधु निहलानी जे. एन. यू. की प्रतिभावान उत्पाद थी, वहां उसने अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों पर शोध किया था... खास तौर से अमेरिकी अर्थ-नीति एवं राजनीति के बारे में। इसी शोध कार्य के सिलसिले में मधु निहलानी की जान-पहचान डी. बी. की पत्नी नन्दिता से हुई थी। फिर डी. बी. से उसकी घनिष्टता बढ़ी। यह सब कुछ ऐसे हुआ जैसे डी. बी. और मधु निहलानी एक दूसरे के लिए ही बने हों। घनिष्ठता किन-किन गलियारों को पार करते हुए प्रेम की अतल गहराई में जा घुसी, यह सब मधु निहलानी के लिए संस्मरण है तथा डी. बी. के लिए विजेता पुरुष का प्रेम-कौशल।
वैसे डी. बी. को यह नहीं मालूम कि मधु-निहलानी देह-संबंधों को स्त्री की स्वतंत्रता का हक मानती हैं या नहीं। उनके बीच यह सिल-सिला कुछ इतने स्वाभाविक ढंग से चला कि दोनों हम-बिस्तर हो गये तथा एक दूसरे की तलाश अपनी-अपनी देह सीमाओं में करने लगे, वैसे यह सच था कि उन दोनों के रिश्तों में पहले देह नहीं थी, वह कहीं दूर खड़ी थी किसी दर्शक माफिक... दूर से ही नहीं, बहुत दूर से देह उन्हें देखती तथा जरूरत भर का संवेदन व सम्मोहन मथती। वह तो कुछ ऐसा हुआ कि देह ने दोनों को मथना शुरू कर दिया। दरअसल हुआ यह कि नन्दिता अमेरिका रहने तथा नौकरी करने के लिए चली गई, जब वापस भारत आती तो कलकत्ता रहती अपने जमींदार बाप की हवेली में। वह हवेली की अकेली मालकिन थी।
नन्दिता के भारत आने पर डी. बी. कलकत्ता जा पहुंचता। उन दिनों वह दिल्ली में रहा करता था तथा अमेरिकी फन्डरों के लिए लाइजनिंग किया करता था। पहले वह थोक के भाव में रूसी साहित्य का अंग्रेजी व हिन्दी में अनुवाद भी किया करता था, गोया उन दिनों उसकी सोच में यह नहीं था कि वह एक दिन बहुत बड़ी स्वयं-सेवी संस्था का सर्वेसर्वा बन जाएगा।
डी. बी. सदैव से महिला, मदिरा व मैथुन को थिसिस, सिन्थेसिस व एन्टी थिसिस की तरह परिभाषित करने की क्षमता व उर्जा वाला अद्भुत व्यक्ति रहा है, सो वह खाओ, पीओ, मौज करो से ऊपर उठकर सन्त बनने से काफी गुरे$ज करता, हालांकि एक बार उसने महसूस किया कि उसको रजनीश के पूना स्थित आश्रम में जाना चाहिए। पर किन्ही कारणों से वह आश्रमी आध्यात्म सुख से वंचित रह गया जो उसे बहुत बाद में हासिल हो सका।
मधु निहलानी दिल्ली में थी, इसे संयोग ही कहा जाएगा कि डी. बी. भी दिल्ली में था ...और उधर नन्दिता अमेरिका में। साल में दो बार भारत आती तो कुछ दिन दिल्ली प्रवास के बाद कलकत्ता फिर अमेरिका लौट जाती... इस बीच डी. बी. मधु निहलानी के साथ काम-क्रीड़ा के बाबत किसिम किसिम की खोज करता। नन्दिता यह सब जानते हुए भी चुप रहती, मानकर चलती कि देह नहीं घिसती, घिसता दिमाग है तथा डी. बी. का दिमाग कभी भी देह के घिसाव से प्रभावित नहीं हो सकता, इसलिए क्या फर्क पड़ता है। फिर यह भी था कि वह स्त्री पुरुष के रिश्तों में कुछ बाएं-दाएं होने की संभावनाओं को सहज रूप से स्वीकारने वाली महिला थीकृपढ़ी लिखी, उच्च वेतनभोगी, अच्छी तरह से अपना भला-बुरा समझने वाली। इस प्रकार से डी. बी. तथा उसके बीच पहले तो सब कुछ सामान्य ढंग से चलता रहा पर बाद में...
बाद में तो कुछ ऐसा हो गया जिसे होनी मानकर टाल सकने की क्षमता, नन्दिता में न रह सकी। नन्दिता कलकत्ता में थी। दो दिन पहले अमेरिका से लौटी थी। इस बीच वह एक बच्चे की माँ भी बन चुकी थी। डी. बी. एक दिन नन्दिता के पास कलकत्ता जा पहुंचा। रात काफी चढ़ चुकी थी, जब कि उसे दिन में ही कलकत्ता पहुंचना था। उसकी जुबान लडखड़ा रही थी, उसके हर शब्द दारू में सने थे, जो बोलता उसका सिर्फ भावार्थ ही निकाला जा सकता था, किसी कविता का मर्म समझने जैसा। नन्दिता चकित थी, आखिर ऐसा कब तक चलेगा?
अब तो डी. बी. अकेला नहीं, बाप भी है, फिर भी यह तमाशा। सीमाहीन होकर असीम हो जाना यह तो ठीक नहीं, तुम्हें घर गृहस्थी नहीं संभालनी, न संभालो। पर यह क्या कि तुम मुझे सेक्स कमोडिटी बना लो, जब चाहो भोगो। तुम्हें अपनी मुक्तता प्यारी है फिर मैं ही पराधीनता क्यों स्वीकारूँ...? नन्दिता हालांकि तनाव में थी पर ऐसा नहीं था कि वह निर्णय लेने की व्यवहारिक या आचार गत दुविधा में थी, सो वह डी. बी. को देखते ही उबल गई... उसने डी. बी. से निरूसंकोच कहा बिना किसी लाग लपेट के...
श्डी. बी. अब मैं यह सहन नहीं कर सकती कि तुम मेरा उपयोग सिर्फ मन-फेर के लिए करो, इसलिए यह जरूरी है कि तुम अपना सामान समेटो तथा यहां से फूट लो, यह घर, यह गृहस्थी मेरी है, अब इस पर तुम्हारी परछाईं तक नहीं पडनी चाहिए।्य
डी. बी. नन्दिता के हवेलीनुमा मकान के ड्राइंग रूम में दाखिल ही हुआ था कि यह सब होने लगा, जिसके लिए डी. बी. मानसिक रूप से तैयार भी न था। डी. बी. मशहूर दार्शनिक सात्र का प्रेत बना यह सब सुनता रहाकृ
‘सात्र उसकी जगह पर होते तो क्या करते?’ हवा में से उड़ता एक गंभीर सवाल कहीं से आया उसे सहला कर ओझल हो गया।
‘रात काफी हो चुकी है, इस समय निकलना समयोचित न होगा, रात भर मुझे यहीं रहने दो, सुबह यहां से बिदा हो लूंगा,’ 
डी. बी. संवेदनाओं की आद्रता में भीग चुका था, किसी तरह इतना भर कह पाया बिना विचार किए कि नन्दिता रात भर ठहरने की अनुमति देगी या नहीं।
नन्दिता पहले तो चुप रही, पर बाद में अन-मने भाव से बोली...
‘ठीक है यही ड्राइंग रूम में सो जाओ, लेकिन ऐसा करना कि सुबह मुझे तुम्हारा चेहरा न दिखाई पड़े’ फिर नन्दिता अपने कमरे की तरफ चली गई।
डी. बी. सुबह नन्दिता के घर से निकला। नन्दिता का घर छोड़ते समय ज्यों ही डी. बी. अपनी कार में सवार हुआ, ड्राइवर ने कार स्टार्ट की, ठीक उसी समय डी. बी. ने सात्र की परछाई देखा जो एक अजीब आकृति थी। अजीब इसलिए कि परछाईंका आधा चेहरा एम. एन. राय जैसा दिखता था तथा आधा सात्र जैसा, नीचे की धड़ किसी सुडौल देह वाली मादक महिला की थी, थर-थर कांपती हुई। डी. बी. ने सिगरेट जलाया, धूंआ उगला, भला हो धूंए का कि वह घृणित व डराऊ परछाई गायब हो गई।
डी. बी. दिल्ली लौट रहा था वहां मधु निहलानी थी, यह एक डार से दूसरी डार पर लटकना भर नहीं था। रास्ते में वह अपनी महागाथा का दुखान्त लगातार देखता रहा। एक ऐसा अन्त जिसका प्रारम्भ ही एक नाटक था। वह रमेशरा बन कर नन्दिता के बाप के यहां काम कर रहा था। डी. बी. और नौकर क्या यह संभव था? वह कभी किसी की नौकरी करता, आखिर उसे इस नौकरी की जरूरत क्या थी? क्या पेट भरने के लिए या किसी अभिनव गाथा की रचना के लिए कहा जाना चाहिए कि डी. बी. के पीछे उसके द्वारा जनित कहानियां चल रही थीं।
नन्दिता का बाप बहुत बड़ा जमींदार था। उसने निजी सेना का गठन किया था। इस सेना का उपयोग वह जागरूक मजदूरों व दलितों के दमन के लिए करता। दलितों, मजदूरों का संगठित होना तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना उसे बुरा लगता, फिर वह धन व तन बल के सहारे उनका दमन करवाता। शासन-प्रशासन उसका कुछ भी न बिगाड़ पाता। वह विधायकों व सांसदों के उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा करवाता, बूथ कैप्चरिंग के सहारे उन्हें जितवाता। उन दिनों डी. बी. दलितों मजदूरों का अग्रदूत था, उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला। उसे एम. एन. राय व माओ ठीक लगते तथा वह विश्वास करता कि किसानों, मजूरों का जनवादी मोर्चा ही क्रान्ति की सफलता का मानक हो सकता है। नन्दिता के बाप को रास्ते से हटाना संगठन-संचालन के लिए अनिवार्य था तथा खुद डी. बी. के लिए भी क्योंकि डी. बी. ही मजूर वाम संगठन का अगुआ था... गनीमत थी कि उसकी पहचान जमीनदार सेना को न थी, वे सिर्फ डी. बी. का नाम ही जानते थे पर डी. बी. है कौन? कोई न जानता।
रहस्यमय डी. बी. के लिए रमेशरा का नाम ओढना आसान था। फिर जमींदार को हटाना उससे भी आसान। यहीं से डी. बी. के जीवन में नन्दिता का नाटकीय प्रवेश होता है फिर बाद में अन्त भी नाटकीय।
दिल्ली वापस आकर डी. बी. ने मधु निहलानी से देहाध्यात्मिक रिश्ता बना कर इस लक्ष्य की सफलता हासिल कर लिया कि वह मुक्त है और हमेशा मुक्त ही रहेगा। नन्दिता से पहले प्रेम, फिर विवाह का रिश्ता बनाना उसकी बहुत बड़ी गलती थी-भला हो नन्दिता का, जो उसने अलग रहने का फैसला किया, जबकि यह काम उसे करना चाहिए था।
नन्दिता से डी. बी. का अलगाव, मधु निहलानी से स्थापित होने वाले डी. बी. के रिश्तों का हालांकि, प्रारंभ नहीं था। फिर भी इतना तो था ही कि सारा कुछ 
छिप-छिपाकर था। मधु निहलानी भी बच-बचा कर डी. बी. से मिलती, उन दोनों के बीच यह जो रिश्तों के छिपाव व बचाव की बातें थीं शायद सामाजिक तानों-बानों की जटिलताओं के कारण थीं, हालांकि डी. बी. हमेशा प्रयास करता कि मधु निहलानी परिन्दों की तरह आसमान में उड़े, चहचहाये और फुदके।
पर मधु निहलानी के लिए खुले आकाश में उडना सहज न था। वह समय समय पर झीना परदा लगा लेती, फिर मुस्कुराती या गुनगुनाती। मधु निहलानी का गुन-गुनाना एक ऐसी तकनीक थी जो डी. बी. को सब कुछ न्योछावर कर देने के लिए प्रेरणा बन जाती-
यह वही प्रेरणा थी जिसने डी. बी. को मधु निहलानी का गुलाम बना दिया था, वह जैसा कहती वैसा ही डी. बी. करता। डी. बी. को आधार बना कर मधु निहलानी ने पहले दिल्ली के एक कालेज में नौकरी हासिल की, वह वहां प्रवक्ता बन गई, फिर सांसद। वैसे प्रवक्ता तो वह खुद भी बन सकती थी। लेकिन उसकी टेक्नोलाजी इस बाबत पुरुष आधारित थी...यानि एक ऐसा पुरुष जिसका रिश्ता कालेज के प्राचार्य से या प्रबंधक से हो-रिश्ता न भी हो फिर भी इतना तो ही ही कि किसी पुरुष के जरिए ही वह संपर्क बनाये। शोध-कार्य करते समय से ही मधु निहलानी अपनी प्रगति के बारे में सचेत व तार्किक रही है तथा योजनाबद्ध भी। डी. बी. भी मधु निहलानी की योजना का एक अनिवार्य अनुच्छेद था। मधु निहलानी जानती थी कि कालेज का प्रबन्धक एक पुराना कामरेड है। वामपंथी संगठनों पर एक बार जब सरकारी प्रतिबन्ध लगा था उस समय कालेज के प्रबन्धक को गिरफ्तार भी किया गया था। डी. बी. का रिश्ता उससे जरूर होगा...।
मधु निहलानी के अनुमान गलत नहीं होते-सच निकला कि डी. बी. तथा कालेज के प्रबंधक कम से कम एक दूसरे को पूरी तरह जानते हैं-यह बात अलग है कि डी. बी. वाम पंथ का यांत्रिक कैडर रहा है तथा कालेज का प्रबंधक चाहे जो हो कम से कम यांत्रिक तो नहीं था। वह वाम पंथ को भारतीय परिवेश के तहत प्रसारित प्रचारित व लागू करना चाहता। इसी लाइन भेद के कारणडी. बी. वाम पंथ की दूसरी कतार का था...
डी. बी. वाम पंथ के चाहे जिस कतार का था, कालेज के प्रबंधक ने आपसी मत भेदों का उजागर नहीं होने दिया, उसने डी. बी. का स्वागत सत्कार किया, कुशलक्षेम पूछा तथा मौजूदा पारटी लाइन के बारे में जानना चाहा।
डी. बी. ने सारा कुछ सहजता से बताया बिना किसी भेद-भाव के कि वह अब पारटी में है ही नहीं। पारटी से उसका मोहभंग हो चुका है तथा अब वह जनता को जागरूक व शिक्षित बनाने का काम कर रहा है ताकि जनता अपने पैर पर खड़ी हो सके, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सके।्य
‘गोया आपने कोई एन. जी. ओ. बना लिया है?’ बहुत ही सरलता से कालेज के प्रबंधक ने डी. बी. से पूछा था। जिसका उत्तर सिर्फ हां में था। कछ क्षण के लिए प्रबन्धक किसी खामोशी में डूब गया था, मानो वह कुछ तलाश कर रहा हो कि समाजवाद से एन. जी. ओ. बाद तक की यह यात्रा मार्क्स के किन भूले-बिसरे सूत्रों पर आधारित है? फिर प्रबंधक ने कुछ पूछा नहीं था।
बाद में डी. बी. ने ही मधु निहलानी का परिचय एक शोधार्थी छात्रा के रूप में कराया था, परिचय व शोध का विषय सुनकर प्रबंधक हंसा था... श्अब यही होगा, सारे शोध अमेरिकी साम्राज्यवाद पर ही होंगे, कोई भी ईराक पर हुए हमले तथा बमों के जरिए नष्ट की जा रही राष्ट्रीयताओं पर शोध नहीं करेगा!्य
कालेज के प्रबंधक से डी. बी. तथा मधु निहलानी की बात-चीत अनुमान से लम्बी थी जिससे साबित था कि प्रबंधक के पास समय के दूसरे उपयोग लगभग शून्य हैं, दूसरी तरफ डी. बी. और मधु निहलानी दोनों पूर्व योजना के तहत समय का उपयोग कर रहे थे। डी. बी. ने उचित अवसर निकाला तथा प्रबंधक से आग्रह किया कि मधु जी को आपके निर्देशन की आवश्यकता है जिससे शोध कार्य में वाम पंथी विचारों को भी समाहित किया जा सके।
प्रबंधक ने हालांकि पहले ना, नू किया, फिर इधर उधर से एक दो बार मधु निहलानी का नेत्र स्नान किया फिर मुस्कराया तथा धीरे से बोला...
‘अरे भाई! मैं इस लायक नहीं, यह कार्य तो कोई प्रोफेसर ही कर सकता है!’
कहते हैं आग्रह व निवेदन में ताकत हो तो कुछ भी असंभव नहीं। प्रबन्धक के लिए ऐसे में मुश्किल था डी. बी. और मधु निहलानी का आग्रह ठुकरा पाना। सो यह निश्चित हो गया कि प्रबन्धक जी मधु का निर्देशन करेंगे। मधु का शोध कार्य एक दिन पूरा होना था, पूरा हुआ तथा प्रबन्धक की तरफ से मधुर आश्वासन भी कि यदि वह उनके कालेज में प्रवक्ता बनना चाहे तो उन्हीं खुशी होगी। खास तौर से उसके लिए वे एक नये पद का सृजन करवाने का प्रयास करेंगे।
मधु निहलानी अपनी योजना की सफलता की खुशियां पीने में सराबोर थी दूसरी तरफ डी. बी. भी कम खुश नहीं था क्योंकि मधु निहलानी की सारी खुशियों में उसका साझा था। यह क्रूर सच था कि मधु निहलानी अपनी दैहिक त्वचा का जिस बारीकी से अपनी तरक्की के लिये प्रयोग कर रही थी, उस तरफ डी. बी. का ध्यान नहीं था। वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मधु निहलानी किसी विशेष व पूर्व लक्षित योजना के तहत सारा कुछ कर रही है। डी. बी. को तो मधु के सांसद बन जाने के बाद भी कुछ न मालूम हो सका। डी. बी. को सिर्फ इतना मालूम था कि मधु सांसद का चुनाव लडना चाहती है पर किस पारटी से, यह मालूम नहीं था, न ही अपनी विशेष योजना के बाबत मधु निहलानी ने डी. बी. को कुछ बताया था...
डी. बी. को कुछ विशेष बताने की आवश्यकता मधु निहलानी को न थी। क्योंकि मधु निहलानी को मध्य भारत के प्रदेशों से चुनाव लडना था, इन क्षेत्रों पर वाम पंथी संगठनों का कोई खास प्रभाव न था सो उसे उन जातिवादी राजनीति करने वाले दलों को माध्यम बनाना था जिससे उसकी जीत सुनिश्चित होती।
राजनीति की विशेष गणित में मधु निहलानी पूरी तरह से अपरिपक्व थी। उसकी यह अपरिपक्वता एक ऐसी अयोग्यता थी जो उसे कभी भी सांसद न बनने देती लेकिन उसे अपनी अयोग्यताओं को फलांगना था।
खुद को योग्य साबित करा लेना यह टेढ़ा काम होता है। इस टेढ़े-पन का एहसास मधु निहलानी को भी था। उस समय केन्द्र में मिली जुली सरकार आरुढ़ थी। उसमें एक छोटी पार्टी के मंत्री थे जो कभी समाजवादी विचार धारा के थे। उनका उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में खासा प्रभाव था। उनके नाम व काम पर लोग चुनाव जीत जाते थे फिर उनका हिन्दू मत वादी पार्टी से चुनावी समझौता भी था मधु निहलानी ने मंत्री जी से संबंध साधा।
संबंध तो संबंध होता है मन के आर पार वाला कुछ-कुछ देहातीत भी। मंत्री देहाती दिल-दिमाग का, छुई मुई परियों की रूप कला व गाथा से कोसों दूर रहने वाला, उसे सुनहरा अवसर मिला फिर तो वह अवसर की सारी मर्यादाओं के निर्वहन में ऐसा डूबा कि उसे दुनिया के हर छोर से सुगन्ध ही सुगन्ध सूंघने को मिलती। वह दिन में भी चांद देखने लगा। रात ऐसी हसीन होती कि उसे जीवन जीने की कलाओं को नये सिरे से परिभाषित करना पड़ता...गोया उसके हर समय में मधु निहलानी की दैहिक कविता का कब्जा हो गया।
पर होनी तो कुछ दूसरी थी। गठबंधन की सरकार वैसे ही मजबूत गांठों से बंधी नहीं होती। कथित मंत्री के साथ सिर्फ तीन सांसद थे। वे तीनों भी हमेशा मंत्री बनने के जुगाड़ में रहा करते थे, गठबन्धन की बड़ी पार्टी तो हिन्दू मतवाद की एक खोल थी तथा छोटे-छोटे दलों में फूट डालने में माहिर थी उसने आग में थोड़ा डीजल डाला... फिर तो फूट होनी ही थी। बेचारे मंत्री ने अपने दल में होने वाले फूट का अनुमान करके, केन्द्रीय मत्रिमंडल से अपने दल का समर्थन खींच लिया, सरकार तो नहीं गिरी, पर यह हुआ कि मंत्री अलग-थलग पड़ गया ठीक साल भर बाद नया आम चुनाव होना था मधु निहलानी गहरे चिन्तन में डूब गई।
अब क्या होगा? मंत्री के साथ रहकर तथा उसकी पार्टी से टिकट लेकर चुनाव नहीं जीता जा सकता। मधु निहलानी परिस्थितियों के मूल्यांकन में कमजोर नहीं थी। उसने तत्काल अपनी पीठ मंत्री की तरफ घुमा दिया। मंत्री बेचारा मधु निहलानी की पीठ पर क्या लिखता? वहां तो वैसे भी पहले से ही काफी कुछ लिखा हुआ था। मधु निहलानी की पीठ नीति-निर्देशक तत्वों व कुछ प्राकृतिक अधिकारों की किसी किताब जैसी थी जिसे पढना तो आसान था पर अमल करना निहायत कठिन था। सो मंत्री भी अपना दुर्दिन मान कर खामोश हो गया कि बुरे दिनों में अधिक छटपटाना और बुरा हो सकता है। दूसरी ओर मधु निहलानी इस परिघटना को महज घटना मान कर दूसरे जोगाड़ में थी...
अब मधु निहलानी सीधे तौर पर उन दलों को तजबीज रही थी जिनके पास पारंपरिक वोटों का सुनिश्चित खजाना हो। इस सिलसिले में वह मजूरों व दलितों वाली पार्टी से साठ-गांठ बैठाने लगी। इसी दौरान एक ऐसा अवसर आया जिसने मधु निहलानी को दलित चिन्तक के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया...
दिल्ली में दलित साहित्यकारों का एक सम्मेलन हुआ। मधु निहलानी ने एक बड़े दलित चिन्तक को पटाया, उसका बहुत बड़ा कद था, इतना बड़ा कि उसके कद में दूसरे विलीन हो जाते। वह जो कहता मंत्रवत कहता तथा ब्राह्मड्ढणी संस्कृति को साफ-साफ नकारता। इस काम के लिए उसे किसी दूसरे शास्त्र की आवश्यकता न पड़ती। वह अपने जीवन के विगत को बताता, कभी खुद के बारे में, कभी अपने घर परिवार के बारे में। उसका जीवन ही ऐसा दलित शास्त्र था जो ब्राह्मड्ढणी जाति संस्कृतिके अभिनव अत्याचारों का खुलासा करता। उसके जीवन में ब्राह्मणी संस्कृति का छुआ-छूत, जातिभेद, गरीबी, शोषण, बलात्कार, यह सारा कुछ साफ साफ घटित हुआ था। वह खुद भी शिकार व्यक्ति था। मधु निहलानी ने उस दलित चिन्तक में एक ऐसे व्यक्ति को देखा जो सिर्फ दलितों की भलाई व कल्याण के लिए ही बना हो।
मधु निहलानी की तरकीब काम कर गई दलित चिन्तक ने उसे सम्मलेन में बोलने का मौका दिया। बस इतना ही मधु निहलानी चाहती थी क्योंकि उसे अपनी कला पर यकीन था दरअसल ऐसा था भी। मधु निहलानी समय तजबीज कर, जरूरत समझ कर कभी बर्फ में सनी भाषा का प्रयोग करती तो कभी उसी भाषा को आग की भट्टी में तपा कर निकालती। युवकों से संबोधित होने का उसका तरीका भी खूब था। वह युवकों के लिए कुछ खास शेरों व शायरी का उपयोग करती तथा भाषा पर उन्माद व मादकता का लेप लगाती। फिर तो युवकों के जोशीले मन में समाज बदलने का जज्बा तैरने लगता। वे वाह-वाह करते हुए तालियां बजाने व नाचने लगते।
कहने को तो वह दलित साहित्यकारों, पत्रकारों, चिन्तकों का ही सम्मेलन था, पर था पूरी तरह से राजनीतिक। राजनीतिक इस अर्थ में कि सम्मेलन की सफलता की चहुंमुखी कोशिश में नामी दलित नेताओं की हिस्सेदारी थी-दलित नेताओं की हिस्सेदारी का कारण था, कारण यह कि वे खुद को डा. अम्बेडकर का प्रायोगिक रूप मानते वे मान कर चलते कि डा. अम्बेडकर तो कभी सत्ता पर पूर्णतरू काबिज न हो सके, पर वे तो अपनी अपनी सरकारें चला रहे हैं उनमें तथा डा. अम्बेडकर में फर्क इतना ही है कि वे चिन्तक तथा लेखक नहीं जैसा कि अम्बेडकर थे। दलित नेताओं के लिए चिन्तक तथा लेखक न होना एक ऐसी कमी थी जो शायद उन्हें महान न बनने देती सो वे दलित साहित्यकारों की परछाइयों तक को भी पूजने के लिए तैयार रहते तथा कामना करते कि उनके राजनीतिक जीवन पर कोई बढिया दलित साहित्यकार किताब लिखे। इस पूर्व लक्षित कामना की पूर्ति के लिए वे नामी-गिरामी दलित साहित्यकारों के अगल-बगल फेरे लगाते, इसीलिए वे इस सम्मेलन में तन-धन व मन के साथ सक्रिय थे।
दलित नेताओं का अपना हित पूरा हुआ कि नहीं, वे जाने, पर मधु निहलानी अपने लक्ष्य में सफल हो गई। उसके भाषण को दलित क्रान्ति का घोषणा पत्र माना गया तथा एक नामी दलित नेता द्वारा प्रस्तावित किया गया कि वह उनकी पार्टी में शामिल हो जाय। यही तो चाहिए था मधु निहलानी को।
मधु निहलानी के स्वप्न में भी यह बात न थी कि दलितों को सत्ता की राजनीति तक पहुंचाने वाला दलित नेता अपने दल में शामिल होने के लिए स्वयं प्रस्ताव देगा, जबकि उसकी पार्टी के टिकट का भाव वैसे ही काफी ऊँचा था।
दलित नेता द्वारा पार्टी में शामिल होने व चुनाव लडने का प्रस्ताव भला मधु निहलानी कैसे न स्वीकारती अब तो सिर्फ चुनाव लडना था, जोरदार व असरदार भाषण देना था फिर संसद में पहुंच कर वह सुगन्ध फैलाना था जो न केवल पक्ष-विपक्ष के सांसदों को तरोताजा तथा चिर युवा बनाता वरन् जनता को भी राजनीति की मादकता में गर्दन तक डुबो देता।
सम्मेलन खत्म होने के बाद मधु निहलानी ने खुद को आदमकद शीशे में उतारा, अपने भाषण के कुछ अंशों को दुहराया, जोरदार नारा लगाया, फिर खुद ही कहा....‘अद्भुत’

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पिल्ग्रिम्स पब्लिशिंग, पिलग्रिम्श बुक हाउस
बी.27/98-ए’8, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी
(0542) 2314060, फैक्स...0542,2312456
shivendra

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